भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

१८८ राजतरंगिणी कल्हण के वर्णन (१:३४१) से यह बात मिलती है। यह स्थान डल लेक के दक्षिण दिखाया गया है। इस शंकराचार्य पर्वत का तत्कालीन नाम ज्येष्ठ रुद्र राजा गोपादित्य के समय में गोपाद्रि पड़ गया था । उल्लेख मिलता है कि राजा गोपादित्य ने ज्येष्ठेश में देवस्थान का निर्माण करा कर गोपाद्रि मे एक अग्रहार आर्यावर्त के ब्राह्मणों को दिया था । कल्हण ने गोपाद्रि शब्द पुनः शंकराचार्य किंवा ज्येष्ठ रुद्र पर्वत के लिए और इसी के लिए गोपाचल शब्द का प्रयोग रा० त० ८:११०७ में किया है। गोपाद्रि का अपभ्रंश आज कल का यथा- स्थान स्थित ग्राम गुपकर है। वह ग्राम बड़ा है। शंकराचार्य पर्वत के मूल पूर्वदिशा में स्थित है। जेथर ग्राम से आध मिल दूर है। इससे प्रकट होता है कि जेथर ग्राम के अत्यन्त समीप राजा गोपादित्य ने उक्त देवस्थान निर्मित किया था। श्री स्टीन का मत है कि राजा जलोक द्वारा निर्मित ज्येष्ठ रुद्र का स्थान श्रीनगर में डल लेक के दक्षिण दिशा में जेथर ग्राम के समीप होना चाहिए । इस देव स्थान के पूर्व में जेथर तथा शंकराचार्य पर्वत होना चाहिए। वर्तमान स्थिति इन स्थानों की ऐसी है कि वहाँ कोई प्राचीन स्मारक तथा ध्वंसावशेष नहीं है जिससे निश्चित रूप से निर्णय किया जाय कि ज्येष्ठेश का मन्दिर किस स्थान पर था। जनरल कनिंघम ने (एनसियेण्ट ज्योग्रेफी आफ इण्डिया पृष्ठ ८१ वाराणसी) शंकराचार्य पर्वत किंवा तख्त सुलेमान को ज्येष्ठेश्वर पर्वत माना है। उन्होंने ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर ही वर्तमान शंकराचार्य मन्दिर माना है। किन्तु डाक्टर वूहलर ने इसे ठीक नही माना है। उनका कहना है कि कश्मीरी पण्डितो की परम्परा शंकराचार्य पर्वत स्थित मन्दिर किंवा देव स्थान को राजा जलोक द्वारा स्थापित ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर नहीं मानती। श्री फरगुसन (हिस्टोरी आफ इण्डियन आर्किटेक्चर पृष्ठ २८२) ने भी इस मन्दिर को प्राचीन मन्दिर नही माना है। उन्होंने कहा है कि वर्तमान वृत्ताकार मन्दिर का भीतरी कक्ष जिसमें शिवलिंग स्थापित है उसका मुस्लिम काल में निर्माण किया गया था । प्राचीन मन्दिरों के ध्वंसावशेष गुपकर में अनेक स्थानो पर बिखरे मिलते हैं। गगरीबल के पश्चिमी तट पर सैय्यद निजामुद्दीन साहब की जियारत में तथा ग्राम की अन्य मुसलिम इमारतों में मन्दिरों के बड़े अलंकृत शिलाखण्ड लगे मिलते हैं । श्री स्टीन को उक्त जियारत के मार्ग में एक ओर दस फिट गोला एक विशाल शिवलिंग क्षत- विक्षत दिखाई दिया था। ज्येष्ठ नाग के समीप भी उन्हें एक विशाल शिवलिंग पर्वत मूल में भग्ना- वस्था मे मिला था। जेथर में उन्हें ऊपर भूमि पर कोई विशेष ध्वंसावशेष नही मिले थे । मैने यहाँ काफी समय खोज में व्यतीत किया है। श्री स्टीन तथा कल्हण वर्णित गुपकर ग्राम का रूप इस समय बिल्कुल बदल गया है। यहाँ पर पूर्व समय आबादी थी। स्वर्गीय राजा हरी सिंह अन्तिम डोगरा राजा कश्मीर ने इस स्थान को अपने प्रासाद निर्माण निमित्त ले लिया था। वर्तमान जेठा देवी से लेकर राजा श्री कर्ण सिंह के वर्तमान राज प्रासाद तक की भूमि जो शंकराचार्य मन्दिर के पृष्ठ भाग में है। नव प्रासाद निर्माण निमित्त ले ली गयी है। उस पर स्वर्गीय राजा श्री हरी सिंह जी ने अपने तथा तत्कालीन युवराज श्री कर्ण सिंह के लिये एक और प्रासाद बनवाया था। आजादी के पश्चात् आज कल वह प्रासाद एक होटल के रूप में परिणत कर दिया गया है। श्री स्टीन के मानचित्र तथा वर्णन के आधार पर मैने अनुसन्धान आरम्भ किया। नक्शा से कुछ सहायता नहीं मिली। सब कुछ बदल गया है। केवल पहाड़ी ढल तथा नाग अर्थात् झरनों का अस्तित्व यथा स्थान है। प्राचीन मार्ग तथा सड़क भी समाप्त हो गये हैं। नवीन मार्ग तथा सड़क नवीन ढंग से मूल स्थान से हटकर बनाये गये हैं। स्थानीय लोगों से बातें कीं।