राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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दो मातृकाओं का नाम नहीं दिया गया है। (म० भा० : २१६:२६-४१) पहली शताब्दी से मातृका पूजन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के वृहत्संहिता में इसका स्पष्ट उल्लेख है। (५८:५६) मृच्छकटिक नाटक तथा स्कन्दगुप्त के बिहार के शिलालेख में मातृका पूजन का निर्देश प्राप्त है। चालुक्य एवं कदंब राजवंश मातृका के उपासक थे। मालवा के विश्वकर्मन राजा के अमात्य मयूराक्ष ने सन् ४२३ ई० में मातृकाओं का एक मन्दिर निर्माण कराया था। पश्चिमी एशिया के 'ट्रो' संस्कृति में प्राचीन काल से मातृका पूजा प्रचलित थी। मोहं- जोदड़ो तथा हड़प्पा स्थित सिन्धु संस्कृति में मातृका पूजा प्रचलित थी। इन संस्कृतियों की जो मुद्राएं प्राप्त हुई हैं उनमें मूर्ति के सम्मुख नर किंवा पशुबलि के चित्र अंकित हैं। मातृकाओं की प्रतिमाओ की पूजा समस्त भारत में प्रचलित थी। इनका स्वरूप, अर्धनग्न, एवं शिरोभूषण, कण्ठहार, तथा मेखला युक्त प्रदर्शित किया गया है। उदयपुर संग्रहालय में मातृकाओं की अनेक मूर्तियां हैं। उनकी विशेषता यह है कि प्रत्येक मातृका मूर्ति के साथ एक नवजात शिशु बना रहता है। यही कारण है कि शिशु के जन्म के प्रथम दिनों तक मातृ पूजा का विधान मिलता है। कल्हण ने मातृचक्र का उल्लेख राजतरंगिणी ३३५; ३४८ में दिया है। रा० त० १:३३३ में देवी चक्र का उल्लेख कल्हण करता है। उसने पुनः रा० त० १:६६ तथा ५:५५ में मन्दिर के सन्दर्भ में मातृ चक्र का उल्लेख किया है। मातृचक्र शिला पर श्रीचक्र तथा रज नौचक्र तुल्य खोदा जाता है। कश्मीर में अब तक उनकी पूजा गृहों तथा मन्दिरों में की जाती है। यह तान्त्रिक पूजा है। शारिका स्थान अर्थात् हरिपर्वत श्रीनगर में श्रीचक्र की पूजा होती है।
इसी प्रकार ज्वालामुखी चक्रपूजा उपेन अर्थात् धोवन की चट्टानी पहाड़ी पर होती है। यह स्थान वीही परगना में है। इस स्थान का विशेष महत्त्व है। यहाँ लोग बड़ी श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा करने आते हैं। कश्मीर में तन्त्र आधारित मातृ पूजा के प्रतीक स्वरूप अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित हैं। तन्त्र के अनुसार सप्त मातृका देवी, जीवन एवं मृत्यु के अनेक रूपों को प्रकट करतो हैं। श्रीनगर के संग्रहालय में दुर्गा का एक स्वरूप वाराही रूप में दिया गया है। यह एक युवती की आदम कद मूर्ति है। परन्तु मुख शुकरी अर्थात् वाराही का बनाया गया है। अलबरूनी ने सप्त मातृ देवियों के साथ वाराही का भी उल्लेख किया है। कश्मीर उपत्यका में आनेवालो दरों को द्वार कहा गया है। कालान्तर में इसे द्रंग कहने लगे थे। द्वारो की रक्षा पर कश्मीर के राजा विशेष जोर देते थे। द्वारदेश के सैनिक अधिकारी को द्वारपति कहते थे। कश्मीर की स्वतंत्रता की रक्षा इन द्वारों की सुरक्षा पर आधारित थी। भारत ने खैबर दर्रे की सुरक्षा का व्यापक और मजबूत प्रबन्ध नहीं किया था अतएव पश्चि- मोत्तर सीमान्त से सर्वदा भारत पर आक्रमण होता रहा। यूनानी, हूण, शक, मुसलमान आदि खैबर द्वार से भारत मे प्रवेश करते थे। खैबर की सुरक्षा शिथिल होने के कारण भारत पराधीनता की बेड़ी में जकड़ गया। अंग्रेजों ने इस बात को प्रारम्भ से ही समझा था। अतएव लगभग दो तिहाई सेना सीमान्त पश्चिमोत्तर प्रदेश में लगी रहती थी। खैबर की मोर्चे बन्दी आधुनिक शैली से किया था। कश्मीर के राजा अत्यन्त प्राचीन काल से द्रंग इस महत्त्व को समझते हैं। द्वारो की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाना था। द्वारपति का स्थान सेनापति तुल्य होता था। उन्हें द्वाराधिपति, द्वारेश तथा द्वाराधिकारी कहा जाता था। यह पद अत्यन्त