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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 984 में से

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पृष्ठ 283

१९६ राजतरंगिणी सागसेऽपि न कुप्यन्ति क्षमया चोपकुर्वते । बोधिं स्वस्यैव नेच्छन्ति ते विश्वोद्धरणोद्यताः ॥ १३९ ॥ १३९. वे पापियों पर भी क्रोध नहीं करते। वे अपनी क्षमाशीलता द्वारा बुरे का बदला भले से देते हैं। वे केवल अपने लिये बोधि नहीं चाहते, अपितु विश्व की मुक्ति निमित्त उद्यत रहते हैं। विहारतूर्यनिर्घोषैरुन्निद्रः प्रेरितः खलैः । पुरा भवान्व्यधात्क्रोधाद्विहारोद्दलनं यदा ॥ १४० ॥ १४०. एक दिन विहार के तूर्य घोष द्वारा आपकी निद्रा भंग हो गयी। कतिपय खलों की प्रेरणा से आपने क्रोधित होकर विहारों के दलन का आदेश दे दिया। मानना बौद्धदर्शन तथा सिद्धान्त से अधिक मेल खायेगा। योगशास्त्र के अनुसार क्लेश मुख्यतया पाँच प्रकार के होते हैं यथा-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश। पाठभेद : श्लोक संख्या १३९ में 'क्षमया' का 'कृपया', 'बोधिं' का 'हितं' 'नेच्छन्ति' का 'नेष्यन्ति' 'श्वोद्ध- रणा' का 'श्यद्धरणो' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १४० (१) विहार दलन : विहारों के दलन करने के आदेश से मालूम होता है कि राजा जलोक बौद्धों का घोर विरोधी था और वर्णाश्रम धर्म के उद्धार निमित्त तुल गया था। कल्हण विहारों के नष्ट करने तथा भिक्षुओं के निकाले जाने का उल्लेख पुनः रा० त० १.१४०,१४१ में करता है। बौद्ध विहारों में हिन्दू देवता रखने की प्रथा बौद्धधर्म के पतन के साथ प्रारम्भ हो गयी थी। कपिलवस्तु के समीप अनेक प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में पौराणिक मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। भगवान् बुद्ध को अवतार मान- कर कालान्तर में हिन्दुओं ने बुद्ध पूजा प्रारम्भ कर दी थी। अतएव देवमन्दिरों में बुद्ध मूर्ति के साथ पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियों के रखने की प्रथा चल पड़ी थी। आज भी एक ही मन्दिर में शिव, विष्णु, नरसिंह, दुर्गा, गणेश आदि देवताओं की प्रतिमायें स्थापित की जाती है। विहारों को हिन्दू मन्दिर में परिवर्तित कर देना साधारण बात हो गयी थी। यह समय-समय पर भारत में होता रहा है। कृत्या के इस संवाद से यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि राजा का विचार बौद्धों के प्रति अच्छा नहीं था। उग्र था। इसका कारण बौद्धों की राज्य के प्रति निष्ठा में कमी होना हो सकता है। बौद्ध संघ- शरण में विश्वास रखते थे। देश एवं राष्ट्र का उनमें स्थान न था। देश एवं संघ के मतवैभिन्य अथवा शासन वैभिन्य में किसको प्राथमिकता दी जायगी यह प्रश्न मूर्तमान सर्वदा खड़ा होता रहा है। बौद्ध जीवन से विरक्त होते थे। संघ शासन में अनुशासित थे। उनकी निष्ठा संघ की अपेक्षा राज्य के प्रति कम होती थी। यह प्रश्न मध्ययुग के प्रारम्भ काल में यूरोप में भी उग्र रूप से खड़ा हो गया था। चर्च और राज्य दोनों के निष्ठाकाल में किसको प्राय- मिकता दी जायगी इस प्रश्न को लेकर शताब्दियों तक राज्य एवं चर्च में संघर्ष होता रहा है। बुद्धधर्म प्रवर्तक धर्म था। वह लोगों का मत परिवर्तित कर संघ में सम्मिलित करने में मिलते इस्लाम की तरह विश्वास करता था। सम्भव है। बौद्धों की इन मनो- वृत्तियों के कारण राजा जलोक बौद्धधर्म विरोधी हो गया होगा। उसके स्थानपर वर्णाश्रम धर्म को प्रश्रय दिया था। अनेक अनुवाद-कर्त्ताओं ने 'विहार नष्ट करने का आदेश राजा ने दिया' यह अनुवाद किया है।

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