भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१९२ राजतरंगिणी

से मान्यता प्राप्त करता आया है। अवतार का साधारण अर्थ होता है। ईश्वर किंवा देवताओं का शक्ति द्वारा भौतिक जगत् मे मूर्तिमान आविर्भाव होना। अवतार का प्राचीन शब्द प्रादुर्भाव है। वैष्णव सम्प्रदाय में अवतार को विशेष महत्त्व दिया जाता है। पांचरात्र भगवान् विष्णु के व्यूह, विभव, अन्तर्यामी, तथा आचार्यावतार का सिद्धान्त स्वीकार करता है। शैव सम्प्रदाय के ग्रन्थो में भग- वान् शंकर के नाना प्रकार की लीलाओं का वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत (१०:२१:१४) भगवान् के अवतार का प्रयोजन उपस्थित करता है। नृणां निःश्रेयसायापि व्यक्तिर्भगवतो भुवि । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ अवतार-वाद का पुराणों में सविस्तार उल्लेख किया गया है। वैदिक साहित्य में अवतारवाद का रूप मिलता है । प्रजापति ने प्राणियों की रक्षा निमित्त अनेक रूप धारण किया था। शतपथ ब्राह्मण (१८.१:१) में मत्स्य, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१: ५) में कूर्म, जैमिनी ब्राह्मण में (३.२७२) वाराह, तैत्तिरीय संहिता (७:१.५१) तथा शतपथ (१४: १:२:११) तथा तैत्तिरीय आरण्यक में नृसिंह तथा तैत्तिरीय संहिता (२१.३.१) में वामन अवतारों का संकेत प्राप्त होता है। स्वयं ऋग्वेद मे (१: १५४.३) में त्रिविक्रम विष्णु का तीन पदों में विश्व को नापने का उल्लेख है। कालान्तर में प्रजापति के स्थान पर विष्णु को प्रमुखता हुई। उस समय से विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलने लगा। अवतारों के रूप, लीला तथा घटना वैविध्य का वर्णन वेद पर ही अधिकतया आश्रित है। विष्णु के चौबीस अवतार माने जाते हैं। दशा- वतार विशेष प्रचलित हैं। उनमें दो जल प्राणी मत्स्य तथा कच्छप हैं। वे वन जी हैं। दो थलचारी वराह तथा नृसिंह हैं। वे भी वनचरो हैं। दोनों का अधोभाग मनुष्य तथा शिरो- भाग वराह तथा सिंह का है। एक वामन अवतार है। वे खर्व हैं। तीन राम हैं। परशुराम, दाशरथि राम तथा बलराम । बुद्ध सकृपः हैं। कल्कि अकूपः हैं। महाभारत में बुद्ध का नाम नहीं मिलता है। वहाँ पर 'हंस' को अवतार मान कर दश संख्या की पूर्ति की गयी है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से बिल्कुल ठीक है। महाभारत काल के पूर्व भगवान् बुद्ध का जन्म नहीं हुआ था। महाभारत के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् भगवान् बुद्ध का जन्म हुआ था। अतएव महाभारत में बुद्ध का अवतार न होना तर्क सम्मत है। बौद्ध धर्म के महायान पंथ में अवतारवाद की कल्पना दृढ़ मूल है। बोधिसत्त्व कर्मफल की पूर्णता होने पर बुद्ध रूप में अवतरित होते हैं। जातक कथाएँ इस प्रकार के आख्यानों से भरी पड़ी हैं। तिब्बत में दलाईलामा के रूप में अवतार का संकेत मिलता है। लामा लोजंग-ग्या-मत्सो (सन् १६१५-१६८२ ई०) ने इस परम्परा की स्थापना की। तिब्बती मान्यता है। दलाईलामा को मृत्यु के पश्चात् उनकी आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है। इस मत का प्रचार मंगोलिया के मठों में विशेष रूप से था। परंतु चीन में अवतारवाद की कल्पना मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी। पारसी धर्म को परम्परा वैदिक तथा हिन्दुओं की अनेक मान्यताओं से मिलती है। वे राजा को पवित्र तथा दैवी शक्ति सम्पन्न मानते हैं। पारसी ग्रन्थों में 'बहूशों हूरेनाट' राजा में अद्भुत तेज सत्ता थी। वह कालान्तर में अर्दशिर राजा और सस्सनवंशी राजाओं में थी। शामी अर्थात् सेमेटिक लोगों में कुछ कम या ज्यादा अवतारवाद के अंकुर मिलते हैं। यहाँ राजा भौतिक तथा दैवी शक्ति का प्रतीक माना जाता था। बाबुल अर्थात् बेबोलोनिया में अवतारवाद की मान्यता का विकास हुआ था। किश का राजा

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