राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १९५ लोकालोकाद्रिपार्श्वस्थास्तामस्यः कृतिका वयम् । बोधिसत्त्वैकशरणाः काङ्क्षन्त्यस्तमसः क्षयम् ॥ १३७ ॥ १३७. 'हम लोकालोक' पर्वत के पार्श्व की तम² निवासिनी कृत्या³ हैं। तम मुक्ति की आकांक्षा में बोधिसत्त्व के शरण में रहती हैं।' लोके भगवतो लोकनाथादारभ्य केचन । ये जन्तवो गतक्लेशा बोधिसत्त्वानवेहि तान् ॥ १३८ ॥ १३८. 'भगवान् लोकनाथ' से आरम्भ होकर अबतक इस लोक में कुछ प्राणी गतक्लेश२ हो चुके हैं उन्हें ही बोधिसत्त्व कहा जाता है। मान्यता हिन्दू और बौद्ध दोनों से दिलाता है। कृत्या राजा के मास को स्पृहा करती थी। उसने स्वयं स्वीकार किया। राजा जलोक बोधिसत्त्व है। कल्हण ने काश्मीर में निवासित बौद्ध एवं हिन्दू दोनों धर्मों- वलम्बियों के अवतार रूप में जलोक को उपस्थित किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या १३६ में 'हृत्या' का पाठभेद 'अहंकृत्या' मिलता है । श्लोक संख्या १३७ में 'तमसः' का पाठभेद 'तपसः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १३७ (१) लोकालोक पर्वत : पौराणिक गाथा के अनुसार सातों समुद्रों को परिवेष्टित करने वाली यह पर्वत श्रेणी है । 'लोकालोकश्चक्रवालः' पृथ्वी को घेरने वाले दो पर्वत लोकालोक तथा चक्रवाल हैं । (अमरः शैल वर्गः ३:२) इसका अर्थ दृश्य एवं अदृश्य लोक होता है। कृत्या का निवास स्थान यहाँ वर्णन किया गया है। वे अदृश्य लोक अथवा अन्धकार में निवास करनेवाली होती हैं । अतएव उन्हें स्पष्ट नहीं देखा जा सकता । (२) तम : यहाँ तम शब्द तामस प्रकृति, अन्धकार, तमोगुण एवं पाप के लिए प्रयुक्त किया गया है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इस अर्थ में मैं समझता हूँ कल्हण ने तम शब्द का प्रयोग किया है। तमस् का अर्थ कूप नरक का अन्धकार तथा केश भी होता है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (१०:१२०:३) में तमस् शब्द आया है। यहाँ इसका अर्थ अन्धकार किया गया है। तम आसीत् तमसा........? प्रारम्भ में तमस् ही तमस् था । सब- कुछ तम से आवृत्त था। (३) कृत्या : आभिचारिक कर्म के अर्थ में अनेक स्थानों पर कृत्या शब्द का प्रयोग किया गया है। (ऋ०:१०:८५:२८;२९) अथर्ववेद (५:१४: ११) में मनाया गया है कि कृत्या अपने कर्त्ता के पास लौट जाय। अमरकोष में (नानार्थ वर्ग ३:१५८) में कृत्या का अर्थ दिया गया है-कृत्या क्रियादेवतयोःस्त्रिपु भेद्ये धनादिभिः ।' कार्य, भूत प्रेत आदि अधम देवता, धन, स्त्री, भूमि से भेद डाले जाने वाले पराये राज्य के व्यक्ति इसका अर्थ किया गया है। इसका उल्लेख एक देवी विशेष के अर्थ में भी आता है। मारण कार्य के लिये विशेष रूप से बलिदानादि द्वारा इसको पूजा की जाती है। यह एक शक्ति विशेष अथवा देवी है। अभिचार क्रिया द्वारा किसी का वध करने के लिये अनुष्ठान विशेष द्वारा उत्पन्न की जाती है। कृत्या को तम शक्ति भी संज्ञा दी गयी है। १३८ (१) लोकनाथ : लोकनाथ से यहाँ अर्थ भगवान् बुद्ध से है। इस शब्द का अर्थ ब्राह्मण, विष्णु, शिव, राजा तथा बुद्ध होता है। (२) क्लेश : कल्हण यहाँ भगवान् बुद्ध के प्रसिद्ध शब्द 'दुःख' का उल्लेख न कर क्लेश शब्द का प्रयोग करता है। यहाँ पर क्लेश का अर्थ दुःख