राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ राजतरंगिणी राज्ञा कनकवाहिन्याः शुचिगत्पुण्यकर्मणा । नन्दीशस्पर्शनोत्कण्ठा तेनानीयत कुण्ठताम् ॥ १५० ॥ १५०. उस पवित्र पुण्यात्मा राजा की कुछ समय पश्चात् नन्दीश स्पर्श की प्रबल उत्कण्ठा कनकवाहिनी २ नदी के कारण कुण्ठित हो गयी। सप्तर्षियों के स्वर्गारोहण के कारण पवित्र माना जाता था । अतएव ऐसे पुण्य स्थान का चयन भावना तथा विवेक दोनों दृष्टियों से राजा ने उचित ही किया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १४९ में 'कनकवाहिन्याः' का 'कनकवाहिन्या', 'स्पर्शनो' का 'स्पर्शने' तथा 'कुण्ठताम्' का पाठभेद 'कुण्ठनाम्' और 'कुण्डनाम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५० (१) श्लोक १५० : यह श्लोक कुछ स्पष्ट नहीं है। इसका अर्थ बैठता नहीं। कनक वाहिनी के कारण राजा की उत्कण्ठा क्यों कुण्ठित हुई समझ में नहीं आता । श्री स्टीन ने उक्त श्लोक को पादटिप्पणी में श्लोक को स्पष्ट करने के लिए एक और अर्थ किया है—राजा ने अपनी तपस्या द्वारा कनकवाहिनी नदी की नन्दीश के स्पर्श की इच्छा धीरे-धीरे शिथिल कर दिया । मैं इसका अर्थ यह लगाता हूँ कि राजा स्वयं अवतार था। नन्दीश स्वरूप हो गया था। कनक- वाहिनी नदी नन्दी क्षेत्र से प्रवाहित होती आती है। उसने राजा के ही तपस्या के कारण नन्दीश स्वरूप समझा। अतएव कनकवाहिनी नदी की नन्दीश स्पर्श की कामना नहीं रह गयी। यदि इसका अनुवाद वाला उक्त अर्थ मान लिया जाय तो उसका भाष्य यही किया जा सकता है कि राजा अपनी तपस्या के कारण इस स्तर पर पहुँच गया था कि उसकी नन्दी स्पर्श की उत्कण्ठा कनकवाहिनी के कारण इसलिए कुण्ठित हो गयी थी कि कनक- वाहिनी नन्दी क्षेत्र का स्पर्श करती नित्य प्रति चली आ रही थी । वह राजा कनकवाहिनी में स्नान कर, उसके समीप तपस्या कर स्वयं अनुभव करता रहा कि प्रत्येक जल बिन्दु नन्दिक्षेत्र से स्पर्श करते चले आ रहे हैं। उनके माध्यम से नन्दीश का स्पर्श कर चुका है। एतदर्थ नन्दीश स्पर्श की जो कामना तिरोहित हो चुकी थी। वह तपस्या के कारण नन्दीश का सांनिध्य प्राप्त कर चुका था। (२) कनकवाहिनी : नीलमत पुराण (श्लोक १३३०—१३३१) इस नदी का स्थान निश्चित कर देता है। चोरमोचन के पश्चात् श्लोक संख्या १३३० में नीलमत सोदर तीर्थ के स्थान का महत्त्व बताता है। तत्पश्चात् श्लोक संख्या १. १२३१ में कनकवाहिनी तथा कालोदया नदी के संगम में स्नान करने का उल्लेख करता है। संयोगं सिन्धुना यत्र गता कनकवाहिनी । गोसहस्रम् वाप्नोति धनवानपि जायते ॥ ॥ १५३९ ॥ तथा कनकवाहिन्या संगम याति यो नरः । तथा कालोदया पुण्या नदी यत्रैव संगता ॥ ॥ १५४० ॥ स्नात्वा तत्र दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः । सोदरे तु नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ॥ १५४१ ॥ एकमत है कि नीलमत वर्णित हिरण्या नदी ही कनकवाहिनी नदी है । 'हरिणीनी पुण्यजला नाम्ना' यह स्रोतस्विनी भूतेश्वर के नीचे से बहती है। इसे आजकल कंकनी अथवा ककनई नदी कहते हैं।