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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

२०४ राजतरंगिणी राज्ञा कनकवाहिन्याः शुचिगत्पुण्यकर्मणा । नन्दीशस्पर्शनोत्कण्ठा तेनानीयत कुण्ठताम् ॥ १५० ॥ १५०. उस पवित्र पुण्यात्मा राजा की कुछ समय पश्चात् नन्दीश स्पर्श की प्रबल उत्कण्ठा कनकवाहिनी २ नदी के कारण कुण्ठित हो गयी। सप्तर्षियों के स्वर्गारोहण के कारण पवित्र माना जाता था । अतएव ऐसे पुण्य स्थान का चयन भावना तथा विवेक दोनों दृष्टियों से राजा ने उचित ही किया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १४९ में 'कनकवाहिन्याः' का 'कनकवाहिन्या', 'स्पर्शनो' का 'स्पर्शने' तथा 'कुण्ठताम्' का पाठभेद 'कुण्ठनाम्' और 'कुण्डनाम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५० (१) श्लोक १५० : यह श्लोक कुछ स्पष्ट नहीं है। इसका अर्थ बैठता नहीं। कनक वाहिनी के कारण राजा की उत्कण्ठा क्यों कुण्ठित हुई समझ में नहीं आता । श्री स्टीन ने उक्त श्लोक को पादटिप्पणी में श्लोक को स्पष्ट करने के लिए एक और अर्थ किया है—राजा ने अपनी तपस्या द्वारा कनकवाहिनी नदी की नन्दीश के स्पर्श की इच्छा धीरे-धीरे शिथिल कर दिया । मैं इसका अर्थ यह लगाता हूँ कि राजा स्वयं अवतार था। नन्दीश स्वरूप हो गया था। कनक- वाहिनी नदी नन्दी क्षेत्र से प्रवाहित होती आती है। उसने राजा के ही तपस्या के कारण नन्दीश स्वरूप समझा। अतएव कनकवाहिनी नदी की नन्दीश स्पर्श की कामना नहीं रह गयी। यदि इसका अनुवाद वाला उक्त अर्थ मान लिया जाय तो उसका भाष्य यही किया जा सकता है कि राजा अपनी तपस्या के कारण इस स्तर पर पहुँच गया था कि उसकी नन्दी स्पर्श की उत्कण्ठा कनकवाहिनी के कारण इसलिए कुण्ठित हो गयी थी कि कनक- वाहिनी नन्दी क्षेत्र का स्पर्श करती नित्य प्रति चली आ रही थी । वह राजा कनकवाहिनी में स्नान कर, उसके समीप तपस्या कर स्वयं अनुभव करता रहा कि प्रत्येक जल बिन्दु नन्दिक्षेत्र से स्पर्श करते चले आ रहे हैं। उनके माध्यम से नन्दीश का स्पर्श कर चुका है। एतदर्थ नन्दीश स्पर्श की जो कामना तिरोहित हो चुकी थी। वह तपस्या के कारण नन्दीश का सांनिध्य प्राप्त कर चुका था। (२) कनकवाहिनी : नीलमत पुराण (श्लोक १३३०—१३३१) इस नदी का स्थान निश्चित कर देता है। चोरमोचन के पश्चात् श्लोक संख्या १३३० में नीलमत सोदर तीर्थ के स्थान का महत्त्व बताता है। तत्पश्चात् श्लोक संख्या १. १२३१ में कनकवाहिनी तथा कालोदया नदी के संगम में स्नान करने का उल्लेख करता है। संयोगं सिन्धुना यत्र गता कनकवाहिनी । गोसहस्रम् वाप्नोति धनवानपि जायते ॥ ॥ १५३९ ॥ तथा कनकवाहिन्या संगम याति यो नरः । तथा कालोदया पुण्या नदी यत्रैव संगता ॥ ॥ १५४० ॥ स्नात्वा तत्र दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः । सोदरे तु नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ॥ १५४१ ॥ एकमत है कि नीलमत वर्णित हिरण्या नदी ही कनकवाहिनी नदी है । 'हरिणीनी पुण्यजला नाम्ना' यह स्रोतस्विनी भूतेश्वर के नीचे से बहती है। इसे आजकल कंकनी अथवा ककनई नदी कहते हैं।

प्रथम तरंग ५०२ ह्लादोद्यान्नृत्तगीतक्षणे नर्तितुमुत्थितम् । प्रददौ ज्येष्ठरुद्राय सोऽवरोधवधुशतम् ॥ १५१ ॥ १५१. ज्येष्ठ रुद्र¹ के नृत्य एवं गान² के समय अन्तःपुर की स्त्रियों को नृत्य एवं गान निमित्त खड़ी होती देखकर आह्लादित राजा ने एक शत स्त्रियाँ ज्येष्ठरुद्र को दे दीं ।

भूतेश्वर के ऊपर अर्थात् उत्तर तरफ अनेक नाग पड़ते हैं। उनमें ब्रह्मसर भी एक नाग पड़ता है उसके ऊपर कालोदक है । हरमुकुट गंगा का यह अन्तिम तीर्थ स्थल है । प्रति वर्ष भाद्रपद में तीर्थ यात्रा काल पड़ता है । वर्ष मे जो लोग दिवंगत होते हैं, उनका अस्थि प्रवाह भी इसमें किया जाता है । इस सर के कुछ नीचे एक दूसरा सर है । उसे कालोदरू कहते हैं । नन्दीसर भी उसकी एक संज्ञा है। गाथा है। काल तथा शिव दोनों का यह निवास स्थान था। यही शिव के नन्दी भी रहते थे। कनकवाहिनी नदी में इनका तथा हरमुकुट पर्वत के पूर्व तथा दक्षिण पूर्व का जल कनकवाहिनी में आता है। नीलमत पुराण के अनुसार कनकवाहिनी का प्रवाह सोदर तीर्थ के दक्षिण है । यह काश्मीर का मानचित्र देखने से स्पष्ट होता है । वह उत्तर से बहती आती है। भूतेश्वर के समीपस्थ भूखण्ड का स्पर्श करती नीचे बहती दक्षिण की ओर चली जाती है। यदि सोदर अर्थात् नरनाग अथवा भूतेश्वर मन्दिर पर खड़े होकर देखें तो इन स्थानों के पूर्वीय अंचल का स्पर्श करती भयंकर गर्त में, बहती दक्षिण दिशा की ओर चली जाती है । कनकवाहिनी में हरमुकुट के गंगा सरोवर अर्थात् गंगवल और पवित्र नन्द कोल के जलस्रोत आकर मिलते हैं ।

(२) नृत्य एवं गान : मन्दिरों में देवताओ के सम्मुख नृत्य एवं गान निमित्त स्त्रियो की नियुक्त करने की प्रथा कश्मीर में प्राचीन काल से प्रचलित थी । गान तथा नृत्य वंश परम्परा गत भी चलता था। देव दासी प्रथा दक्षिण भारत की तरह इस समय कश्मीर में प्रचलित नही थी परन्तु स्त्रियाँ स्वतः अपने को देवता पर अर्पित कर देती थी। नृत्य एवं संगीत कार्य पेशेवर स्त्रियो तक सीमित नही था। मन्दिरो तथा देवालयों में घर गृहस्थो की भी स्त्रियाँ नृत्य एवं गान में भाग लेतो थी ।

कल्हण ने (रा० त० ४:२६९-२७०) राजा ललितादित्य के प्रसंग में वंशानुगत नृत्य एवं गान की प्रथा का वर्णन किया है। राजा ललिता- दित्य को एक वन में युवतियां नाचती और गाती दिखायी पड़ी थी । राजा ने उनसे उस एकान्त स्थान मे नृत्य एवं गान का कारण पूछा। युवतियो ने राजा को सूचित किया कि इस स्थान पर अनादि काल से उनके कुटुम्ब की कन्या किंवा युवतियों निश्चित समय पर आती थी । नाचती थीं । गाती थी । पुनः चली जाती थीं। राजा चकित हुआ । वहाँ उनका नृत्य तथा गान सुनने अथवा देखने वाला कोई नही था । प्रसंग वश उसे मालूम हुआ था । वहीं कोई देव स्थान कभी था। राजा को कौतूहल हुआ । उसने उस स्थान पर खनन कार्य किया । भूमि के नीचे केशव का मन्दिर मिला। वह शताब्दियों से वही भूमिस्थ हो गया था। अथवा मिट्टी पड़ते-पड़ते वह छिप गया था ।

