भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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उसके कुल के लोग नहीं हो सके । कुल का जीवन एकाकी हो गया था । कल्हण तथा उसके कुल का कोई व्यक्ति राज अनुग्रह प्राप्त दिखायी नहीं पड़ता । कल्हण के पूर्व तथा परकालीन वंशजों का आठवें तरंग में उल्लेख बिल्कुल नहीं मिलता । राजा जयसिंह के सुझाव पर कल्हण की लेखनी उठी थी, इसकी झलक कहीं नहीं मिलती । समुद्र-ज्ञान : कल्हण ने काश्मीर मण्डल तथा समीपवर्ती स्थानों का भ्रमण किया था। वह काश्मीर के कण-कण से परिचित था । उसका भौगोलिक ज्ञान अद्भुत है । जिस प्रकार उसने भूगोल उपस्थित किया है, उससे प्रतीत होता है कि उसने भारत का भ्रमण किया था। समुद्र तट तक पहुँचा था। उसने समुद्र का जो वर्णन उपस्थित किया है, उसे बिना समुद्र देखे, कोई कवि केवल पुस्तक-ज्ञान से नहीं लिख सकता । ताल वृन्त, नारियल वृक्ष की छाया, डाभ, आदि का पान, अनेक बातें ऐसी हैं, जिनसे प्रकट होता है कि इतिहास लिखने के पूर्व उसने इतिहास-सामग्री एकत्रित करने के लिए भारत-भ्रमण किया था । आधुनिक वैज्ञानिकों के समान कल्हण पृथ्वी को समुद्र मेखला धारिणी लिखता है । पृथ्वी समुद्र से वेष्टित है। यह निर्विवाद है। कल्हण समुद्र की मर्यादा का उल्लेख करता है । यह बात समुद्र तटवर्ती निवासी या वहाँ गया पर्यटक ही समझ सकता है । (रा० १ : १५३, १ : २६६ ) कल्हण दक्षिण समुद्र, पश्चिम समुद्र, पूर्व समुद्र आदि (रा० ३ : ४७९, ४८०) तथा लवण समुद्र का उल्लेख करता है । भारत के. दक्षिण में भारतीय सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर है । काश्मीर समुद्र से सहस्त्रों मील दूर पर्वत-मालाओं से वेष्टित है । कल्हण ऐसा सप्रमाण ऐतिहासिक ग्रन्थ विना भारत-भ्रमण, काश्मीर के राजाओं के दिग्विजय-मार्ग तथा उनके द्वारा विजित प्रदेशों को देखे नहीं लिख सकता था । मेघवाहन की सेना दक्षिण भारतीय समुद्र तट पर विश्राम कर रही थी । उस पार द्वीप था । (रा० ३ : ३०) यह स्थान रामेश्वरम् तथा धनुष्कोटि है । चारो धाम की यात्रा करना पुनीत कर्म माना गया है । पुरी, रामेश्वरम् तथा द्वारिका समुद्र तट पर है। कल्हण ने उत्कल किंवा कलिग, कर्नाट एवं सौराष्ट्र का उल्लेख किया है । वहाँ का वर्णन भी किया है। उसने या तो यात्रा अथवा ज्ञानार्जन के लिए भारत-भ्रमण किया था । वह काश्मीर से कन्नौज, काशी, गया होते पुरी, वहाँ से रामेश्वरम् और लौटते समय गोकर्ण, द्वारका सौराष्ट्र होता अवन्ति से उत्तरापथ में प्रवेश कर, काश्मीर लौटा होगा । कल्हण ने चार समुद्रो का उल्लेख किया है (रा० ४ : ३१०) सप्त-सिन्धु की पुरानी धारणा है। कल्हण ने उसे न मानकर शिव की चार भुजाओं की उपमा चार समुद्रो से दी है । आजकल पाँच महा समुद्रो की गणना की जाती है । प्राचीन काल में भी चार ही महा समुद्र की गणना की जाती थी । भारतीय सागर वाद का दिया गया नाम है । भारतीय सागर प्रशान्त तथा अटलांतिक के मध्य तथा अण्टार्कटिक के उत्तर में पड़ता है । यदि भारतीय समुद्र को उन समुद्रो का मध्यवर्ती स्थान मान ले तो कल्हण का वर्णन ठीक बैठता है । भारत महा- सागर को उसने दक्षिण सागर कहा है जो दक्षिण ध्रुव तक चला गया है । (रा० ३ : १२६) रघुवंश में कालिदास ने भी चार समुद्रों का ही उल्लेख किया है । राजा रणादित्य के सन्दर्भ में कल्हण ने चोल राजा रतिसेन को समुद्र की पूजा करते हुए चित्रित किया है । चोल राज्य सुदूर दक्षिण में पूर्वोय तथा मौराष्ट्र पश्चिमी समुद्रतट पर था । कल्हण का यह वर्णन सत्य है । (रा० ३ : १२६) भारत पर्यटन : काशी, कन्नौज, अवन्ति, मथुरा के अतिरिक्त और जिन स्थानों का कल्हण