भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

१८० राजतरंगिणी स विक्रमप्रभावाभ्यां समुपार्जितया श्रिया । विदधे वारवालादीनग्रहारानुदग्रधीः ॥ १२१ ॥ १२१. अपने विक्रम एवं प्रभाव से उपार्जित धन द्वारा उस उग्र धीमान् राजा ने वार- बाल' इत्यादि अग्रहारों की स्थापना की। मनु कहते हैं। क्षत्रियों का उत्कर्ष ब्राह्मणों के बिना सहयोग के नहीं हो सकता। इसी प्रकार ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के एक साथ मिलने पर लोक तथा परलोक दोनों में वार्धक्य प्राप्त होता है। (मनु० : ९:३२३)। प्रारम्भ में पुरोहित का पद चाहे कुछ भी रहा हो परन्तु कालान्तर में यह पद वंश परम्परा- गत हो गया था। राजा का यह कर्त्तव्य माना जाता था कि वह कुलपुरोहित के मतों का आदर करेगा। पुरोहित धर्मशास्त्र एवं दण्डनीति दोनों में पारंगत होता था। राजतन्त्र एवं धर्म अर्थात् पौरोहित्य पद तथा उसके कार्य एक दूसरे को शक्ति देते थे। पुरोहित धर्म से राजा को विरत नहीं होने देता था। वह राजा पर अंकुश रखता था। यदि पुरोहित अनुचित कार्य करता तो राजा भी उसे दण्ड देनेके लिये धर्मा- नुसार मुक्त था। नैपोलियन ने एक समय कहा था—'ईसाइयत का सबसे आश्चर्य जनक कार्य यह था कि उसने गरीबों को अमीरों से त्रासित करने से रोका था और यदि पोप का अस्तित्व न होता तो मुझे एक पोप का आविष्कार करना पड़ता।' राजनीति एवं धर्म दोनों को मनु ने एक दूसरे का पूरक माना है। अतएव राजा पर धर्म और धर्म पर राजा राष्ट्रहित निमित्त अंकुश लगाया गया है। कल्हण ने राजतरंगिणी में सब स्थानों पर राजाओं के पुण्य कार्यों, उनके निर्माणों, यथा मन्दिरों, अग्रहारों, शालाओं, छात्रावासों, विहारों, का वर्णन करने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया है। उसकी लेखनी में उनके वर्णन काल में स्फूर्ति आ जाती है। यूरोप के सम्राटों, राजाओं एवं सामंतों ने मध्य काल में धर्म निमित्त जिस प्रकार के कार्य किये थे उसी प्रकार के कार्य कश्मीर के राजाओं ने इतिहास के आदिकाल से चौदहवीं शताब्दी तक अर्थात् हिन्दू राज्य काल में अनवरत किया हैं। इसमें कहीं भी शिथिलता का अनुभव नहीं होने पाया। पाठभेद : श्लोक संख्या १२१ में 'नुदग्रधी' का पाठभेद 'नुदारधी' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १२१ (१) वारबाल : यह वर्तमान ग्राम वारबुल है। सिन्धु तथा कंकणी नदी के संगम से एक मिल ऊर्ध्व भाग में कंकणी नदी के दक्षिण तटपर स्थित है। यह भूतेश्वर जाने वाले मार्ग में पड़ता है। इस कारण इसका और महत्त्व प्राचीन काल में था। अगस्त सन् १८९१ में श्री स्टीन भूतेश्वर की यात्रा काल में इस ग्राम में आये थे। उन्हें मार्ग के समीप शिवलिंग का अलंकृत एक विशाल पाषाण- खण्ड पर बना भद्रपीठ मिला था। वह बहुत बड़ा था। उसे देख कर श्री स्टीन ने घोर अन्वेषण किया। उन्हें एक और बड़ा अलंकृत पत्थर खेत में मकानों के नीचे लगा दिखाई दिया था। श्री स्टीन को वारवाल के वृद्ध मुकद्दम से मालूम हुआ था। यह अग्रहार अथवा जागीर बहुत दिनों तक श्रीनगर के एक पीरजादा कुल की थी। राजा गुलाब सिंह के शासन काल पूर्व तक यही व्यवस्था थी। वल्लर कल्लर स्थान सर्वे मान- चित्र में दिया गया है। परन्तु श्री स्टीन को इस नाम का कोई स्थान वहाँ पर नहीं मिला था। वारबाल के दक्षिण पश्चिम सिन्धु तटपर प्राचीन चीर मोचन, पूर्व दक्षिण कंकनपुर, तथा पश्चिम दक्षिण भव ग्राम था। इसके उत्तर में उत्तुंग पर्वत शिखर आरम्भ होता हरमुकुट तक चला जाता