राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १८५
उपासना के पुराण (१) कूर्म, (२) ब्रह्माण्ड, (३) भविष्य, (४) मत्स्य, (५) मार्कण्डेय, (६) लिङ्ग, (७) वराह, (८) वामन, (९) शिव तथा (१०) स्कन्द हैं । विष्णु उपासना के पुराण (१) गरुड़, (२) नारद, (३) भागवत, (४) विष्णु हैं । ब्रह्मा की उपासना के पुराण (१) पद्म तथा (२) ब्रह्म हैं । अग्नि उपासना का पुराण एक मात्र अग्नि पुराण है । सवितृ उपासना का पुराण ब्रह्मवैवर्त है । पुराणों के उपपुराण होते हैं । नन्दिपुराण उपपुराण है । यह शिव उपासना का पुराण हैं । नन्दिक्षेत्र कश्मीर का पवित्र स्थान है। वहो भूतेश्वरादि का स्थान है । हरमुकुट पर्वत है । अतएव राजा जलोक ने नन्दिपुराण व्यास के अन्तेवासी से सुना था । उससे प्रभावित होने के कारण वह शैव मत की ओर झुक गया था । (४) सोदर : नीलमत पुराण सोदर तीर्थ का वर्णन करता है । सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः । गत्वा च शीघ्रं सङ्गम तथैवोत्तरमानसम् ॥ १३१४ तत्रापि विधिवत् स्नानं विधाय दृढ़निश्चयान् । सुरतं प्राप्सो महाभाग तत्र रंस्यसि पुत्रक ॥ १३१५ तस्माद्देशात्तथा याति दक्षिणेन महानदी । हिरण्याभाम्भसा पूर्णा नाम्ना कनकवाहिनी ॥ १३१३ सोदर तीर्थ को इस समय नारननाग कहते हैं। यह भूतेश्वर के ध्वंसावशेष के समीप पर्वत मूल में है । कश्मीर का यह महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है । यह एक जलस्रोत है। छोटे आयताकार कुण्ड किंवा सरोवर में यह जल एकत्रित होकर बहता रहता है । इसके समीप भूतेश्वर टिप्पणी में वर्णित दो मन्दिर समूह हैं। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा की थी। उनके यात्रा काल में सभी मन्दिर अत्यन्त २४
भग्न एवं उपेक्षित थे । किसो में न तो स्टीन के समय शिवलिंग अथवा प्रतिमाएं थी और जब मैं वहाँ गया था उस समय भी । ओर न आज हैं । मन्दिरों का निर्माण काल भिन्न-भिन्न रहा है । मन्दिर विमान शैली के है। यहाँ के एक मन्दिर में केवल दो द्वार है । यह मन्दिर २५ वर्ग फिट में है। निर्माण में चूने का प्रयोग किया गया है । श्री स्टीन का मत है कि बड़ा मन्दिर ही ज्येष्ठेश का मन्दिर है । सोदर तीर्थ का वर्णन नन्दिक्षेत्र माहात्म्य में मिलता है । भूतेश्वर, ज्येष्ठेश्वर तथा नन्दिक्षेत्र की तीर्थ यात्रा करने वालों के लिये यहाँ पिण्ड दान देने का विधान है। कनकवाहिनी के संगम के प्रसंग में कल्हण ने पुनः वर्णन किया है । (रा० त० २:१६९) नन्दि क्षेत्र एवं नन्दोश क्षेत्र के अन्तर्गत नन्दिक्षेत्र माहात्म्य वर्णित सभी स्थान आ जाते हैं । वे हरमुकुट सरोवर से भूतेश्वर के मध्य तक स्थित है । राजा जलोक नगर में ज्येष्ठरुद्र की स्थापना की थी । आदि ज्येष्ठरुद्र के स्थान के समीप नारन नाग का जलस्रोत है । नारन नाग किंवा सोदर तीर्थ का अवतरण श्रीनगर में राजा की सुविधा के लिये हुआ था। अतएव नवीन सोदर तीर्थ श्रीनगर के समीप होना चाहिए । यह सोदर तीर्थ श्रीनगर समीपस्थ स्थित सुदर है । डल लेक का एक भाग सुदर खुन कहा जाता है। इसके समीप सुदरवल ग्राम है । खुन शब्द संस्कृत शब्द कोण का अपभ्रंश है। सुदर खुन एक संकीर्ण जल निकलने का स्थान है। डल के पश्चिम तरफ है। यह आदमपुर तथा सुदरबल ग्रामो के मध्य स्थित है । यह डल लेक का सबसे गहरा स्थान है । श्री स्टीन सन् १८८५ ई० में इस स्थान पर आये थे । उन्हें सुदर खुन ग्राम के छोरपर गाँव की मसजिद के समीप २ कुण्ड मिले थे । वे डल लेक के जल से भरे थे । ग्रामीणो ने उन्हें बताया था । उन कुण्डों में निरन्तर बहने वाले जलस्रोत थे ।