भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

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उत्तरा पथ का अर्थ उत्तरीय भारत प्राचीनकाल से लगाया जाता था। उत्तरा पथ के पश्चात् कम्बोज, तुखार, उत्तरकुरु, जालन्धर, लोहर आदि मार्गों का जो भौगोलिक वर्णन कल्हण उपस्थित करता है, वह प्रायः ठीक मिलता है। (रा० ४ : १३३-१८०) ललितादित्य के पश्चात् भारतीय राजाओं के लिये दिग्विजय के आदर्श का पालन संभव नही रहा। कारण स्पष्ट है। इसके काल के पश्चात् मुस्लिम शक्ति प्रबल होने लगी थी। भारत की सीमा पर उनके राज्य स्थापित हो गये थे। उन्हीं का भारत पर आक्रमण होने लगा था। इसके पश्चात् काश्मीर ही नही समस्त भारत की राजनीति का लक्ष्य प्रमुखतः रक्षात्मक हो जाता है। कल्हण ने राजाओ के दिग्विजय मार्ग एवं यात्राओ के जो उल्लेख किये हैं वे वर्तमान भौगोलिक वर्णनो से साधारणतया मिलते हैं। यह इसलिये भी महत्त्व की बात है कि उन दिनों मानचित्र वर्तमान काल की तरह उपलब्ध नहीं थे। देश का सर्वेक्षण नही किया गया था। केवल जनश्रुति तथा परम्परा के आधार पर कार्य किया जाता था। इसका समर्थन अल्बेरूनी के लेखों से भी मिलता है। उसने कल्हण के रचना काल से ११८ वर्ष पूर्व काश्मीर के मार्गों का वर्णन किया है। उससे प्रकट होता है कि काश्मीर का सम्बन्ध समस्त भारत से था। अल्बेरूनी के अनुसार एक मार्ग कन्नोज से काश्मीर जाता था। दूसरा मार्ग कन्नोज से पानीपत, अटक काबुल होता, गजनी पहुँचता था। तीसरा मार्ग बब्बहान से अधिष्ठान (पुराधिष्ठान) काश्मीर पहुँचता था। चौथा मार्ग कन्नोज, शिरशारह, दहमाल (जालन्धर की राजधानी) बल्लावर होता लद्द अर्थात् लिदर घाटी काश्मीर पहुँचता था। काश्मीर का उन दिनों इतना महत्त्व था कि उसका सम्बन्ध समस्त भारत से था। अतएव इस अनुमान में तथ्य है कि कल्हण ने भारत-भ्रमण तथा समुद्र-तट की यात्रा की थी। अन्यथा इस प्रकार का वर्णन करना केवल ग्रन्थो के आधार पर सम्भव नही था। काश्मीर का भौगोलिक वर्णन : कल्हण ने काश्मीर का स्थान निरूपण किया है। भूपरिचय दिया है, पर्वतो, नदियों, स्रोतस्विनियो, कुल्याओं, भागों, सरों, वनो, क्षेत्रों, तीर्थ-स्थानों का वर्णन सच्चाई के साथ किया है। पर्वतों में, अन्तर्गृही, बहिर्गिरी, हिमालय ओर लोका लोक का उल्लेख किया है। (रा० १ : १३७) उसने काश्मीर की जलवायु (रा० १ : ४०-४२) तीर्थों में भेदा देवी, पाप सूदन, स्वयंभू, (रा० १ : १३६) सन्ध्या देवी, शारदा, सोदर (रा० १ : १३४) चीर मोचन (रा० १ : १४९) नन्द शिला (रा० ३ : ४६७) तथा अरिष्टो सादन (रा० ३ : ४८२) का उल्लेख कर उनके स्थानों का निश्चित पता दिया है। क्षेत्रो में नन्दि क्षेत्र, (रा० १ : ११३), विजय क्षेत्र (रा० १ : २७५) तथा इष्टिका पथ (रा० ३ : ४६७) तथा सुरेश्वरी क्षेत्र (रा० ५ : ४५४) का वर्णन किया है। यात्राओं में अमरेश्वर यात्रा (अमरनाथ) (रा० १ : २६७) नन्दि क्षेत्र यात्रा (रा० १ : ११३) तथा तक्षक नाग यात्रा (रा० १ : २२०-२२ १) का उल्लेख किया है। अटवी में रमण्याटवी, (रा० १-२६५) तथा वाक् पुष्टाटवी (रा० २ : ५७) का वर्णन किया है। सुश्रवा सरोवर (रा० १ : २०३) शेषनाग (रा० १ : २६१) जामातृसर (रा० १ : २६९) उल्लोल सर (रा० ४ : ५९३) उत्तरमानस (रा० ३ : ४) एवं सुरेश्वरी सर अर्थात् डललेक का उल्लेख किया है। नगरों में नरपुर (रा० १ : २४४) पुराधिष्ठान (रा० ३ : ६६) स्कन्दपुर (रा० १ : ३४०) पद्मपुर (रा० ४ : ६६५) । मन्दिरो में शत कपालेश, (रा० १ : ३३५) भूतेश, विजयेश,