राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १९३ राज्ञस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् । ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥ १३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था । मध्य मार्ग में एक अबला मिली । उसने राजा से भोजन की याचना की । यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते । व्यघृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाश्रयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥ १३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की । स सत्यहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् । अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥ १३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था । उसने उससे कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो ।' उसने राजा से कहा । उरुमुश अपने जीवन काल में ही ईश्वर का कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक अवतार माना जाता था । नरामसिन राजा कहता ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है । उसकी तुलना था । उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने नन्दीश के अवतार से करता है । अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा रखा था । १३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी । भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था । उल्लेख किया है । राजा जलोक का झुकाव बुद्ध मिस्री लोगों का विश्वास था । 'रा' देवता रानी के धर्म की ओर अधिक नहीं था । अपितु वर्णाश्रम साथ सहवास करता था । उससे अलौकिक शक्ति धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था । बौद्धों सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था । में आतंक व्याप्त हो गया होगा । राज्याश्रय के अभाव यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के में वे भय का अनुभव करते । वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों समान थी । वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ तुल्य मानते थे । जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि- यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है । राजा जलोक के ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे । समय बौद्धधर्मावलम्बियों की क्या स्थिति हो गयी यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष थी । यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है । में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक झुकाव है । पाठभेद : ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद मान्यता को स्वीकार करता है । महात्मा ईसा में 'यथेच्छ' मिलता है । अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है । इस्लाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक श्लोक संख्या १३३ में 'मांसं' का पाठभेद 'दातुं' शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है । मिलता है । २५