वहाँ मन्दिर था। वह परम्परा किंवा जनश्रुति चली आ रही थी। जिस कुटुम्ब के लोग मन्दिर में गाते तथा नाचते रहे वे मन्दिर के भूमि में लोप

पाठभेद : श्लोक संख्या १५१ में 'नृत्त' का 'नृत्य' तथा 'सोऽवरोध' का पाठभेद 'स्वावराध' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : १५१ (१) ज्येष्ठरुद्र वादटिप्पणी १.११३ द्रष्टव्य है।

२०६ राजतरंगिणी भुक्तवैश्वर्यं स पर्यन्ते प्रविष्टश्चीरमोचनम् । पत्न्या समं ययौ राजा सायुज्यं गिरिजापतेः ॥ १५२ ॥ १५२. ऐश्वर्य भोगकर राजा ने चीरमोचन में अपनी पत्नी १ के साथ प्रवेश किया । पत्नी सहित उस राजा ने गिरिजापति के साथ सायुज्य २ प्राप्त किया । हो जाने पर भी नियमतः नृत्य एवं गान की परम्परा पाठभेद : का निर्वाह करते चले आ रहे थे । श्लोक संख्या १५० में 'प्रविष्टश्चो' का पाठभेद इसी तरंग के छत्तीसवं श्लोक में नोण वणिक् 'प्रतिष्ठं चो' तथा 'प्रविष्टञ्चो' मिलता है । का वर्णन मिलता है। उसने अपनी पत्नी को मन्दिर पादटिप्पणियाँ : में गान एवं नृत्य निमित्त दान कर दिया था । १५२ (१) पत्नी : कल्हण ने राजा का चरित्र कश्मीर में नृत्य एवं संगीत कला पुरा काल से पवित्रता तथा धार्मिक प्रवृत्ति से 'पूर्ण कर दिया है । ही विकसित थी। राजा स्वयं नृत्य एवं संगीत में कल्हण यहाँ केवल एक ही पत्नी का उल्लेख करता भाग लेते थे । इस तरंग के श्लोक ४२३ से पता है । प्रतीत होता है । राजा एक पत्नीव्रतधारी था । चलता है कि राजा जयापीड ने भरत मुनि कृत उसका आचरण अनुकरणीय था । पत्नी भौतिक सुख नाट्य शास्त्र का अध्ययन किया था। वह नृत्य तथा त्याग कर पति के साथ चीरमोचन तीर्थ में स्वर्गारोहण संगीत का विद्वान् था । निमित्त आयी थी । पति का जीवन पर्यन्त साथ दिया काश्मीर का राजा हर्ष स्वयं संगीत एवं नृत्य था । अन्तिम समय में भी साथ दिया । वह लोक में विशारद था । उसके रचित गीत जनता गाती थी । साथ थी। परलोक साथ गयी । राजा स्वयं नृत्य एवं संगीत की शिक्षा लोगों को पति के साथ पत्नी सती हुई इसका उल्लेख देता था। युवराज काल में ही वह अपने पिता नहीं मिलता है। यदि वह सती होती तो कल्हण राजा कलश की राज्य सभा में गीत की रचना उसका अवश्य उल्लेख करता । राजा ने जिस करता था । उन्हें स्वयं गाता था । प्रकार अन्तिम काल में योग का आश्रय लिया और इच्छा मृत्यु प्राप्त की। उसी प्रकार पत्नी ने भी तरंग (७०६-७१०) में मदिरालय में वृद्धा मृत्यु प्राप्त किया होगा । राजा मृत्यु के आलिंगन की वेश्या के नाचने का उल्लेख मिलता है । कर्णवती प्रबल उत्कण्ठा से चीरमोचन तीर्थ में प्रविष्ट हुआ नर्तकी का उल्लेख (रा . त . ७ ० १४६० में) था । श्रीनगर राजप्रासाद में भौतिक प्रसाधनों के मिलता है। कश्मीर की राजसभा के गायक तथा मध्य मरना उसे अच्छा नहीं लगा । वह सप्तर्षियों नर्तकी समाज में विशिष्ट स्थान रखते थे । उनकी के समान स्वेच्छया स्वर्ग जाना चाहता था। कल्हण तुलना यूनान के हेटेरेरा वर्ग से की जा सकती है । इसी ओर संकेत करता है कि राजा अपनी पत्नी के कश्मीर में नृत्य, संगीत तथा काम कला बहुत साथ सायुज्य प्राप्त किया । विकसित थी । कुट्टनीमत जैसे ग्रन्थो का समाज (२) सायुज्य : पाँच प्रकार की मुक्तियों में में स्थान था । उसका रचनाकार स्वयं राजा यह एक प्रकार की मुक्ति है। एक दूसरे में इस जयापीड का मंत्री दामोदर गुप्त था। उसके अध्ययन प्रकार मिल जाता कि परस्पर किसी प्रकार का से कश्मीर के उत्साहपूर्ण, उल्लासपूर्ण, उमंगपूर्ण, भेद न रह जाय इस प्रकार की मुक्ति को आह्लादपूर्ण मस्त जीवन की एक झाँकी मिलती है। सायुज्य कहते हैं ।

प्रथम तरंग २०७ कल्हण ने यहाँ शिव, शंकर, महादेव का नाम न लेकर गिरिजापति का नाम लिया है । यह विशेष महत्त्व रखता है । कल्हण संकेत करता है । राजा और रानी दोनों ने शरीर विसर्जन कर सायुज्य प्राप्त किया । इसलिये कल्हण ने कवि दृष्टि से गिरिजापति अर्थात् शिव शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । पत्नी पति की अर्द्धांगिनी होती है । इसी से अर्धनारीश्वर की कल्पना की गयी है । शिव का शरीर पत्नी एवं पति दोनों का योग अर्थात् अर्धनारीश्वर है । एक भाग शिव तथा दूसरा भाग पार्वती का है। गिरिजा और पति दोनों मिलकर शिव हुए हैं । अतएव राजा जलोक अपनी पत्नी के साथ सायुज्य प्राप्त किया । अर्थात् शिव में मिल कर एकाकार हो गया । मुक्त हो गया । राजा का अंश शिव तथा पत्नी का अंश गिरिजा में मिलकर एक ही अर्धनारीश्वर के शरीर में साथ ही विलीन हो गये । पुरुष मिल गया पुरुष भाग में और स्त्री मिल गई स्त्री भाग में । सायुज्य शब्द का प्रयोग कल्हण ने बहुत समझ और तौलकर यहाँ किया है । राजा ब्रह्मासन पर बैठा था । उसे ब्रह्मलीन होना न कहकर गीरोपति अर्थात् शिव में सायुज्य प्राप्त करना लिखता है। ब्रह्मलीन केवल ऋषि तथा ब्राह्मणो का होना पुरानी परम्परा के अनुसार कहा गया है। राजा जलोक ब्राह्मण नहीं था । राजर्षि था । ऋषि नही था । अतएव कल्हण पुरानी परम्परा का निर्वाह करते हुए सायुज्य का उल्लेख करता है । कल्हण स्वयं शैव था अतएव उसकी दृष्टि में शिव के सायुज्य को विशेष महत्त्व था । मूल्यांकनः जलोक का चरित्र चित्रण भारतीय इतिहास में शून्यवत् है । उसका उल्लेख सर्वत्र अशोक के एक पुत्र के सन्दर्भ में किया गया है । राजा जलोक का चरित्र इतना महान् एवं आदर्श है कि उसके जैसे चरित्रवान राजा विश्व में इने गिने मिलेंगे । कल्कि अवतार का वर्णन पुराणों में मिलता है । म्लेच्छों के नाश तथा धर्म के पुन.स्थापना निमित्त कल्कि अवतार होने की भविष्यद् वाणी की गयी है । कल्कि के काल्पनिक रूप एवं क्रिया कलाप से जलोक का क्रिया कलाप मिलता है । सम्भव है जलोक का ही कल्कि अवतार की कल्पना रूप में चित्रण किया गया हो । परन्तु इस विवाद में यहाँ पड़ना उचित नहीं है । जलोक कल्कि अवतार के समान महान् सेनानी था । उसने म्लेच्छों से भूमि से विहीन किया । कल्हण के शब्दों में वह स्वयं अवतार था । बौद्धों के शब्दों में यह बोधिसत्त्व था । तत्कालीन सनातन धर्म तथा बौद्ध धर्म दोनों मतावलम्बियों ने उसे अवतार चाहे न भी हो अवतार के समकक्ष माना है । जलोक महान् सेनानी के अतिरिक्त, आदर्श राजा, विद्वान्, द्रष्टा, संगठन कर्ता, चरित्रमान, उदार, सहिष्णु, सरल, धर्मभीरु, दानी, एक पत्नीव्रतधारी, कर्मठ एवं योगी था । उसने इच्छा मृत्यु पाकर, स्वयं योग द्वारा शरीर त्याग कर, अपनी श्रेष्ठता तथा अलौकिकता की छाप लगायी है । राजा ने विदेशियों से कश्मीर मण्डल को मुक्त किया । कश्मीर की सैनिक शक्ति का संगठन किया । उसने कश्मीर वीरों को फौलाद की दीवाल तुल्य बना दिया । उन्हें विश्व के यूनानी जैसे वीर सैनिकों के सामने खड़ा कर दिया। वह राज्य पाकर बैठा नहीं रहा । ऐश्वर्य में डूबा नहीं । उसने एक विज्ञ कर्मशील राजा तुल्य अस्त्र उठाया । अभियान किया । भूखण्ड विजय किया । किन्तु उपनिवेशवाद का वरण नहीं किया । उसने विजय करने के पश्चात् भी कश्मीर मण्डल के अतिरिक्त अन्य भूखण्डों पर राज्य नहीं किया । उन्हें अपने राज्य में सम्मिलित नहीं किया । उनमें मित्रता स्थापित की । जिनका राज्य था उन्ही को वहाँ रहने दिया । उसने कश्मीर का सामरिक एवं सुरक्षा दृष्टि से अध्ययन किया । चतुर सेनापति के समान वह समझ गया । कश्मीर की सुरक्षा उसके संकट या द्वार

