भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 278

प्रथम तरंग १९३ राजंस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् । ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥ १३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था। मध्य मार्ग में एक अबला मिली। उसने राजा से भोजन की याचना की। यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते । व्यवृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाशयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥ १३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की। स सत्त्वहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् । अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥ १३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था। उसने उससे कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो।' उसने राजा से कहा।

उरुमुरु अपने जीवन काल में ही ईश्वर का अवतार माना जाता था। नरामसिन राजा कहता था। उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा रखा था। मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी। वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था। मिस्री लोगों का विश्वास था। 'रा' देवता रानी के साथ सहवास करता था। उससे अलौकिक शक्ति सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था। यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के समान थी। वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र तुल्य मानते थे। जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि- ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे। यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक झुकाव है। ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस मान्यता को स्वीकार करता है। महात्मा ईसा में अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है। इसलाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है। २५

कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है। उसकी तुलना नन्दीश के अवतार से करता है। १३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का उल्लेख किया है। राजा जलोक का झुकाव बुद्ध धर्म की ओर अधिक नहीं था। अपितु वर्णाश्रम धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था। बौद्धों में आतंक व्याप्त हो गया होगा। राज्याश्रय के अभाव में वे भय का अनुभव करते। वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है। राजा जलोक के समय बौद्धधर्मावलम्बियो की क्या स्थिति हो गयो थी। यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है। पाठभेद : श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद 'यथेच्छ' मिलता है। श्लोक संख्या १३३ में 'मांस' का पाठभेद 'दातु' मिलता है।