राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९४ राजतरंगिणी बोधिसत्त्वोऽसि भूपाल कोऽपि सत्त्वोर्जितव्रतः । कारुण्यं प्राणिषु दृढं यस्येदृक्ते महात्मनः ॥ १३४ ॥ १३४. 'निश्चय आप कोई बोधिसत्त्व हैं भूपाल ! और कौन ऐसा सत्यव्रती हो सकता हे ? महात्मन ! आपने जीवित प्राणियों में दृढ़ करुणा दिखायी है। बौद्धभाषामजानानो माहेश्वरतया नृपः । को बोधिसत्त्वो यं भद्रे मां वेत्सीति जगाद ताम् ॥ १३५ ॥ १३५. शिव उपासक होने के कारण नृप बौद्ध भाषा नहीं समझ सका । राजा ने जिज्ञासा की—' भद्रे ! बोधिसत्त्व क्या ? जिसे तुमने मुझे समझा है ?' पुनर्वभाषे सा भूपं श्रोतव्यं मत्प्रयोजनम् । “अहं ह्युत्थापिता बौद्धैः क्रोधाद्विप्रकृतैस्त्वया ॥ १३६ ॥ १३६. उसने पुनः उस भूप से कहा — 'प्रयोजन सुनिए मैं उन बौद्धों द्वारा भेजी गयी हूँ जिन्हें अपने क्रोध के कारण आपने दुःखी कर दिया है । पादटिप्पणियाँ : १३३(१) शरीर मांस ग्रहण : कल्हण इस श्लोक के द्वारा राजा जलोक का चरित्र महत्त्वपूर्ण बना देता है । राजा का पवित्र चरित्र निखर उठा है । कृत्या बौद्धो द्वारा भेजी गयी थी । परन्तु राजा ने असीम धैर्य, मेधा एवं दयाशीलता का परिचय दिया है । कृत्या के प्रति किंचित् मात्र क्रोध, क्षोभ किंवा द्वेष उसमें उत्पन्न नही हुआ । यद्यपि राजा बौद्ध धर्म विरोधी था, परन्तु इस श्लोक से स्पष्ट प्रकट होता है । राजा अहिंसक था । उसने बौद्धो के प्रति हिंसा वृत्ति का वरण नहीं किया था । उन्हें ताडित नही किया था । उसने राजा शिवि के समान प्राणी रक्षा के लिये अपना मास देना पसन्द किया । अपने जीवन की आहुति देना स्वीकार किया । परन्तु किसी प्राणी को कष्ट देना, उसकी हत्या करना, उसने अपनी जीवन रक्षा निमित्त भी उचित नहीं समझा । कल्हण राजा के अलौकिक गुणों का वर्णन करते हुए, उसे महाभारत वर्णित ययाति राजा के पौत्र राजा शिवि औशीनर के समकक्ष कर देता है । जिस प्रकार राजा शिवि ने कपोत की रक्षा के निमित्त अपना मांस काटकर तराजू पर रखना आरम्भ किया। अपने वचन का पालन किया। शरणागत की रक्षा की । यहाँ कल्हण राजा जलोक को और ऊपर उठा देता है । राजा किसी का भी मांस कृत्या को दे सकता था । वह अपना मांस देने के लिये न तो वचनबद्ध था और न प्रतिज्ञा किया था । परन्तु किसी भी प्राणी को उसके कारण कष्ट न हो, अतएव अपना मांस स्वतः देने पर कटिबद्ध हो गया ! १३४ (१) बोधिसत्त्व : इस शब्द का अर्थ होता है बुद्ध प्राप्ति का अधिकारी व्यक्ति किंवा पात्र । वह व्यक्ति जिसने बुद्धत्व प्राप्त नहीं किया है। वह महापुरुष जो आगे चलकर बुद्ध हो गया । भगवान् बुद्ध के जन्म काल से उनके बोध गया में बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व काल के जीवन का सम्बोधन बौद्ध ग्रन्थों में बोधिसत्त्व नाम से किया गया है। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् बोधिसत्त्व स्वयं बुद्ध हो जाते हैं । कल्हण ने यहाँ अबला विप्रा कृत्या से राजा जलोक के गुणों की प्रशंसा कराने के साथ ही उन्हें मन्दोश अवतार के समान बुद्ध अवतार होने की ओर भी संकेत किया है। वह राजा जलोक में अवतार की