भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग [२०३]


[बायाँ स्तम्भ]

से मालूम हुआ था। यह स्थान प्रंग ग्राम के नीचे सिंधु नदी के दक्षिण तट पर था। यह एक छोटे गाँव लरी के समीप है। प्रंग ग्राम के कुछ मकानो के पश्चात् एक छोटी धारा कनकवाहिनी की मुख्य धारा से शाखा रूप वारबुल के समीप फूट कर सिन्धु नदी में मिलती है। इस संगम स्थान पर करंक तीर्थ में विहित श्राद्ध किया जाता है। यह स्थान प्राचीन चीरमोचन तीर्थ श्री स्टीन ने माना है। उन्होंने इसका कारण उपस्थित किया है। उनका मत है कि हरमुकुट माहात्म्य प्राचीन ग्रंथ नहीं है। उसमें ग्रामों तथा स्थानों के नवीन नाम मिलते हैं। वे प्राचीन नामो के अपभ्रंश हैं। उसमें भूतेश्वर का नाम वोधेश्वर दिया गया है। अमरेश्वर का नाम अम्बो- रूह बना दिया गया है। वह वर्त्तमान अम्बुरहर है। कनकवाहिनी नदी का नाम करंक नदी दिया गया है। उसका वर्तमान नाम कंकनी नदी हो गया है। इसी प्रकार प्राचीन चीरमोचन का नाम करंक हो गया है। नीलमत पुराण, नन्दि क्षेत्र माहात्म्य तथा राज- तरंगिणी चीर मोचन का उल्लेख कनकवाहिनी के समीप करती हैं। करंक तीर्थ के विषय में वे चुप है। दूसरी तरफ हरमुकुट माहात्म्य जिसमें चीर- मोचन तीर्थ का उल्लेख नहीं है। करंक तीर्थ को कंकनी नदी के समीप बताता है। नीलमत पुराण इस स्थान का तथा क्षेत्र का निश्चित पता देता है। मैं वहाँ पर आया था। मुझे वहाँ कोई प्राचीन चिह्न नहीं प्राप्त हुआ। मेरे मन में यह तर्क उठा था। जलोक ने तपस्या निमित्त इस स्थान को क्यो चुना था ? राजा ने भूतेश्वर जैसे दुर्गम स्थान में जाना पसन्द न किया होगा। दोनो स्थान देखने पर निस्सन्देह वर्तमान चीरमोचन का स्थान अधिक शांत मालूम होता है। भूतेश्वर में कनकवाहिनी या कंकरुल उग्र निनाद होता रहता है। स्थान उत्तुङ्ग पर्वत से आवृत है। तेज पर्वतीय हवा चलती है। भयंकर तुषारपात


[दायाँ स्तम्भ]

होता है। जंगली जन्तुओं का उपद्रव आज की अपेक्षा उस समय और अधिक रहा होगा। यह स्थान राजधानी श्रीनगर से लगभग पन्द्रह मिल दूर है। श्रीनगर से चीरमोचन तक का मार्ग पहाडी नहीं बल्कि समथर है। दिन मे आसानी से व्यक्ति श्रीनगर से घोड़ो से पहुँच और लौट सकता था। वह स्थान श्रीनगर के धुर उत्तर है। वहाँ से वितस्ता सिंधु संगम अर्थात् प्रयाग लगभग बीस मिल दक्षिण पश्चिम पड़ता है। काश्मीरी राजाओं का दाह प्रयाग में होना पुण्य माना जाता रहा है। आज भी यह प्रथा प्रचलित है। काश्मीरी ब्राह्मण या तो यहाँ फूंका जाना पसन्द करते हैं अथवा उनका अस्थि विसर्जन यहाँ किया जाता है। पंडित जवाहरलाल नेहरू काश्मीरी ब्राह्मण थे। उनके भस्म के एक भाग का यहाँ प्रवाह किया गया था। राजा जलौक ने अपने स्वर्गारोहण निमित्त यह स्थान उपयुक्त ही चुना था। स्थान राजधानी तथा दाह स्थान दोनो से दूर थे। काल की दिशा दक्षिण समझी जाती है। चीरमोचन से प्रयाग संगम दक्षिण दिशा की ओर पड़ता है। स्वर्गारोहण के लिये उत्तर दिशा श्रेष्ठ मानी गयी है। पाण्डवों ने उत्तर दिशा में ही गमन किया था। भगवान् बुद्ध राजगृह से उत्तर दिशा कुशीनगर में आये थे। राजा जलौक स्वर्गारोहण निमित्त अपना राजप्रासाद त्याग कर उत्तर दिशा चीरमोचन पहुँचा था। राजाने प्रतीत होता है। इच्छामृत्यु प्राप्त की थी। योग एवं ध्यान के लिये उस काल में जब चीर- मोचन मे आबादी न रही होगी, स्थान शान्त, प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों उपद्रवों तथा कोलाहलों से दूर था। वह भूतेश्वर जैसे घोर पर्वतीय एवं श्रीनगर जैसे जनाकीर्ण स्थानों के मध्य में था। वह स्थान ध्यान .योग एवं समाधि के लिए उपयुक्त था। सप्तर्षियो ने चीरमोचन मे स्वर्गारोहण किया था। वशिष्ट ब्रह्मा के पुत्र हैं। राजा ने ब्रह्मासन लगाया था। ब्रह्मा की उपासना की थी। चीरमोचन स्थान