२०८ राजतरंगिणी अर्थात् दरों की रक्षा पर अवलम्बित है। यह प्रथम कश्मीरी राजा था जिसने एक ठोस सैनिक नीति की स्थापना की। उसने भविष्य के राजाओं को चेतावनी दी जबतक कश्मीर के द्वारों की दृढ़ता पूर्वक रक्षा होती रहेगी, कश्मीर की स्वतन्त्रता कायम रहेगी। राजा ने द्वारों अर्थात् दरों की मोर्चेबन्दी की। वहीं सैनिक चौकियां तथा शिविर स्थापित किया। और उसकी रानी ईशान देवी ने द्वारों की रक्षा के निमित्त आध्यात्मिक शक्ति मातृ चक्रों की स्थापना की। यदि पति ने भौतिक शक्ति को उत्साहित किया तो पत्नी ने आध्यात्मिक शक्ति का कश्मीर मण्डल की रक्षा के लिये आश्रय लिया। वह धर्म निरपेक्ष किंवा लौकिक राजा था। उसने सभी धर्मों के प्रति समभाव रखा। बौद्धों के प्रति उसका रोष स्वाभाविक था। बौद्धों का संघटन, राष्ट्र के प्रति निसंकोच निष्ठा भावना का अभाव, प्रारम्भ में उसे उनका विरोधी बना दिया था। उसने सनातन धर्म की पुनः स्थापना की। कल्कि अवतार तुल्य उसने सनातन धर्म का कश्मीर मण्डल में उद्धार किया। परन्तु समय आते ही वह सहिष्णु हो गया। कृत्या के साथ हुआ उसका संवाद उसके चरित्र को ऊपर उठा देता है। वह बौद्धों के प्रति झुकता है। उनके विहारों की स्थापना करता है। उनके प्रति क्रोध, उग्र व्यवहार सबको तिरोहित कर देता है। स्वमांस देने की घटना उसे पौराणिक आदर्श राजाओं की श्रेणी में बैठा देती है। राजा लोकप्रिय था। लोकनायक था। लोक वीर था। अनेक लोकविजेता था। लोकनाथ था। अनेक लोकप्रिय गाथाएं उसके जीवन के साथ सम्बन्धित कर दी गयी थीं। उसकी महानता प्रमाणित करने के लिये अनेक अलौकिक घटना पूर्ण गाथाएं उसके नाम के साथ जोड़ दी गयी हैं। राजा ने कश्मीर मण्डल को ऊपर उठाया। तत्कालीन ऐतिहासिक जगत् में उसका स्थान बनाया। उसने अनेक उपनिवेश कश्मीर मण्डल में बसाये। जनजीवन को उन्नत किया। समाज को विकसित करने के लिये विद्या का आश्रय लिया। जनता में नव चेतना एवं स्फूर्ति का संचार किया। उसने कश्मीर मण्डल में नव क्रान्ति की। जिसने कश्मीर जीवन में एक नवीन प्रेरणा का सूत्रपात किया। निष्क्रियता से लोगों को उठाकर कर्मशीलता की ओर प्रेरित किया। राजशास्त्र का राजा विद्वान् था। राजशास्त्र का अध्ययन किया था। यह उसके प्रशासनिक सुधारों से स्पष्ट प्रतीत होता है। उसने रूढ एवं जड़ता प्राप्त प्राचीन शासन पद्धति में आमूल परिवर्तन किया। उसे समयोपयोगी बनाया। शासन के ढाँचे को वैज्ञानिक ढंग पर ढाला। शासन पद्धति का नवीनीकरण किया। पुनःसंघटन किया। शासन को जनता के लिए उपयोगी बनाया। जनता की सुविधा, कार्यों की सरलता, समृद्धि का ध्यान रखते हुए राज्ययन्त्र को सुशासित, समयोपयोगी एवं मुनियोजित किया। अशोक ने भेरी घोष के स्थान पर धर्म घोष किया था। उसके पुत्र जलोक ने भेरी घोष किया, धर्मघोष किया और विवेक घोष का आश्रय लिया। उसने अपना जीवन एकांगी नहीं बनाया। उसने अपने जीवन को राज्योपम सन्तुलित रखा। किसी का त्याग, किसी का नितान्त विसर्जन, किसी का सम्पूर्ण ग्रहण, उसने नहीं किया। राज्य के लिए, लोक के लिये, जब जिस समय, जो उपयोगी सिद्ध हुआ, उसे एक राजर्षि तुल्य निस्संकोच ग्रहण किया। सन्त अवधूत ने अपने पाण्डित्य से बौद्धों को शास्त्रार्थ में परास्त किया था। लोक ने इन खण्डन मण्डन से स्वयं निष्कर्ष निकाला। अपना मार्ग सुनिश्चित किया। शैवमतावलम्बी होते हुए भी वह सहिष्णु था। कृत्या की घटना से स्पष्ट करती है। बौद्धों के प्रति जो भी कुछ विरोधी भाव था उसे वर्णाश्रम धर्म प्रचार भावना की प्रबलता होते ही क्षण मात्र में त्याग दिया। उसने विनष्ट विहारों का पुनर्निमाण, राजकोश

