भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

१७६ राजतरंगिणी

कर उसके स्थानो पर महाफलदायक 'धर्म मंगल' को बात चलायी गयी थी। अशोक की दृष्टि मे यह आवश्यक सुधार था। धर्म प्रचार था। परन्तु यह सुधार जनता हृदयंगम न कर सकी। पश्चिमोत्तर सीमान्त पर उठते युद्ध के बादल, जलोक को दूसरे ढंग पर विचार करने के लिये बाध्य कर दिये। अशोक का अभिलेख इस सम्बन्ध में स्पष्ट था। 'इय क्यं (८) ये हि एत के मगले सासयिके तं (९) सिय वो त भ्रठं निवटेयति सिय पुन ना (१०) इदलोक च वी तं (११) इद पुन धम मंगलं अकलिकं (१२) यदि पुन तं अथ न निवटे इध अथ परत अनंतं पुजं प्रसवति (१३) हंचे पुन तं ठं निवटेति ततो उभयेस लध भोति इध च सो अथो परत च अनंतं पुजं प्रसवति तेन धमंमलेन।' [ यह कहूँगा। क्योंकि इस प्रकार के मंगल सन्दिग्ध फल वाले होते हैं। इनमे अभीष्ट फल की प्राप्ति हो भी सकती है और नही भी। ये इहलौकिक हैं। किन्तु धर्म मंगल समय से बाधित नही है। हो सकता है कि इसमे इस लोक में वाञ्छित फल की सिद्धि न हो। किन्तु परलोक मे इससे अनन्त पुण्य होता है। परन्तु यदि इससे ( इस लोक मे भी) सिद्धि होती है तब तो दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। अर्थात् इस लोक में इससे अर्थ की प्राप्ति होती है। और परलोक मे इस धर्म मंगल से अनन्त पुण्य उत्पन्न होता है] "से अज देवन पियस प्रियदसिने रंजिने धम चरणेन भेरिघोषे अहो धमधोषे विमन दर्शन हस्तिने अगिकंधनि अजनि च दिवनि रूपनि दशेति जनस (२) (मानसेहरा शिला चतुर्थ अभिलेख) [... किन्तु आज देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा के धर्माचरण से भेरीघोष (रणभेरी) धर्म घोष हो गया। विमान दर्शन, हस्ति दर्शन, अग्नि स्कन्ध तथा अन्य दिव्य प्रदर्शनों को जनता को दिखाकर...] क्रिया की प्रतिक्रिया होना अनिवार्य है। अशोक के धर्म प्रचार के उत्साह की प्रतिक्रिया पाटलीपुत्र तथा कश्मीर दोनों स्थानों में हुई। कश्मीर में कल्हण के मतानुसार बौद्ध प्रभाव प्रबल हो उठा था। उसने जनता में विरक्ति की भावना भर दी। गृहत्याग की भावना भर दी। प्रव्रज्या को श्रेष्ठ माना। जीवन में उदासीनता को महत्त्व दिया। वह एक प्रकार से गार्हस्थ्य एवं क्षत्रिय धर्म से निष्क्रियता की ओर ले गया। राज्याश्रय प्राप्त कर पाटलीपुत्र सैनिक शक्ति के केन्द्र के स्थानपर धर्म प्रचार का केन्द्र बन गया। जलोक ने विदेशी खतरे को देखा। उसका सामना करने के लिये जनता के विचार में परिवर्तन लाना चाहा। एतदर्थ कान्यकुब्ज से वर्णाश्रम धर्मा- नुयायियों एवं विद्वानों को लाया। लुप्त होते वर्णाश्रम धर्म का उद्धार किया। एक नवीन जीवन उल्लास किया। नवीन प्रेरणा दी। कश्मीर में बौद्धधर्म के विरुद्ध वह प्रतिक्रिया अशोक की मृत्यु के ३० वर्ष के अन्दर ही हो गयी। बौद्धधर्म 'संघ' शरण की बात करता है। उसके अनुशासन को मानता है। यूरोप मे मध्ययुग में संघ अर्थात् चर्च तथा राज्य में संघर्ष हुआ था। चर्च राज्यपर अपना अंकुश रखना चाहता था। मूर्त्तमान प्रश्न खड़ा हो गया था। चर्च और राज्य दोनों में किसका आदेश किंवा अनुशासन मानना श्रेयस्कर होगा। इस भावना के कारण यूरोप में सुधारवादी, नव जागरण तथा धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा बलवती हुई। उसने भयंकर रक्त- रंजित आन्दोलन का रूप पकड़ लिया। कुछ इसी प्रकार की बात भारत में हुई। उसका बीज जलोक ने कश्मीर में डाला। यह उसके समय अंकुरित हुआ। और महा वृक्ष के रूप में पल्लवित, पुष्पित होता गया। वर्णाश्रम धर्म में देश, जनपद, नगर, ग्राम एवं गृह का स्थान था। उनके लिये उत्त- रोत्तर त्याग करने की बात कही गयी है। देश किंवा राष्ट्र को आदर्श माना गया है। जननी जन्म भूमि को स्वर्ग से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। जन्मभूमि