राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ राजतरंगिणी
आज से २५०० वर्ष पूर्व स्पष्ट प्रतीत होता है कि कृष्ण द्वैपायन नाम प्रसिद्ध हो चुका था । कृष्ण द्वैपायन नाम पड़ने का कारण था। यह यमुना द्वीप में जन्म ग्रहण किये थे अतएव द्वैपायन नाम इनका पड़ा था । ( म. आ० ५४:२) इनकी माता कैवर्तराज की कन्या सत्यवती थी । उसका नाम काली था । इसलिये इन्हें कृष्ण कहा गया है । एकमत है कि इनका वर्ण कृष्ण अर्थात् काला था । अतएव कृष्ण द्वैपायन नाम पड़ गया था । यमुना द्वीप कोई देश विशेष नही मानना चाहिए। नदियो मे द्वीप बन जाते है । दो धारायें बनकर बहने लगती है । द्वीप पर आबादी हो जाती है । दिल्ली में जमुना की दो धारायें वर्षा में स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं । मध्य में द्वीप बना रहता है । उस पर कैवर्त अर्थात् धीवर या माझी किंवा कृषक झोपड़ी अथवा कच्चा मकान बनाकर रहने लगते है ।
व्यास का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था । इनके पुत्र शुकदेव जी थे । शुकदेव को इन्होने सृष्टि क्रम, युगधर्म, ब्राह्य प्रलय, महाप्रलय, मोक्षधर्म एवं क्रिया फलादि का उपदेश दिया था । व्यास की वंश परम्परा इनके पुत्र शुकदेव जी के कारण चली थी । शुक का विवाह पीवरी से हुआ था । उन्हें भूरिश्रवस, प्रभु, शम्भु, कृष्ण एवं गौर नाम के पांच पुत्र तथा कीर्तिमती नामक एक कन्या हुई थी । विष्णु पुराण में २८ व्यासों का उल्लेख मिलता है ।
व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । प्रत्येक वेद तथा उसकी शाखाओ की शिष्य परम्परा है । इसी प्रकार व्यास की पुराण शिष्य परम्परा है । प्रतीत होता है कि व्यास को इस शिष्य परम्परा में कोई अन्तेवासी था ।
व्यास शब्द कालान्तर में प्रायः सभी कथा- वाचकों के लिये प्रयुक्त होने लगा । आज व्यास शब्द से इन्हीं का बोध होता है । व्यास की वंश परम्परा किंवा शिष्य परम्परा में जो लोग रहे होगे उन्हें व्यास कहा जाता रहा होगा । कल्हण यहाँ 'व्यास' पद रूप में व्यवहृत किया है । वह आद्य व्यास नहीं बल्कि उनकी वंश किंवा पुराण शिष्य परम्परा में कोई व्यक्ति रहा होगा । पुराण का पारंगत तत्कालीन व्यास के किसी अन्तेवासी अथवा शिष्य से राजा ने नन्दिपुराण सुना होगा । व्यास की कोई गद्दी अथवा पीठ कश्मीर में उस समय रही होगी । वहाँ अन्तेवासी किंवा शिष्य रहकर पुराण का अध्ययन तथा अध्यापन करते रहे होंगे । उन्ही में से किसी एक प्रमुख से राजा ने नन्दीपुराण सुना था ।
(२) अन्तेवासी : अन्तेवासी का अर्थ समीप रहने वाला शिष्य होता है । यह शब्द उस शिष्य के लिये व्यवहार किया जाता है जो शिक्षक किंवा व्यास के समीप निवास कर अथवा उसके आश्रम, पीठ एवं शाला में रहकर विद्याध्ययन करता है ।
(३) नन्दी पुराण : महापुराण किंवा पुराण, उपपुराण और उपोपपुराण तीन वर्गों में पुराण साहित्य का वर्गीकरण किया गया है । मत्स्य पुराण में पुराणो को गुण के अनुसार सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक पुनः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है । विष्णु ब्रह्मा एवं अग्नि-शिव की उपासना प्रतिपादित करने वाले पुराणों को क्रम से सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक कहा गया है । सरस्वती एवं पितरो का माहात्म्य कथन करने वाले पुराणों को संकीर्ण कहा गया है । ( मत्स्य ५३:६८-६९ ) पद्म एवं भविष्य पुराणो में भी सात्त्विक, राजसिक तामसिकादि के प्रकार दिये गये है । किन्तु यहाँ उनका वर्गीकरण और प्रकार से किया गया है । (पद्म : उ० २६३:८१-८५ भविष्य : ३:२८:१०-१५)
पुराणो की श्लोक संख्या में एकवाक्यता नही है । प्रत्येक पुराण के वक्ता, देवता, गुण तथा प्रसंग एवं स्थल भिन्न-भिन्न है । लगभग ११ पुराणो का प्रसंग एवं स्थल नैमिषारण्य है । नृसिंह, भागवत के विष्णु एवं देवी, वायु तथा शिव पुराणों को महापुराण मानने मे एकवाक्यता नहीं है ।
उपपुराणो की संख्या भी १८ कही जाती है । किन्तु उनकी नामावली में मतैक्य नहीं है । शिव