प्रथम तरंग २०९ से कराया । उसने मिथ्या राजकीय मान एवं प्रतिष्ठा का आश्रय नहीं लिया । बौद्धो के प्रति आदर का भाव प्रकट किया । वर्णाश्रम धर्मप्रचारार्थ शक्ति का आश्रय नहीं लिया । शास्त्रार्थ द्वारा मत परिवर्तन के लोक तान्त्रिक प्रणाली का अनु- करण किया ! राजा के विरोधी बौद्धो ने अन्त में उसे स्वयं बोधिसत्त्व मानकर आदर किया । उसे सर्वश्रेष्ठ उपाधि किंवा पद, जो बौद्ध जगत् में हो सकता था, दिया । विश्व में इस प्रकार के कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ अपने विरोधियों से इतना आदर एक व्यक्ति ने पाया हो । विश्व में अपनी जनता का जितना विश्वास तथा आदर राजा जलौक ने पाया है उस तरह के उदाहरण कम मिलते हैं । हिन्दुओं ने उसे अवतार तुल्य माना और बौद्धों ने बोधिसत्त्व तुल्य । इस प्रकार तत्कालीन दो विरोधी धर्मानुयायियों का राजा आदर्श हो गया । परस्पर विरोधी विचारों, विरोधी दर्शनों, विरोधी मतों सबका उसने विश्वास प्राप्त किया था । राजा वास्तव में राजर्षि था । विदेह था । कृत्या ने राजा से ठीक ही कहा था । वह बोधिसत्त्व था । इस एक शब्द बोधिसत्त्व का प्रयोग कर कल्हण ने राजा के पवित्र आदर्श चरित्र का चित्रण कर दिया है । शिव विजयेश, नन्दीश के उपासक रूप में उसे चित्रित कर कल्हण ने उसे साधारण मानव तल से उठाकर अलौकिक पुरुष की श्रेणी में रख दिया है । तथापि लोक, समाज, नित्य एवं नैमित्तिक कर्मों से उसे कल्हण ने अलग रखने का प्रयास नहीं किया है । राजा कार्यपटु था । दृढ़निश्चयी था । कृत- संकल्प था । भूतेशवर तथा विजयेश्वर के दर्शन की प्रतिज्ञा का निर्वाह करता था । उसकी इस निष्ठा को देखकर नाग भी द्रवीभूत हो गया था । राजा में अहंकार नहीं था । कल्हण उसमें कोई दोष नहीं निकाल सका है । कल्हण ने निष्पक्ष भाव से राजाओं के दोष एवं गुण का वर्णन किया है किन्तु राजा जलौक का चरित्र शुद्ध जल तुल्य निर्मल था । राजा सुधार करने में किंचित् मात्र संकोच नहीं करता था । वह पाखण्ड एवं आडम्बरों से धर्म एवं समाज को दूर रखना चाहता था । उसके समय मन्दिरों तथा विहारों में बेढंगे रूप से वाद्य बजते थे । धार्मिक कृत्यों में, उपासना में, इनका क्या स्थान हो सकता था ? वे जनता की निद्रा में, स्थान की शान्ति में बाधक होते थे । राजा इस पाखण्ड के कारण विहारों से चिढ़ गया । प्रतीत होता है । आजकल के समान बेडौल रूप घण्टा-घड़ियाल, झांझ, शंख घोंगे तथा लाउड स्पीकर, रेडियो बजते थे । राजा को यह अप्रिय लगा । उसने इनका कोई उपयोग नहीं देखा । किन्तु दूसरी ओर देवस्थानों के जीवन को सरस तथा कलात्मक बनाने के लिये राजा ने निःसंकोच एक शत नृत्य गान निपुण ललनाओं को मन्दिरों के लिये दे दिया था । वह स्वयं मन्दिरों के सांस्कृतिक कार्य क्रमों में भाग लेता था । उसने मन्दिरों में नृत्य, संगीत शास्त्र कला विशारदों को रखकर, देवस्थानों को जन जीवन का एक अंग बना दिया । उसके प्रति लोक में रुचि उत्पन्न किया । सरसता का सृजन किया । उन्हें केवल पूजा के स्थान पर जन-जीवन का, सामाजिक कार्य-क्रमों का, एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र बना दिया । उसने ललित कलाओं में भी आध्यात्मिकता की भावना भर कर उन्हें पवित्र बनाने का प्रयास किया । देवस्थानों में बाल, युवा, वृद्ध नर-नारी सभी एकत्रित होकर नृत्य, एवं संगीतादि के साथ अध्यात्म का दर्शन कर सकते थे । ललित कला, नृत्य संगीत नाटकादि को विलास की सामग्री न बनाकर उन्हें देवस्थानों से सम्बन्धित कर उन्हें आध्यात्मिकता का चोला पहनाकर मानव को विकासोन्मुख करते हुए, देखो २७

२१० राजतरंगिणी

जीवन का अविच्छिन्न अंग बना दिया था । संगीता- दिकला पेशा न होकर, क्रय-विक्रय की सामग्री न होकर, भगवान् के मनोरंजन, उनके प्रति श्रद्धा भक्ति प्रकट करने, उनके सानिध्य में रहने का एक साधन हो गयी । कला जीविकोपार्जन का साधन न होकर मानव विकास का सोपान बन गयी । राजा ने राजकोश का प्रयोग अपने विलास के लिये नहीं किया । जनता का धन जनता के जीवन स्तर को उठाने के लिये, सार्वजनिक कार्यों के लिये खर्च किया । उसने मन्दिरों पर दान चढ़ाया । विहारों का निर्माण कराया । मन्दिरों का निर्माण कराया । जनता को उनके लिये सक्रिय किया । उनके सम्मुख दान का आदर्श रखा । राजा की देश-भक्ति संकुचित नहीं थी । वह प्रतिक्रियावादी नहीं था । उसने कश्मीर मण्डल का सामाजिक ढाँचा शिथिल देखा । रूद्ध देखा । जड़ देखा । विद्या की कमी देखी । उसने सोत्साह कश्मीर के बाहर से विद्वानों को बुलाया । उन्हें सब तरह की सुविधा देकर कश्मीर को समृद्ध करने की ओर उन्हें प्रेरित किया । निश्चित योजनानुसार चलाने का स्तुत्य प्रयास किया । राजा का व्यक्तिगत चरित्र बड़ा निर्मल था । वह राज्य कार्य में व्यस्त रहने पर भी धार्मिक कर्म से विरत नहीं हो सका । उसने भौतिक तथा आध्या- त्मिक दोनों कार्य-कलापों को एक समान तुला के दोनों पलड़ों की तरह रखा । राजा स्वयं योगी था । उसने चारपाई पर राज्य प्रासाद में रोग ग्रस्त होकर मरना उचित नहीं समझा । उसने राज सुख त्याग दिया । उसने शरीर तथा इन्द्रियों के शिथिल होने के पूर्व शरीर त्याग देना उचित समझा । उसने एक ऋषि तुल्य अपने परलोक की यात्रा निमित्त स्वयं यात्रा मार्ग प्रशस्त किया । वह चोर मोचन तीर्थ में आकर बैठ गया । योग का आश्रय लिया । अपनी पत्नी जिसका पाणिग्रहण किया था । जिसे सप्तपदी के समय वचन दिया था कि इसे सर्वदा साथ रहेगा विलग नहीं होगा, उसने एक अंग से स्वर्ग जाना पसन्द नहीं किया । अपनी अर्धांगिनी को भी साथ लिया । दोनों पति-पत्नी ने एक साथ संसार का त्याग किया । उसने तपस्वियों एवं ऋषियों जैसी मृत्यु आलिंगन की भूमिका तैयार की । पद्मासन लगाया । निश्चेष्ट अवस्थित धूप हीन ज्योति तुल्य निश्चल ध्यानरत हो गया । इसी रूप से उसने सायुज्य प्राप्त किया । राजा जलोक का व्यक्तित्व इतना ऊँचा है कि कवि की वाणी, लेखक की वाणी उसके वर्णन में, उस तक पहुँचने में असमर्थता का बोध करती है । कश्मीर मण्डल के राजाओं की लम्बी श्रृंखला में इतना महान्, समर चतुर, सेनानी, दानी, राजनीतिज्ञ, कलाप्रेमी, शास्त्रज्ञ, तपस्वी, निर्मल चरित्र, राजा का दर्शन नहीं मिलता । उसने अपने लिये अपने सुख के लिये कुछ नहीं किया । जो कुछ किया कश्मीर मण्डल के लिये किया । वहाँ की जनता के लिये किया । मुसलिम इतिहासकार भी जलोक के जीवन से अत्यन्त प्रभावित थे । उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिये अबुल फजल उसको विजय समुद्र पर्यन्त होना लिखता है । आजम, वंबुद्दीन उसे उत्तरौय ईरान का विजेता मानते हैं । हसन उसे कन्धार और बलख तक पहुँचा देते हैं । कन्नौज और बिहार तक उसे पहुँचाना हसन के लिये साधारण बात थी । कन्नौज तक उसका आना प्रमाणित होता है । इन वर्णनों का इतना महत्त्व अवश्य है कि जलोक को सभी एक महान् विजेता समझते थे और विजेता रूप में उसका चित्रण करते हैं । वह पहला कश्मीरी राजा था जो गोनन्द के पश्चात् कश्मीरी सेना लेकर कश्मीर मण्डल के बाहर विजयर्थ निकला था । लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् कश्मीर-वाहिनी ने मथुरा युद्ध के बाद पुनः अपना पराक्रम प्रदर्शित किया था ।

