राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 31, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १२ ]
दुर्बल हो गया था। राजा हर्ष (सन् १०८९-११०१ ई०) के जीवन, उसके दुःखद अन्त, विश्वासघात, नैतिक पतन का जो चित्रण कल्हण ने किया है, उसे पढ़कर रोमाञ्च हो जाता है। जमीन्दार तथा जागीर- दारों के समान काश्मीर में कुलीन डामरो का एक वर्ग विशेष अस्तित्व में आ गया था। उनके रक्तरंजित कार्यों से भविष्य की चार शताब्दियाँ त्रस्त रही हैं। उच्चल तथा सुस्सल के नेतृत्व में डामरो ने राजा हर्ष को त्रस्त करना आरम्भ किया। हर्ष ने उनके कारण राज त्याग दिया। फिर भी उसकी क्रूरतापूर्वक हत्या की गई। उच्चल और सुस्सल ने काश्मीर राज्य को संघर्ष से बचाने के लिए परस्पर बाँट लिया। ज्येष्ठ भ्राता उच्चल काश्मीर तथा सुस्सल ने लोहर का राज लिया। उच्चल डामरो को परस्पर लड़ाता उनकी शक्ति क्षीण करने लगा। कुछ समय तक गर्गचन्द्र, जो लहर का सरदार था राजसूत्र हाथ में रखने में सफल रहा। उसका राज्यकाल (सन् ११०१- ११११ ई०) सर्वदा हर्ष के उत्तराधिकारी राज लोलुपो तथा भाई सुस्सल के भय के कारण संघर्ष मय रहता था। अन्ततोगत्वा अपने पदाधिकारियों के षड्यन्त्र का शिकार बन कर मार डाला गया। तत्पश्चात् रड्ड एक दिन के लिए राजा बन बैठा। (सन् ८-१२-११११ ई०) गर्ग चन्द्र विद्रोहियों को दबाकर शक्तिशाली हो गया। वह राजाओं को बनाने और बिगाड़ने वाला बन गया। (रा० ८: ४२५) सल्हण गर्ग चन्द्र की सहायता से राजा बन गया। इसके पश्चात् काश्मीर के अत्यन्त दुःखान्त रक्तपात पूर्ण इतिहास का अध्याय खुलता है। सुस्सल का भिक्षाचर आदि के साथ गृह युद्ध सन् १११२ से ११२८ ई०) तक चलता रहा। अन्त मे राजा जयसिंह सन् ११२८ ई० में राजा बनकर काश्मीर में शान्ति स्थापित करने में सफल हुआ। चम्पक, कनक तथा कल्हण का काल इन भयंकर परिस्थितियों में व्यतीत हुआ था। क्रान्तियों, रक्तपातों, अराजकताओ, गृह-कलहो, संघर्षों, राज विप्लवों मे काश्मीर भस्म हो रहा था। उसका सामा- जिक ढाँचा बिगड़ रहा था। वैदिक, सनातन, पौराणिक, बौद्ध धर्मों के स्थान पर तन्त्रो का प्राबल्य हो रहा था। काश्मीर मण्डल स्वतः विघटित हो रहा था। इन सबका प्रभाव कल्हण पर पड़ना स्वाभाविक था। राज्य प्रासादीय षड्यन्त्र, अकाल, जलप्लावन, अग्निदाह, जनपीड़ा, मूर्तियों-मन्दिरों, विहारों का नाश करना आदि दुःखद घटनायें कल्हण को दुःखित कर रही थी। वह स्वयं कुछ कर नही सकता था। परिस्थितियाँ उसे एकाकी बना दी थी। वह अपने देश की भयावह परिस्थितियो से दुःखी था। उसने अपना समय काटने, कुछ करने, अपने देशवासियों के चरित्र को उठाने तथा राजाओ को शिक्षा देने लिए काव्य को साधन बनाया। उसी साधन का फल राजतरंगिणी है। उसमें उस काल की झलक मिलती है। कवि कल्हण की मानसिक वेदनाओं का उसके पदो में दर्शन मिलता है। राजतरंगिणी तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियों का सजीव चित्रण है। यह चित्रण सप्रमाण है। सत्य है। विषम परिस्थितियों, मानवीय दुर्बलताओ, घृणास्पद कर्मों को देखकर कल्हण की भाषा उपदेशात्मक हो गयी। परिस्थितियो ने उसमें नैराश्य एव विराग उत्पन्न कर दिया था। जयसिंह के काल में स्थिति अधिक सुधरी नही। द्वेष बीज अंकुरित होता गया। वह अंकुर ही कालान्तर में वृद्धि करता महान पादप बना। उस पादप का फल राजतरंगिणी की रचना है। हर्ष के पतन के कारण कल्हण का कुल प्रभावित हुआ था। राजा हर्ष के प्रिय पात्र उसके पिता तथा चाचा थे। हर्ष के विश्वासपात्र होने के कारण हर्ष के पश्चात् हुए अन्य राजाओ के प्रिय पात्र कल्हण,