भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

प्रथमं तरंग १८३ श्रुतनन्दिपुराणः स व्यासान्तेवासिनो नृपः । सेवनं सोदरादीनां नन्दीशस्पर्धया व्यधात् ॥ १२३ ॥ १२३. वह नृप व्यास¹ के एक अन्तेवासी² से नन्दी पुराण³ सुनकर सोदर⁴ तथा अन्य स्थानों की तीर्थयात्रा करने लगा जैसे नन्दीश⁵ से स्पर्धा करता था ।

महत्त्वपूर्ण सामरिक पद कश्मीर में माना जाता था । इन द्वारो पर सैनिक चौकियां होती थी । बारह- मूला के अधोभाग अर्थात् वितस्ता के संकीर्ण गह्वरो में इस प्रकार के द्वार थे । अलबेरूनी ने उनके वर्णन के प्रसंग में उनको संज्ञा द्वार से ही दी है । हुएन त्सांग और ओ कुंग चीनी पर्यटकों ने भी उनका उल्लेख किया है । उन्हे कालान्तर में द्रंग के साथ-साथ द्वक भी कहा जाने लगा था । ईशान देवी ने द्वारो पर मातृचक्र की स्थापना कर उसे दैवी शक्ति से भी समन्वित किया । उसे एक धार्मिक रूप दिया । द्वार पर नियुक्त सेना तथा अधिकारियों में विश्वास उत्पन्न किया कि दैवी शक्ति द्वार की सुरक्षा करने मे उनके अनुकूल तथा सहायक है ।

कश्मीर के प्रदेशो में भी मातृचक्रो की स्थापना दानो ईशान देवी ने इसी दृष्टि से करायी । प्रदेश राज्य के अवयव है । उनमे विद्रोह न हो, आततायी शान्त रहें एतदर्थ यहाँ मातृचक्र की शक्ति स्थानीय राज अधिकारियों को बल देते रहे यही मन्तव्य मालूम होता है । महाराष्ट्र तथा मेवाड़ में मैंने सैनिक महत्त्व के स्थानों पर हनुमान एवं दुर्गा की की मूर्तियाँ प्रायः स्थापित देखी हैं ।

द्वार शब्द कश्मीर मे दरों के लिये प्रयुक्त होता रहा है । यद्यपि दरों के लिए संस्कृत में संकट शब्द भी आता है । प्रदेश शब्द भी महत्वपूर्ण है । आजादी के पश्चात् सूबो अर्थात् प्रान्तो के लिए प्रदेश शब्द का व्यवहार भारत में किया जाने लगा था । परन्तु प्रदेश शब्द बदलकर उसके स्थान पर अमेरिका की संघ शासन प्रणाली के आधार पर उन्हें 'राज' कहा जाने लगा है । प्राचीन काल में 'राज केवल एक होता था । उसके अंगो को प्रदेश कहते थे ।

१२३ (१) व्यास : इस शब्द का अर्थ विस्तार, विश्लेषण, कथावाचक तथा पुराणों की कथा कहने वाला होता है । कल्हण यहाँ किसी का नाम नही देता । महाभारतकार वेदव्यास का भी नाम नहीं देता । जो पराशर के औरस तथा सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । वह वैदिक संहिताओं के पृथक्करण कर्ता, वैदिकशास्त्र प्रर्वतकों के आद्य आचार्य, ब्रह्म- सूत्रो के प्रणेयता महाभारत पुराणादि ग्रन्थो के रचना- कार थे । वे वैदिक संस्कृति के पुनरुज्जीवक तत्त्वज्ञ, सर्वज्ञ, सत्यवादी सांख्य, योगधर्मादि शास्त्रों के ज्ञाता एवं दिव्यदृष्टिशालो थे ।

उनमे असामान्य प्रतिभा, क्रांतदर्शी द्रष्टापन, जीवन सम्बन्धी विरागी दृष्टिकोण, अगाध विद्वत्ता, एवं अप्रतिम संगठन कौशल्य, इन समस्त गुणोयुक्त व्यास तुल्य मूर्तिमंत संस्कार प्रतिमा प्राचीन भारतीय साहित्य जगत् मे क्वचित् ही मिल सकेगी । उन्हे बुद्ध साहित्य मे केवल ऋषि ही नही देवता स्वरूप माना गया है । वायु, (१ : ४२-४३) कूर्म (१. ३० : ६६) गरुड़ (१ : ८७ : ५०), पुराणों मे व्यास को विष्णु का अवतार माना गया है । इनको शिव का अवतार कूर्म (२.११:१३६) तथा ब्रह्मा का अवतार वायु (७७,७४ -७५) ब्रह्माण्ड (३:१३:८६) पुराणो में माना गया है । लिंग पुराण (२:४९:१७) में ब्रह्मा के पुत्र का अवतार व्यास को माना गया है । धर्मराज युधिष्ठिर ने महाभारत में ( आश्रः ८७ ) मे व्यास को भगवान् की उपाधि दी है ।

वैदिक संहिता साहित्य मे व्यास का निर्देश नहीं मिलता । सामविधान । ब्राह्मण ( १:४:३७७ ) में इनका पैतृक नाम 'पारशर्य' दिया गया है । बौद्ध साहित्य में भगवान् बुद्ध के पूर्व जन्मो में एक जन्म 'कण्हदीपायन' अर्थात् कृष्ण द्वैपायन् दिया गया है ।