प्रथम तरंग २११ अथाऽशोककुलोत्पन्नो यद्वाऽन्याभिजनोद्भवः । भूमिं दामोदरो नाम जुगोप जगतीपतिः ॥ १५३ ॥ १५३. तत्पश्चात् अशोक कुलोत्पन्न अथवा अन्य कुलोद्भव दामो र नामक राजा भूमि- रक्षक हुआ । ऋद्ध्या जाज्वलितस्योच्चैर्माहेश्वरशिखामणेः । अद्यापि श्रूयते यस्य प्रभावो भुवनाद्भुतः॥ १५४ ॥ १५४. ऋद्धि से जाज्वल्यमान, माहेश्वर२ शिवउ सकों में शिखामणि, जिस राजा के अद्भुत प्रभाव की गाथा भुवन मे आज भी सुनी जाती है । जलोक योगी अवधूत का शिष्य था । उसने योगा- भ्यास किया । जल का बांधन, उसके अन्दर प्रवेश कर रहना यौगिक क्रियाओ से सम्बन्ध रखता है । उसका अन्तिम समय में योग द्वारा प्राण विसर्जन करना उसे राज योगी के साथ ही साथ राजर्षियो की श्रेणी में रख देता है । १५३ (१) दामोदर द्वितीय : आइने अकबरी ने राजा का नाम दामोदर दिया है । उसके अनुसार कुछ लोंगो का कहना है वह अशोक का वंशज था । कुछ कहते हैं, वह अन्य वंश का था । राजा धार्मिक था । एक भक्त को अपमानित करने के कारण उसके शाप द्वारा सर्प हो गया था । कल्हण ने दामोदर द्वितीय की इतिहास सामग्री छविल्लकार से ली है। तत्कालीन प्रचलित ग्रन्थो, शिलालेखों, अग्रहारो एवं मन्दिरों में प्राप्त कुछ संग्रहों पर दामोदर द्वितीय का वर्णन किया है । मुहम्मद आजिम इतिहासकार के अनुसार दामोदर उद्र वह स्थान है, जहाँ ब्राह्मणो ने राजा को सर्प होने का शाप दिया था। यह सरोवर राजधानी मे ७ मील पर है । यहाँ अब भी कथा प्रचलित है कि राजा सर्प के रूप में इस स्थान पर प्रकट. होता है । हुसन लिखता है—दामोदर राजा जलोक का भाई था । पसन्दी और उमद. खूबियो में उसका हमसर था । तख्त सल्तनत पर बैठकर मख्लूक खुदा को अद्ल और अहसान के जरिए आराम असाइश बख्शी । मौजा 'गोट सवू' इसी राजा का बनाया हुआ है । करेवा दामोदर पर अपनी राजधानी के लिए कशोर इमारतो वाला एक शहर तामीर किया । कैफियत-एक दिन श्राद्ध के तकरीब पर दरयाए झेलम पर गुशल के लिए जाता था । रास्ते में दो बरहमनो ने उससे खाना माँगा । राजा ने कहा । गुशल और श्राद्ध के बाद मैं तुम्हें खीर कर दूँगा । इस पर इन बरहमनो ने राजा के हक में दुआए बद कर दी । इसके नतीजे में राजा की शक्ल साँप की हो गयी । बरसो तक राजा मजकूर जंगलों में परेशान था । इस वांकया की पूरी तफसील करेवा दामोदर के जिकर में गुजर चुकी है । राजा दामोदर की मुद्दत सल्तनत ३२ साल थी । हसन के वर्णन का कोई आधार तथा सत्यता नही हैं । कल्हण निश्चित नही कहता कि दामोदर कौन था । ? उसकी वंश परम्परा क्या थी ? इतना अवश्य निश्चयपूर्वक उसके वर्णन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है । वह जलोक का पुत्र नही था । अशोक का वंशज हो भी सकता है और नहीं भी । इसका केवल मात्र अनुमान किया जाता है । प्रत्यक्ष प्रमाण अभी तक नही मिल सका है । हसन का यह कहना कि वह राजा जलोक का भाई था किसी प्रमाण से अबतक सिद्ध नही हो सका है । वह किस कुल का था ? किस प्रकार कश्मीर का राज्य प्राप्त किया ? उसके उत्तराधिकार का रूप क्या था ? सभी कुछ अज्ञात इतिहास के गर्भ में है ।

२१२ राजतरंगिणी हरप्रसादपात्रेण सच्चरित्रानुरागिणा । बबन्ध सुखिना सख्यं येन वैश्रवणः स्वयम् ॥ १५५ ॥ १५५. उस हर प्रसाद पात्र एवं सच्चरित्रानुरागी सुखी राजा से स्वयं वैश्रवण १ मैत्री सूत्र में बँधे थे। कुबेर इव यो राज्ञामग्र्यः स्वाज्ञाविधायिनः । आदिश्य गुह्यकान्दीर्घं गूढसेतुमबन्धयत् ॥ १५६ ॥ १५६. कुबेर तुल्य राजाओं में अग्र उसने आज्ञानुवर्ती गुह्यकों को आदेश देकर दीर्घ गूढ सेतु २ बँधवाया। यदि वह अशोक वंशोत्पन्न होता तो भारत य इतिहास इस पर प्रकाश अवश्य डालता । अब तक की प्राप्त सामग्रियों के आधार पर अशोक के किसी दामोदर पौत्र का होना नही मिलता है। १५४ (१) माहेश्वर : कल्हण ने राजा को यहाँ पर शिव के उपासक रूप में उपस्थित किया है। उसने महेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। कल्हण ने श्लोक संख्या १३५ में भी जलोक के लिये माहेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। यह राजा निस्सन्देह अपने पूर्व राजा जलोक के समान महेश किंवा शिव का उपासक था। अन्यथा उसे उत्तराधिकार मिलना कठिन होता । यह जनता अथवा मन्त्रिमण्डल द्वारा निर्वाचित राजा था। अथवा जलोक कुलावतंस था। यह सब अप्रकट है। यहाँ केवल एक कड़ी माहेश्वर शब्द उसे जलोक से जोडती है। यह श्लोक और श्लोक संख्या १३५ इस बात को प्रमाणित करते है कि जलोक तथा दामोदर दोनो का मत एक था। वे एक ही देव के उपासक थे । माहेश्वर शिव के एक अवतार हुए हैं। शिव के अडतालीस नामो में एक नाम महेश्वर है। आठ मातरः में एक माहेश्वरी है। १५५ (१) वैश्रवण : अथर्ववेद (८.२० २६) में कुबेर वैश्रवण का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण (१७:४.१ १०) के अनुसार कुबेर वैश्रवण एक राजा है। राक्षस उनकी प्रजा है। तैत्तिरीय अरण्यक (१.३१.३) ने कुबेर को एक देवता रूप में प्रस्तुत किया है। वे नमस्करणीय है। प्रार्थित है। वैवस्वत मन्वन्तर में विश्रवा ऋषि का इसे पुत्र कहा गया है। इनकी माता इडविटा थी। उनकी माता का नाम मंदाकिनी भी मिलता है। धनपतित्व के निमित्त इसने तपस्या की। कुबेर हो गया। जिस स्थान पर तपस्या की थी वह महाभारत (श. ४६:२२) के अनुसार कौबेर तीर्थ हो गया। देवी पार्वती की ओर इसने एक बार देखा तो इसका बांया नेत्र नष्ट हो गया। दक्षिण भाग पीला पड़ गया। इसलिये उसका नाम एकाक्ष पिंग्लू हो गया। उत्तर दिशा का अधिपति माना गया है। उत्तरस्थित यक्ष लोक में निवास करता है। यक्षों के अधिपतित्व प्राप्त की कामना से इसने तपस्या की थी। तपस्या स्थान कावेरी नर्मदा संगम माना गया है। गन्धमादन पर्वत शिखर पर इसका निवास स्थान है। मेरु पर्वत के उत्तर विभावरी भी इसका एक निवास स्थान है। वृद्धि तथा ऋद्धि इसकी शक्तियां है। इसकी सभा का नाम कुबेर सभा है। कुबेर की एक पत्नी का नाम भद्रा है। इसकी पूरी का नाम अलकापुरी है। पूर्व जन्म से कापिल्य नगरी में अग्निहोत्री यज्ञदत्त का गुणनिधि नामक पुत्र था। मुचकुंद से इसका संवाद, ब्राह्मण क्षत्रिय एकता होने पर राज्य सुख की वृद्धि होतो

