राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ राजतरंगिणी
उसको रचना हुई थी यह उसी सर्जक ब्रह्मा के पास पुनः लौट कर मुक्त होना चाहता था । (२) चीरमोचन : नीलमत पुराण के आधार पर कहा जा सकता है कि चीरमोचन तीर्थ कनक- वाहिनी नदी के समीप कहीं था । नीलमत पुराण ( श्लोक १३२५-१३२८ ) से चीर मोचन तीर्थ के स्थान के सम्बन्ध में एक सूत्र मिल जाता है उससे स्थान का पता लगाया जा सकता है। श्रीस्टीन ने भी इस सम्बन्ध में प्रयास किया है । उन्होंने भी इस तीर्थ के सम्बन्ध में अनुमान लगाया है । चीरमोचन तीर्थ का नामकरण सप्तर्षियों के 'चीराणि' अर्थात् वल्कल वस्त्र के कारण पड़ा था । इस तीर्थ पर सप्तर्षि गण अपना चीर त्याग कर स्वर्गारोहण किये थे । नन्दि क्षेत्र माहात्म्य स्पष्टतया कनकवाहिनी नदी का सम्बन्ध चीरमोचन तीर्थ से जोड़ता है। श्री स्टीन जिस समय कश्मीर का पर्यटन कर रहे थे उस समय कश्मीर के पण्डितों को चीरमोचन तीर्थ का ज्ञान नहीं था । लम्बे काल एवं लम्बे मुस्लिम शासन के कारण अन्य तीर्थों के समान वह स्थान भी लोग भूल चुके थे । हरमुकुट के पुरोहितों से भी श्री स्टीन ने जिज्ञासा की थी । परन्तु वे भी कुछ प्रकाश नही डाल सके थे । नीलमत पुराण तीर्थों में स्नान के सम्बन्ध में उल्लेख करते हुए कनकवाहिनी और सिन्धु-संगम का उल्लेख श्लोक संख्या १३२५ में किया है । श्लोक संख्या १३२६ में पावन तथा रजोविन्द नदियों में स्नान करनेवाला पुण्डरीक तथा राजसूय फल का भागी होता है कहा गया है। श्लोक संख्या १३२७ में नीलमत पुराण कहता है कि वहाँ से चीरमोचन तीर्थ तक विस्तृत क्षेत्र वाराणसी के समान पवित्र है । श्लोक संख्या १३२८ में चीरमोचन का उल्लेख करता पुराण कहता है । चीरमोचन का पवित्र स्थान स्वर्ग मार्ग प्रशस्त करता है । वहाँ पर सभी तीर्थ उपस्थित रहते हैं । श्लोक संख्या १०२६ में नामकरण का कारण उपस्थित करता है—यहाँ सप्तर्षि अपना चीर त्याग कर स्वर्गारोहण किये थे । यहाँ स्नान करने पर पापी भी स्वर्ग गमन करते हैं। श्लोक संख्या १३३० में सोदर तीर्थ का उल्लेख दिया गया है । तयोः समागमे पुण्ये राजसूयफलं स्मृतम् । तस्माद्देशादारभ्य यावत्स्याच्चीरमोचनम् ॥ ॥ १५४१ ॥ स्वर्गमार्गप्रदं प्रोक्तं तीर्थं चीरप्रमोचनम् । दिवमुत्सृज्य चीराणि यत्र सप्तर्षयो गताः ॥ ॥ १५४३ ॥ नीलमत के अनुसार कनकवाहिनी सिन्धु तत्पश्चात् पावन एवं रजोविन्दु नदियों के बाद और सोदर तीर्थ के मध्य कहीं चीरमोचन तीर्थ होना चाहिए । दूसरा सूत्र इस स्थान का पता लगाने का यह मिलता है कि यह स्थान कनकवाहिनी नदी के समीप था । वशिष्ठाश्रम अर्थात् वेगय चीरमोचन के ऊपर कनकवाहिनी के तट पर था । सप्तऋषियों में एक ऋषि वशिष्ठ भी हैं । चीरमोचन में सप्तऋषियों ने स्वर्गारोहण किया था यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है । राजा जलोक भूतेश का उपासक था । नन्दिक्षेत्र का उसके जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध था । चीरमोचन से भूतेश्वर सीधे मार्ग से लगभग १० मिल और वशिष्ठाश्रम लगभग आठ मिल पड़ता है। क्या कारण है। राजा ने अपने प्रिय स्थान भूतेश्वर में जाकर तपस्या नहीं की। उसने चीरमोचन तीर्थ ही तपस्या निमित्त क्यो चुना ? श्री स्टीन ने इस विषय में यथेष्ठ परिश्रम तथा अनुमान लगाया है । हरमुकुट गंगा माहात्म्य में कनकवाहिनी नदी का नाम करंक नदी दिया है । करंक तीर्थ को करंक ग्राम के समीप बताया गया हैं। हरमुकुट सर की यात्रा के पूर्व इस तीर्थ में स्नान आवश्यक माना गया है। श्री स्टीन को पुरोहितों