भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

१८४ राजतरंगिणी आज से २५०० वर्ष पूर्व स्पष्ट प्रतीत होता है कि कृष्ण द्वैपायन नाम प्रसिद्ध हो चुका था। कृष्ण द्वैपायन नाम पड़ने का कारण था। यह यमुना द्वीप में जन्म ग्रहण किये थे अतएव द्वैपायन नाम इनका पड़ा था। (म. आ० ५४:२) इनकी माता कैवर्तराज की कन्या सत्यवती थी। उसका नाम काली था। इसलिये इन्हें कृष्ण कहा गया है। एकमत है कि इनका वर्ण कृष्ण अर्थात् काला था। अतएव कृष्ण द्वैपायन नाम पड़ गया था। यमुना द्वीप कोई देश विशेष नहीं मानना चाहिए। नदियों में द्वीप बन जाते हैं। दो धारायें बनकर बहने लगती है। द्वीप पर आबादी हो जाती है। दिल्ली में जमुना की दो धारायें वर्षा में स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। मध्य में द्वीप बना रहता है। उस पर कैवर्त अर्थात् धीवर या माझी किंवा कृषक झोपड़ी अथवा कच्चा मकान बनाकर रहने लगते हैं। व्यास का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था। इनके पुत्र शुकदेव जी थे। शुकदेव को इन्होंने सृष्टि क्रम, युगधर्म, ब्राह्म प्रलय, महाप्रलय, मोक्षधर्म एवं क्रिया फलादि का उपदेश दिया था। व्यास की वंश परम्परा इनके पुत्र शुकदेव जी के कारण चली थी। शुक का विवाह पीवरी से हुआ था। उन्हें भूरिश्रवस, प्रभु, शम्भु, कृष्ण एवं गौर नाम के पाँच पुत्र तथा कीर्तिमती नामक एक कन्या हुई थी। विष्णु पुराण में २८ व्यासों का उल्लेख मिलता है। व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है। प्रत्येक वेद तथा उसकी शाखाओं की शिष्य परम्परा है। इसी प्रकार व्यास की पुराण शिष्य परम्परा है। प्रतीत होता है कि व्यास की इस शिष्य परम्परा में कोई अन्तेवासी था। व्यास शब्द कालान्तर में प्रायः सभी कथा- वाचकों के लिये प्रयुक्त होने लगा। आज व्यास शब्द से इन्हीं का बोध होता है। व्यास की वंश परम्परा किंवा शिष्य परम्परा में जो लोग रहे होंगे उन्हें व्यास कहा जाता रहा होगा। कल्हण यहाँ 'व्यास' पद रूप में व्यवहृत किया है। वह आद्य व्यास नहीं बल्कि उनकी वंश किंवा पुराण शिष्य परम्परा में कोई व्यक्ति रहा होगा। पुराण का पारंगत तत्कालीन व्यास के किसी अन्तेवासी अथवा शिष्य से राजा ने नन्दिपुराण सुना होगा। व्यास की कोई गद्दी अथवा पीठ कश्मीर में उस समय रही होगी। वहाँ अन्तेवासी किंवा शिष्य रहकर पुराण का अध्ययन तथा अध्यापन करते रहे होंगे। उन्हीं में से किसी एक प्रमुख से राजा ने नन्दीपुराण सुना था। (२) अन्तेवासी : अन्तेवासी का अर्थ समीप रहने वाला शिष्य होता है। यह शब्द उस शिष्य के लिये व्यवहार किया जाता है जो शिक्षक किंवा व्यास के समीप निवास कर अथवा उसके आश्रम, पीठ एवं शाला में रहकर विद्याध्ययन करता है। (३) नन्दी पुराण . महापुराण किंवा पुराण, उपपुराण और उपोपपुराण तीन वर्गों में पुराण साहित्य का वर्गीकरण किया गया है। मत्स्य पुराण में पुराणों को गुण के अनुसार सात्विक, राजसिक एवं तामसिक पुनः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। विष्णु ब्रह्मा एवं अग्नि-शिव की उपासना प्रतिपादित करने वाले पुराणों को क्रम से सात्विक, राजसिक एवं तामसिक कहा गया है। सरस्वती एवं पितरों का माहात्म्य कथन करने वाले पुराणों को संकीर्ण कहा गया है। (मत्स्य ५३:६८-६९) पद्म एवं भविष्य पुराणों में भी सात्विक, राजसिक, तामसिकादि के प्रकार दिये गये हैं। किन्तु यहाँ उनका वर्गीकरण और प्रकार से किया गया है। (पद्मः उ० २६३:८१-८५ भविष्य : ३:२८:१०-१५) पुराणों की श्लोक संख्या में एकवाक्यता नही है। प्रत्येक पुराण के वक्ता, देवता, गुण तथा प्रसंग एवं स्थल भिन्न-भिन्न हैं। लगभग ११ पुराणों का प्रसंग एवं स्थल नैमिषारण्य है। नृसिंह, भागवत के विष्णु एवं देवी, वायु तथा शिव पुराणों को महापुराण मानने में एकवाक्यता नहीं है। उपपुराणों की संख्या भी १८ कही जाती है। किन्तु उनकी नामावली में मतैक्य नही है। शिव