प्रथम तरंग २१३

है, हुआ था। (म. श. ७५) इसका एक नाम सोम है। एतदर्थ उत्तर दिशा का नाम सौम्य पड़ा है। वैश्रवण कुबेर के पिता विश्रवस पुलस्त्य एवं हविर्भू का पुत्र कहा गया है। (भा० ४:१:३६- ३७) ब्रह्माण्ड पुराण में इसकी माता का नाम इलविला दिया गया है। वह तृणविन्दु तथा अलंबुषा की कन्या थी। (३:७:३९-४२) किन्तु वायु पुराण में इसकी माता का नाम द्रविडा दिया गया है। (८६:१६) इसको नव पत्नियां थीं। (म. व. २५९:६०) इसकी एक पत्नी केशिनी से रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण तथा कन्या शूर्पणखा हुई थी। महाभारत के अनुसार इसकी पुण्योत्कटा, राका एवं मालिनी तीन पत्नियां राक्षसी थी। महा- भारत वनपर्व (२५९:७-८) में मालिनी का विभी- पण, पुण्योत्कटा का रावण और कुम्भकर्ण तथा राका का पुत्र खर और कन्या शूर्पणखा कही गयी है। १५६(१) गुह्यक : दश देवयोनियों में यक्षों तुल्य एक योनि है। अमरकोश के अनुसार दस निम्नलिखित देवयोनियां हैं : विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ ॥१:१:११॥ कुबेर को गुह्यकेश्वर तथा वैश्रवण भी कहा गया है। गुह्यक उन लोगों के लिये प्रयुक्त किया गया है, जो कुबेर के धनकोष की रक्षा करते थे। उनके स्वामी को गुह्यकेश्वर कहा गया है। कुबेरस्त्यम्बकसखो यक्षराड् गुह्यकेश्वरः । ॥१:२:७१॥ मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो .धनाधिपः । किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ॥ ॥१:२:७२॥ भास्कर्य किंवा मूर्तिकला विकास में कुबेर तथा यक्षों का प्रमुख स्थान है। कुबेर की अलका-

पुरी का सुन्दर वर्णन मेघदूत में कालिदास ने किया है। यक्ष का स्वामी कुबेर है। बौद्ध मूर्तियों में कुबेर तथा यक्ष भगवान् की पूजा करते दिखाये गये हैं। गुह्यक शब्द का एक जाति के रूप में प्रयोग मिलता है। उन्हें देवयोनि के अन्तर्गत एक जाति महाभारत ने माना है। (आदि पर्व १८६:७) इस जाति के लोग द्रौपदी के स्वयंवर के समय उपस्थित थे। गुह्यकेश्वर अर्थात् कुबेर की सभा में गुह्यकों का रहना कहा गया है। (सभा पर्व १०.३) गन्धमादन पर्वत पर उनका निवास स्थान था। भीमसेन ने उन्हें वहीं अपनी गदा द्वारा हत किया था। (शल्य पर्व ११:५५-५) गुह्यक को यक्ष भी कहा गया है (१०.१५)। पुराणों में कुबेर के अनुयायी तथा दानव गुह्यक कहे गये हैं। (भागवत पुराण १.९.३, १०:३४:२८, २:१०:३७, ४:४:३४) गुह्यक जाति हिमालय में निवास करती थी। (भागवत ४:५:२६ ४:१०:५) वे माया विद्या में निपुण थे। (भागवत पुराण १०.५५.२३) गुह्यकों के देवता शिव थे। वे शिव के अनुयायी थे। (भागवत पुराण ६३:१०) गुह्यकों ने पुण्यात्माओं के सम्पर्क से स्वर्ग प्राप्ति की थी। (भागवत पुराण ११:१२:३, १४.५, ) गुह्यकों को यक्षों तथा राक्षसों की श्रेणी में रखा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:१६७, ४:२:२६, (मत्स्यपुराण १३:१७, १२१, २)। गुह्यकों के आचरण तथा कर्त्तव्यों का विशद वर्णन मत्स्य पुराण (१८०.९०, २४६:५३,) तथा वायु पुराण (अध्याय ६९ तथा १०१) में मिलता है। गुह्यक वर्ग को वायु पुराण (अध्याय ३०) में हिमालयवासी गुह्यक कहा गया है-शंकर पार्वती के साथ विराजमान थे। उस समय आदित्यगण, वसुगण, अश्विनीकुमार, गुह्यकों को साथ लेकर वैश्रवण कुबेर, सनत्कुमार, परमर्षि, अंगिरादि देवर्षि, विश्वा- वसु गन्धर्व, नारद, कैलास निवासी यक्षराज, महा-

२१४ राजतरंगिणी मुनि उसता, तथा अप्सराएँ उमा शंकर की उपा- सना करने लगीं । हरिवंश पुराण मे कैलास शिखर पर गुह्यको के साथ कुबेर के आगमन का वर्णन मिलता है। (८५।१०) मैने इस विषय पर प्रकाश यक्षो से सम्बन्धित परिशिष्ट में डाला है। यक्ष जाति की गुह्यक जाति एक शाखा किंवा वर्ग थी। उनमे तथा यक्षों मे भिन्नता मालूम होती है। गुह्यक भर्गो का उत्तरदायित्व सम्पत्ति की रक्षा करना था। उनका काम सैनिको का था। वे प्रतिहारी थे। वे साधारणतया शस्त्रोपजीवी थे। पहरा, चौकी, तथा रक्षादि करते थे। शस्त्रादि चलाते थे। उन्होने महाभारत युद्ध मे भाग लिया था। यक्ष जाति के होते हुए भी, उन्हें अलग गुह्यक संज्ञा उसी प्रकार दी गयी थी, जैसे हिन्दु होने पर भी क्षत्रियो की अलग जाति शस्त्रोपजीवी होने के कारण हो गयी थी। वायु पुराण (अध्याय १०१) से प्रकट होता है कि गुह्यक लोग सत्य अर्थात् ब्रह्म लोक में देवतायो के साथ रहते थे। सत्य लोक सातवां किंवा अन्तिम लोक है। उसमे समस्त देवगण, गन्धर्वो, अप्सराओं, यक्षो तथा गुह्यको के साथ स्वर्ग लोक मे निवास करते हैं। वायु पुराण (अध्याय ६९) मे गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष तथा पिशाचो को असुरदेव की श्रेणी मे रखा गया है। परन्तु यहाँ पर सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यो को पृथ्वी लोक का निवासी बताया गया है। इस गुह्यको का स्थान पिशाचो तथा मनुष्यो से ऊपर रखा गया है। गुह्यको की उत्पत्ति के विषय मे वायु पुराण (अध्याय ९:३२,३०:४) में क्या आता है—'ब्रह्मा मे रजस्तम प्रधान दूसरा शरीर धारण किया। उस अन्धकार में क्षुधातुर होकर उन्होंने दूसरी प्रजा उत्पन्न की। वह प्रजा जल को भक्षण करने के लिये कटिवद्ध हो गयी। हम जल को रक्षा करते हैं। कहने हुए जो उत्पन्न हुए वे क्रोधी निशाचर राक्षस हुए। जिन लोगों ने कहा हम जल को खा जायेंगे। नष्ट कर देंगे। अतएव उनका नाम राक्षस पड़ा। यक्ष धातु पालनार्थक है। अतएव उनका यक्ष नाम पड़ा। अ० ९। भागवत (१:९:३) मे श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधि- ष्ठिर आदि के रथ पर जाने की शोभा के वर्णन में उसकी तुलना गुह्यकों सहित कुबेर से की गयी है। वहाँ पर गुह्यकों को कुबेर का साथी कहा गया हैं। स्कन्द (२:१०:३७) मे भगवान् के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों का वर्णन किया गया है। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक, किन्नर, अप्सराएँ, नाग, सर्प, किंपुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वैताल, यातुधान के वर्ग में गुह्यकों को रखा गया है। (स्कन्द ११:१२:३,१४:५) दक्ष यज्ञ मे सती के प्राण विसर्जन काल में गुह्यक तथा प्रमथ गणों का उपस्थित होना प्रकट होता है। मालूम होता है शिव के पार्षद गुह्यक तथा प्रमथ गण सती के साथ दक्ष यज्ञ मे गये थे। सती के प्राण विसर्जन के साथ ही गुह्यको तथा प्रमथो ने क्रुद्ध होकर, दक्ष यज्ञ मे विघ्न डाला था। अस्त्र- शस्त्रो से आक्रमण किया था। उनके भयंकर आक्रमण के वेग को देखकर भृगु ने यज्ञ द्वारा महर्षी ऋभु नामक देशो को उत्पन्न किया। जलती लकड़ियों द्वारा प्रथमगण तथा गुह्यकों पर वे आक्रमण कर, उन्हे भगाने मे समर्थ हुए थे। दक्ष यज्ञ के प्रसंग मे गुह्याकलय अर्थात् गुह्यको के निवास स्थान का उल्लेख किया गया है। सती की प्राणाहुती से क्रुद्ध होकर, वीरभद्र ने दक्ष के मस्तक को यज्ञ की दक्षिणाग्नि में डाल दिया। यज्ञ को विध्वंस कर गुह्याकालय लौट गये। यहाँ पर गुह्याकालय हिमालय स्थित कैलाश के समीप का स्थान होना चाहिए। वायु पुराण ने हिमालय का यही अंचल गुह्यको का निवास स्थान बताया है।

