राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १४ ] उल्लेख करता है, वे ठीक अपने स्थानों पर मिल जाते हैं। इनमें गलती नहीं हो सकी है। उसके वर्णनों से उनका ठीक पता लग जाता है । कल्हण का महत्वपूर्ण योगदान पुरातन भूपरिचय वर्णन है । पुराण, महाभारत, रामायण एवं कल्हण की वर्णन-शैली में अन्तर है । पुराण केवल नामों का उल्लेख कर छोड़ देते हैं । उनका भौगोलिक परिचय नहीं देते । महाभारत तथा रामायण कहीं-कहीं दिशाओ का भी संकेत करते हैं । यह संकेत रामा- यण में मुख्यतः सुग्रीव के सम्वाद और महाभारत में रण अभियान एवं दिग्विजयो के सन्दर्भ में मिलता है। परन्तु कल्हण पता एक भौगोलिक की तरह देता है। भारतीय पुराकालीन लेखकों में कल्हण सबसे अधिक सच्चा भौगोलिक स्थिति का वर्णन करता है। भारत के क्षेत्रों का इस प्रकार सर्वांगीण ज्ञान किसी रचना- कार ने उपस्थित नहीं किया है। उसने सिन्धु तट, कालिन्दी पुलिन (रा० १ : ६०) का वास्तविक रूप प्रस्तुत किया है । कल्हण ने देशों का भी वर्णन किया है। जिन देशों तथा नगरों का उसने उल्लेख किया है, उनको सम्भवतः उसने यात्रा भी की थी। काश्मीर के अतिरिक्त शेष भारतवर्ष को उसने आर्य देश की संज्ञा दी है । गान्धार देश, त्रिगर्त देश (रा० ३ : १००) दर्वाभिसार (रा० १ : १८०) चोल, कर्णाट, लाट सीमान्त, दरद देश, भोट्ट, आदि का उल्लेख किया है। उसने सिंहल (रा : १ : २९४) लंका (रा : १ : २६८) प्राग् ज्योतिष (रा० २ . १५२) गौड़ बंगाल आदि का भी उल्लेख किया है। राजाओं में उसने कन्नौज नरेश यशोवर्मन्, सिंहल नरेश विभीषण, अवन्ति नरेश विक्रमादित्य, एवं प्राग ज्योतिषेन्द्र का वर्णन किया है। उसने चन्द्रभागा, गंगा, यमुना, नर्मदा का दर्शन तथा उनमें स्नान अवश्य किया था। इसी प्रकार उत्तर मानस की यात्रा की भी ध्वनि उसके लेख से निकलती है। ईक्षुरस तथा इक्षु में फल न होना वही जान सकता है, जिसने काश्मीर के बाहर जाकर उसका रसास्वादन किया होगा। (रा० : २ : ५८) दिग्विजय-स्थान निरूपण : कल्हण ने राजा जलोक मिहिर कुल, मेघ वाहन, प्रवरसेन, ललिता- दित्य के दिग्विजय का विस्तृत वर्णन किया है। जलोक ने कान्यकुब्ज अर्थात् कन्नोज विजय किया था । काश्मीर के बाहर श्रीकृष्ण के मथुरा तथा गान्धार में हुए संघर्षों के लगभग ग्यारह सौ वर्षों के पश्चात् प्रथम बार काश्मीरी सेना काश्मीर के बाहर निकली थी (रा १ : ११७, ३३६) । दूसरी बार काश्मीर से मिहिर कुल के नेतृत्व में दक्षिण समुद्र तक पहुँची थी । समुद्र तट से लौटते हुए उसने चोल, कर्णाट, लाट आदि देशो का अतिक्रमण किया था । तीसरे दिग्विजय का अभियान मेघवाहन ने किया था। मिहिर कुल के समान यह भी श्रीलंका समुद्र-तट तक पहुँचा था (रा : २७, ७२) । चौथों दिग्विजय प्रवर सेन ने किया था । अवन्ति में प्रवेश कर राजा विक्रमादित्य द्वारा अपहृत काश्मीर का राज सिंहासन पुनः लौटा लाया था । पाँचवी दिग्विजय ललितादित्य ने किया था। उसने वाक्पति राजा एवं भवभूति सेवित कन्नौजपति यशोवर्मन् को जीता था। कन्नौज के दक्षिण में प्रवाहित एवं गंगा से मिलने वाली कालिका नदी और यमुना के मध्यवर्ती भूखण्ड को घर के प्रांगण सदृश बना लिया था। (रा० ४ . १४४, १४६) यह भौगोलिक वर्णन सत्य है । अनन्तर वह कलिंग, गौड, कर्नाटक पहुँचता है। इस स्थल पर कल्हण ने 'दक्षिणापथ' शब्द का उल्लेख किया है। पुरातन काल से दक्षिणापथ से जिन क्षेत्रों का सम्बोधन होता था, उन्हें ही कल्हण ने लिखा है । ललितादित्य ने मलय पर्वत, कोकण, द्वारिका, अवन्ति के पश्चात उत्तरा पथ में प्रवेश किया था ।