राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १७३ वाल्मीकीय रामायण में नगर के नामकरण की एक कथा मिलती है । चन्द्रवंशी राजा कुशनाभ ने महोदय नगर की स्थापना की थी। राजा की एक सौ कन्याएँ वायु के शाप से कुब्जा हो गयीं। उस समय इस नगर का नाम 'कन्य- कुब्ज' पडा । प्रतीत होता है कि सबसे प्राचीन नाम महोदय नगर था । तत्पश्चात् कान्यकुब्ज पड़ा । अनन्तर गाधिपुर कुशस्थल कुशिक आदि नाम पडता गया। कुसुमपुर भी इसका नाम पड गया । जन्हु के नाम पर गंगा की धारा का नाम जाह्नवी पड़ा था । महाभारत के अनुसार वह राजा गाधि की राज- धानी थी। कान्यकुब्ज राज्य एवं उसके जनपद दोनों का नाम था। ( म० आदि : १७७:३, वन० ११५:२० ) विश्वामित्र ने कान्यकुब्ज में इन्द्र के साथ सोमपान किया था। ( म० वन० ८७:१७ ) गाधिराज कुमारी सत्यवती को अपनी पत्नी बनाने के लिये ऋची ऋषि ने अपना विचार प्रकट किया था। ( म० उ० ११९:४) स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में कान्यकुब्ज का स्थान छठवाँ है । इसमें ३६ लाख ग्राम थे। कान्यकुब्ज को प्राचीनकाल में गाधिपुर, कुश- स्थल तथा महोदय नगर कहते थे। भागवत पुराण में अजामिल को वहीं का निवासी बताया गया है। विश्वामित्र की वह जन्मभूमि थी । बुद्ध काल से गुप्त काल के अंत तक स्वतंत्र जनपद के रूप में कान्यकुब्ज का नाम प्रायः नही मिलता। कालान्तर में यह मौखरी राज्य का केन्द्र हो गया। मौखरी राज्य का संस्थापक हरिवर्मा था। मौखरी वंश के प्रसिद्ध राजा 'ईशानवर्मा' ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। थानेश्वर के शासक हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री का विवाह मौखरी राजा गृहवर्मा से हुआ था। मालवा के शासक देवगुप्त ने गृहवर्मा को मारकर राज्यश्री को बन्दी बना लिया। कान्यकुब्ज के मन्त्रियों ने राज्य-हर्षवर्धन को दे दिया। महाराजा हर्षवर्धन के समय कान्यकुब्ज की आशातीत उन्नति हुई । वह राज्य से साम्राज्य की राजधानी बन गया। महाकवि बाण ने 'हर्ष चरित' में कान्यकुब्ज का जीता जागता चित्रण किया है। हुएनत्सांग ने कान्यकुब्ज की यात्रा की थी। उसने यहाँ की भूरि भूरि प्रशंसा की है। बौद्ध साहित्य में कान्यकुब्ज का 'कन्यकुब्ज' जो संस्कृत कान्यकुब्ज का अपभ्रंश है, नाम मिलता है। हुएनत्सांग ने स्पष्ट उल्लेख किया है। यहाँ पर बौद्ध विहार थे। उसमें दस सहस्र भिक्षु विहार करते थे। हुएनत्सांग के अनुसार कान्यकुब्ज का विस्तार ४००० ली था। उसका कथन है । कान्य- कुब्ज ने संस्कृति, सभ्यता, युद्ध एवं शान्ति कालीन कला में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी। हर्ष के पश्चात् यशोवर्मा राजा हुआ। तत्पश्चात् क्रमशः आयुध, प्रतीहार तथा गाहडवाल राजवंशों का कान्यकुब्ज पर अधिकार हुआ। प्रतिहार वंश में नागभट, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल आदि प्रसिद्ध राजा हुए है। गाहडवाल वंश मे गोविन्दचन्द्रादि के समय कन्नौज की विशेष उन्नति हुई थी । निस्सन्देह छठवीं शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक साहित्य, कला, धर्मादि का विशेष विकास कन्नौज में हुआ था । 'कादम्बरी' तथा 'हर्षचरित' के लेखक बाणभट्ट के अतिरिक्त यशोवर्मा के राजकवि वाक्पति एवं भवभूति थे। प्रतीहार काल में राजशेखर, गाहड़वाल काल में लक्ष्मीधर एवं श्रीहर्ष संस्कृत के उद्भट साहित्यकार एवं कवि हुए थे। प्रतीहारों के समय कन्नौज स्थापत्य एवं मूर्तिकला में प्रसिद्ध हो गया था। छठवीं शताब्दी में श्वेत हूणों ने कन्नौज पर आक्रमण किया था। तालिमी ने इसका नाम 'कनो गिया' दिया है। फिरदौसी ने शाहनामा में कन्नौज का प्रशंसनीय भाषा मे उल्लेख किया है। उसका कथन है कि