प्रथम तरंग २१५

उसम मृगया निमित्त हिमालय गया था। वहाँ उसको हत्या कर दी गयी थी । ध्रुव अत्यन्त क्रुद्ध होकर, रुद्रों के अनुचरों से सेवित उत्तर दिशा में हिमालय के द्रोणी अर्थात् घाटी में गये । वहाँ नगर गुह्यकों से जनाकीर्ण था । (भागवत ४.१० :५) यहां पर भी यही निर्देश किया गया है। गुह्यक लोग उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी किंवा द्रोणी में रहते थे । श्री कृष्ण द्वारा गुह्यक शंखचूड के वध की कथा भागवत ( १०:३४:२८ ) में कही गयी है। गोपियों को एक समय शंखचूड गुह्यक लेकर, उत्तरदिशा की ओर भाग चला । श्री कृष्ण उस समय गुह्यक के पास पहुँचे । गुह्यक गोपियों को छोड़कर भागा । श्री कृष्ण ने उसका पीछा किया । उसका वध किया । मणि लेकर वापस लौट आये । इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। गुह्यक दस्यु आदि का अनुचित कार्य करते थे। उनका निवास स्थान उत्तर दिशा था । मथुरा से उत्तर दिशा पंजाब, कश्मीर, हिमाचल पड़ता है । उत्तर दिशा का अर्थ प्रायः हिमालय का उत्तरीय पर्वतीय अंचल माना जाता है । प्रद्युम्न तथा शम्बरासुर वध के प्रसंग में गुह्यकों का पुनः उल्लेख भागवत ( १०:५५ २३ ) में किया गया है। शम्बरासुर ने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसों की सैकड़ों माया का प्रयोग किया । गुह्यक मायावी थे । युद्ध में माया का प्रयोग करते थे । अन्य पुराणों में भी इस प्रकार का उल्लेख किया गया है । शम्बर ने गुह्यकों की माया का प्रयोग किया है। यहाँ गुह्यकों ने युद्ध में भाग नहीं लिया । परन्तु उनको युद्ध नीति का प्रयोग शम्बर ने प्रद्युम्न के विरुद्ध किया था। भागवत (११:१२:३) में पुनः दैत्य, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक को एक ही वर्ग में रखा गया है। गुह्यकों के पूर्वज ब्रह्मर्षि थे। देवयोनि वर्ग में थे । इसका उल्लेख

भागवत (११ १४.५) में किया गया है । इन ब्रह्मर्षियों की संतान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्देव, नाग, किन्नर, राक्षस, और किम्पुरुष आदि थे । अपना वंश वृक्ष इन्ही ब्रह्मर्षियो से प्राप्त किया था । रामायण में कैलास के समीप गुह्यको के रहने की बात कही गयी है । सुग्रीव ने उत्तर दिशा में देवी सीता को खोजने के लिये, जिन देशो तथा जातियों का नाम लिया है, उनमें गुह्यक हैं । वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३, श्लोक ३ में उल्लेख आता है—वहाँ यक्षो के स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्व के लिये वन्दनीय हैं तथा धनदाता हैं, वह यक्ष राजा गुह्यको के साथ निवास करते है ।' कल्हण के गुह्यक शब्द के व्यवहार से गुह्यक जाति की सत्यता तथा वास्तविकता पर विशेष प्रकाश पडता है । पुराणों में गुह्यको को यक्षों का एक वर्ग माना है। इसका उल्लेख कर चुका हूँ । कल्हण के इस शब्द से कि राजा ने गुह्यको से सहायता अर्थात् काम लिया, इससे मालूम होता है, उस समय गुह्यक नामक जाति कश्मीर में रहती थी । जाति परिश्रमी थी । निपुण थी । पुल बनाना आज भी शिल्पक कार्य समझा जाता है । किसी कश्मीर कलाकार की सहायता नही ली गयी । गुह्यकों की सहायता पुल बनाने के लिये ली गयी, इसका अर्थ है। यह जाति इस कला में निपुण थी । यक्ष नाम की भी जाति थी, गुह्यक नाम की भी जाति थी । कश्मीर में रहती थी । यक्षों गन्धर्वों को कालान्तर में मानव विशेष समझ लिया गया । इसी प्रकार गुह्यकों को भी मानव विशेष समझा गया । कल्हण के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है। गुह्यक एक जाति थी । इस जाति के लोग कश्मीर में आवाद थे । घोर निर्माण कला में निपुण थे ।

२१८ राजतरंगिणी स हि कारयितुं यक्षैर्यतते स्म स्वमण्डले । दीर्घानश्ममयान्सेतूंस्तोयविप्लवशान्तये ॥ १५६ ॥ १५६. उस राजा ने स्वमण्डल में जल¹ विप्लव शान्त करने के लिये यक्षों² की सहायता से पाषाण मय दीर्घ सेतुओं के निर्माण का यत्न किया था।

