राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग [१८९]
[बायाँ स्तम्भ] जांच किया । किन्तु विशेष सहायता न मिली । स्तीन वर्णित लिंग तथा कल्हण वर्णित मन्दिर का लेश मात्र वहाँ चिन्ह नही मिला । सब कुछ समयर कर आधुनिक मैदान तथा इमारतो में परिणत हो गया है । श्री स्तीन जहाँ ज्येष्ठेश्वर का स्थान निश्चित करते हैं वहाँ इस समय भव्य राजप्रासाद एवं होटल है । नकशे की सड़क का अस्तित्व लोप हो गया है । दो दिन तक मैं स्थानो का निरीक्षण करता रहा किन्तु कुछ पता नही चला । मेरा ड्राइवर ब्राह्मण था । वह राजा हरीसिंह के समय से ही राजकर्मचारी था । ड्राइवरी करते करते वृद्ध हो गया था । इस समय सरकारी ड्राइवर था । कश्मीर के मुख्य मंत्री श्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने एक कार के साथ उसे मेरे साथ लगा दिया था । वह इस स्थान से परिचित था । बहुत दिन पूर्व उसका यहाँ पर क्वार्टर था । उसमें रहता था । क्वार्टरों का भी अब लोप हो चुका है । मैंने उससे पुरानी सड़क का स्थान पूछा । नकशा दिखाया । पुराने ग्राम का चिह्न भी बताया । मैं कल्पना नहीं कर सकता था कि डोगरा हिन्दू राज्य में शिवलिंग हटाया जा सकता था । वे धर्मपरायणता के लिये प्रसिद्ध थे । मैने ड्राइवर से उसकी बाल्यावस्था की कुछ बातें स्मरण करने के लिये उत्साहित किया । वह राजभक्त सेवक था । वह जानकर इस स्थान के विषय में कुछ नहीं बता रहा था । मैंने इसे लक्ष्य किया । उसने काश्मीर के पुरातत्व विभागीय युवक से जिसे मैंने अपने साथ ले लिया था दबी जबान में धीरे से कहा—यहाँ शिव लिंग था । उस स्थान पर जहाँ राज्य प्रासाद या होटल का इस समय मैदान है । इस बात से मुझे एक जानकारी का स्रोत मिला । इस स्थान पर आने के पूर्व मैं जेठा देवी गया था । मुझे श्रीनगर में कुछ ब्राह्मणों ने बताया कि जेठा देवी के स्थान पर ही ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर था । मैं
[दायाँ स्तम्भ] वहाँ पहुँचा । स्थान देखा । मुझे निराशा हुई । स्थान आधुनिक था । प्राचीनता नाम की किसी वस्तु का दर्शन नहीं मिला । प्रथम क्रिया हुई । यह स्थान ज्येष्ठेश्वर का नही हो सकता । यहाँ देवी की संवत् २००३ विक्रमी में एक मूर्ति स्थापित की गई थी । शिवलिंग कहीं नहीं था । मैं बहुत देर तक वहाँ बैठा और आस-पास घूमता रहा । कुछ समय पश्चात् एक वृद्ध ब्राह्मण वहाँ आ गये । मेरा कौतूहल जानकर वे चकित हुए । मैने अपना सन्देह इस स्थान के विषय में प्रकट किया । ज्येष्ठा अर्थात् वर्तमान जेठा देवी के स्थान के पार्श्व में एक नाला बहता था । ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर नाला के वाम पार्श्व में पुरानी अर्थात् श्री स्तीन के नकशा के लुप्त वालो सड़क के समीप होना चाहिये था । ज्येष्ठा देवी का स्थान ज्येष्ठ रुद्र से ऊपर तथा नाला के तटपर है । राज प्रासाद मे होकर यहाँ का मार्ग जाता है । पूर्व काल में यह मार्ग एक सड़क के रूप में था । इस समय सड़क बिगड़ गयी है । पगडण्डी का रूप ले ली है । ऊपर पहुँचने पर एक सुरम्य स्थान मिलता है । यहाँ पर नाग अर्थात् जलस्रोत है । स्रोत का प्रथम स्वरूप नव निर्मित ज्येष्ठा देवी के मन्दिर के सम्मुख है । एक कुण्ड में स्रोत जल आता है । वहाँ से जल निकल कर नीचे बने चौकोर दूसरे कुण्ड में आता है । यहाँ पुरुष स्नान करते हैं । वहाँ से जल निकलकर तीसरे अर्थात् सबसे निचले कुण्ड में आता है । यह कुण्ड भी चौकोर है । यह मिट्टी तथा पत्थर की दिवाल से घेरा गया है । जहाँ महिलाएँ स्नान करती हैं । प्रथम कुण्ड के ऊपर मैदान है । जहाँ धर्मशाला बनी है । धर्मशाला के बायें भाग में दो कूप जैसे बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये हैं । इसमें होटल वाले शीत काल में बरफ एकत्रित कर रखते हैं । उसका प्रयोग ग्रीष्म काल में करते हैं । इन गड्ढों की गहरी खुदाई की गयी थी । परन्तु उसमें से कोई महत्त्व- पूर्ण वस्तु प्राप्त नही हुई ।