भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग १८१ द्वारादिषु प्रदेशेषु प्रभावोग्राण्युदग्रया । ईशानदेव्या तत्पल्या मातृचक्राणि चक्रिरे ॥ १२२ ॥ १२२. राजा की पत्नी ईशान देवी ने द्वार देशों तथा प्रदेशों में अनेक प्रभावशाली मान चक्रों की स्थापना की जो अपनी देवी शक्ति के कारण विशिष्टता रखते थे । है । यहाँ से भूतेश्वर का मार्ग पर्वतों के बीच से होकर जाता है । कंकनी नदी के दोनों तटों पर ऊँची पर्वतमाला मिलती है । ओ स्टीन का मत है कि कल्हण ने इस अग्रहार का विशेष रूप से उल्लेख इस लिये किया है कि वह भूतेश्वर के तीर्थ यात्रा मार्ग पर पड़ता था । कल्हण का पिता चम्पक भूतेश्वर को नियमित रूप से यात्रा करता था । ( रा० ७.९५४ ) अतएव यह सम्भव प्रतीत होता है कि कल्हण कई बार इस स्थान से अपने पिता के साथ किंवा अकेले गया होगा । पाठभेद : श्लोक संख्या १२२ में 'द्वारादिषु' का पाठभेद 'स्तिशालादिषु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२२ (१) मातृचक्र : मातृचक्र का शब्दिक अर्थ होता है मातृकाओं का समूह । 'मातृ चक्र विवेक' इस विषय पर विशेष प्रकाश डालता है । उसका अध्ययन अच्छा होगा । संक्षेप में इसके अर्थ के सम्बन्ध में इतना ही लिखना अलम् होगा कि मूल ज्योतियाँ सूर्य, चन्द्र, बिम्ब तथा चिदात्मा हैं। उसकी रश्मियां देवता हैं। मातृका, वर्ण, शक्ति प्रभृति संज्ञा उनकी दी गयी हैं । इस रश्मिमाला किंवा मातृका चक्र के बहिर्विकास का नाम सृष्टि तथा अन्त संकोच का नाम प्रलय रखा गया है। वैदिक ग्रन्थों तथा गृह्यसूत्रों में मातृकाओं का निर्देश प्राप्य नहीं है । ऋग्वेद में सप्तमाताओं का उल्लेख मिलता है । मत है कि वहाँ सप्त नदियों तथा स्वरों के अर्थ में उनका प्रयोग किया गया है । (ऋ० ९:१०२:४) महाभारत में इनके स्वरूप का वर्णन मिलता है । उन्हें दीर्धनखी, दीर्घतुण्डी, निर्मांसगात्री, कृष्णमेषनिभ, दीर्घकेश, लंबकर्ण, लंबपयोधर, तथा पिंगाक्ष लिखा गया है। वे कामरूपधर एवं कामरूपचारी हैं । वायु समजव हैं । इनका निवास स्थान वृक्ष, चत्वर, गुफा, श्मशान, शैल एवं प्रस्त्रवण में कहा गया है । (म० भा० श० ४४:३०-४०) मत्स्य पुराण में मातृकाओं के जन्म का वर्णन अन्धकासुर वध के प्रसंग में किया गया है। मातृकाओं की संख्याएं ग्रन्थों में समान नही मिलतीं । उनकी संख्या कही सात, कहीं अट्ठारह तथा कहीं बत्तीस बताई गयी हैं । महाभारत शल्य पर्व में कार्तिकेय किंवा स्कन्द की अनुचरो मातृकाओ की नामावली दी गयी है । उनकी संख्या बत्तीस है। उनमें प्रभावती विशालाक्षी आदि के नाम हैं। सप्त मातृका में, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, नारसिंही, वैष्णवी एवं ऐन्द्री है । (मार्क० पु० : ८८:११-२०, ३८) अष्ट मातृका में ब्राह्मी, माहेश्वरी, चण्डी, वाराही, वैष्णवी, कौमारी, चामुण्डा एवं चर्चिका हैं। शिशुमातृका में काकी, हलिमा, रुद्रा, वृहली, आर्या, पलाला एवं मित्रा हैं। (म० व० २१७०६) चौदह मातृकाओं मे, गौरी, पद्मा, शची, मेध्या, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, धृति, पुष्टि, तुष्टि एवं कुलदेवी जो प्रत्येक कुल के लिये भिन्न-भिन्न होती हैं । (गोभिल० स्मृति० १:११-१२) अष्टादश मातृका, विनता, पूतना, कष्टा, पिशाची, अदिति किंवा रेवती, मुखमण्डिका, दिति, सुरभि, शकुनी, सरमा, कद्रू, विलीनगर्भा, करंजनोलया, धात्री, लोहिता- यनी, आर्या है । महाभारत की इस नामावली में