ऊँचा होने पर उसे ऊँचे स्थान में पहुँचाया जा सकता है। राजा दामोदर द्वारा बसाये नगर को आज भी स्मृति स्थानीय लोगो में है। १५८ (१) विघ्न : कल्हण ने कुटिल तथा तुच्छ मनुष्यों द्वारा परोपकारी कार्यों में बाधा डालने की मनोवृत्ति को धिक्कारा है। उस लोकोत्तर कार्य को उन्नतआत्मायो का कार्य कहा है। और इस प्रकार के कार्यों में अरुचि रखने तथा बाधा डालने वालो को उनकी पूर्व जन्म की पुण्यशीलता का अभाव होना उनमें माना है। वह यहाँ पर कर्मसिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। वह महात्मा गान्धी के समान मनुष्य को बुरा नही कहता परन्तु उनके कर्म को बुरा कहता है। कर्म द्वारा मनुष्य पुण्यात्मा एवं दुरात्मा दोनो होता है। अतएव सुकर्म करने वाले श्लाघ्य हैं। दुष्कृति करनेवाले धिक्कार के पात्र हैं। १५९ (१) जल प्लावन : कश्मीर को प्रकृति ने हराभरा नन्दन उद्यान तुल्य अतिरम्य बनाया है तथापि कश्मीर मण्डल पर प्रकृति की ही वक्र दृष्टि रहती है। जल एवं अग्नि कश्मीर, मुख्यतया श्रीनगर, के शत्रु रहे हैं। जल विप्लव, जलप्लावन वर्षा के द्वारा पहाड़ों का गिरना आदि साधारण बातें हैं। घनघोर वर्षा यदि लगातार तीन दिन तक कश्मीर में हो जाय तो जल विप्लव सदृश दृश्य दिखायी पड़ता है। इनसे कश्मीर की रक्षा करने का स्तुत्य प्रयास प्रायः सभी राजाओं ने किया है। राजा ने भी यक्षों की सहायता लम्बे बाँध बँधाने के लिये ली थी। यक्ष शब्द के प्रयोग से यही प्रकट होता है। राजा का सेतु निर्माण कार्य असाधारण था। साधारण पुरुषार्थ मात्र से सम्भव नहीं था। अतः कल कश्मीरी मुसलमान कश्मीर के बने पुराने मन्दिरों तथा अन्य निर्माण में लगे विशाल शिलाखण्ड को देखकर उन्हे जिन तथा परियो का काम कहते हैं। इसका कारण यह है कि मुसलिम काल में किसी बड़ी पत्थरो की इमारत की रचना नही हुई। पुराने पत्थरो को तोड कर निःसंकोच उनका प्रयोग नवीन निर्माण मे किया जाता रहा है। १५९ (२) यक्ष : कल्हण कश्मीर में प्रचलित किंवदन्ती की ओर संकेत करता है। प्राचीन विशाल इमारतों का निर्माण, जिनमें विशाल शिलाखण्ड लगे हैं, उन्हें यक्षों का निर्माण, मानवीय शक्ति के परे होने के कारण मानता है। कल्हण ने जिन भव्य भवनों तथा निर्माणों का वर्णन किया है उनमें बहुतों के ध्वंसावशेष वर्तमान हैं। कश्मीरी मुसलमान उन्हे जिन तथा परियों का बनाया मानते हैं। कारण स्पष्ट है। आज भी उन शिलाखण्डों को देखकर आश्चर्य होता है। ये किस प्रकार मानवों की स्वल्प शक्ति से उठाये और भवनों में लगाये गये होंगे। यक्ष शब्द ऋग् तथा अथर्व वेद में अनेक स्थलों पर आया है। (ऋग्वेद १:१९०:४, ४:४:१३, ५:१०:४, ७:५३:१६, १०:८८:१३, ७:६१:५; अथर्व वेद ८:६:२५, १०:२.३२, १०:७:३८, १०:८.४३, ११:२:४) वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड पुराणों में यक्ष शब्द प्रायः गन्धर्व तथा किन्नर के साथ आता है। ये हिमालय प्रदेश निवासी जातियाँ थी। अलवेरूनी ने गन्धर्वों को गायक जाति में गिना है। गन्धर्वों का संगीत तथा नृत्य पेशा था और आज भी है। गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरांस्तथा । क्लापग्रामकांश्चैव तथा किं पुरुषाद् रम्यान् ॥ अग्नि पुराण (१९:१८) में 'कश्यपपत्नीखशा- जाता.' अर्थात् कश्यप की पत्नी खशा से यक्षों की उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है।

प्रथम'तरंग २१९ यक्षों का वर्णन महाभारत में यथेष्ट रूप से मिलता है। गुह्यकों के सन्दर्भ में यक्षों का उल्लेख किया गया है। महाभारत में उन्हें देव योनि में रखा गया है। विराट अण्ड द्वारा ब्रह्मादि के उत्पन्न होने के पश्चात् यक्षों की उत्पत्ति बताई गयी है। महाभारत आदि पर्व (१:३५) में यक्षों को पुलस्त्य मुनि की सन्तान कहा गया है। आदि पर्व (६६:७) में राक्षस रावण पुलस्त्य का नाती था। अतएव यक्षों का सम्बन्ध राक्षसों से मिलाने का प्रयास किया गया है। यक्ष मानव थे। श्री शुकदेव जी ने यक्षों को महाभारत की कथा सुनायी थी (आदि पर्व १:१०८) यक्षों ने कुबेर का राजपद पर अभिषेक किया था। (वन पर्व १११:१०:११) पाण्डव भीमसेन ने यक्षों तथा राक्षसों को पराजित कर भगा दिया था। (वन पर्व १६०:५७-५८) सुन्द-उपसुन्द ने इनको पराजित तथा पीड़ित किया था। (वन पर्व २०८:७) यम ने यक्ष का रूप धारण कर युधिष्ठिर से प्रश्नोत्तर किया था। यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर, धर्मराज युधिष्ठिर ने चारो भाइयो को जीवित किया था। (वनपर्व ३१४:४७।) प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण आकाश में उड़ते उन्हें माला पहनाते, पुष्प वर्षा करते हुए दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूर्ति में भी शिरोभाग के दोनो पाश्र्वों में उड़ते यक्ष, माला सहित उत्कीर्ण किये मिलते हैं। ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार वे राक्षस तथा खसा की सन्तान हैं। वे अपनी माता को खा जाना चाहते थे अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा। यक्षो के रूप का वर्णन किया गया है। उन्हें चार हाथ तथा चार पैर वाला दिखाया गया है। रात्रि में अपने आहार निमित्त विचरण करते हैं। एक यक्ष वमुरुचि का रूप धारण कर अप्सरा क्रथस्थला के साथ नन्दन में निवास किये थे। उससे रजत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। यक्ष अपने पुत्र के साथ हिमालय में निवास निमित्त आया था। ब्रह्माण्ड (३:७:६०, १००-१७, २२:१४, ४१:३०, ७१:१११,) भागवत आदि पुराणो में यक्षो की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता तथा विश्वा माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत (२.६:१३, ६०८२४, १०:३:२७, ६२:१८, ८५.४१ ब्रह्माण्ड पुराण २:३२:१-२, ३५:१९१, ३६:११८) पुराणो में उन्हें रुद्र का अनुयायी कहा गया है। उनके स्वामी का नाम कुबेर दिया गया है। भागवत (४:१०:४,११:१६:१६,२३:२४) तथा मत्स्य पुराण (८:५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व शूलपाणी को दिया था। वृत्र की सहायता इन्द्र के विरोध में यक्षो ने की थी। दक्ष यज्ञ में सती के साथ गये थे। भागवत (६:१०२०,४:४.४:३४) उनके खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९) मे किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षो ने मोक्ष प्राप्त किया था। भागवत (७:७:५०)। ब्रह्मा के समीप जब ककुद्मी गये थे तो उनका अनर्त राज्य यक्षों ने ले लिया था। भागवत (९:३:३६) देवो के साथ भगवान् कृष्ण को यक्ष देखने आये थे। भागवत (७:८:३८,९:३१:२) रावण ने यक्षों को परास्त किया था। ब्रह्माण्ड पुराण (३:७:२५५)। वे पित्रो की पूजा करते थे। भागवत पुराण (३:१०:३८, १११, ११:८१, ४:२:२६, १४:४, २०:५०, ३०:९, ३३:७५)। मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता है कि देव गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण शंकर तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षो के स्वामी कुबेर ने वैताल, यक्ष, नाग तथा किन्नरो की सेना के साथ शंकर की सहायता निमित्त युद्ध में भाग लिया था। मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के व्यव- हार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका सम्बन्ध हरिकेश यक्ष से है।

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२२० राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरि- केश था। हरिकेश शिव का उपासक बन गया। पूर्ण भद्र ने अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान आकर्पित करते हुए कहा- रुद्र की उपासना उचित नहीं है। हमारा काम मानवों से भिन्न है। यक्ष स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं। कुत्सित जीवों का भक्षण करते हैं। हिंसक होते हैं। न हि यक्षकुलीनानामेतं मूढ व्रतं तव। गुह्यका यत यूयं वै स्वभावक्रूरचेतसः॥ क्रव्यादारचैव किंभक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक। मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं ॰ । महात्मना ॥ पिता की बात न मानकर हरिकेश काशी आकर तपस्या करने लगा। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने हरिकेश से वर माँगने के लिये कहा। हरिकेश ने शिव भक्ति का वर माँगा। शिवने प्रसन्न होकर यक्ष को वरदान दिया - 'यक्ष, तुम सबके पूज्य गणो के स्वामी तथा धनपति होगे। प्राणियो से अजेय होंगे। अन्नदाता होगे। क्षेत्रपाल होगे। उद्भ्रम तथा संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे होंगे। तुम दण्डपाणि होगे।' काशी तथा मथुरा दोनो स्थानो पर यक्ष लोग अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव की उपासना अपना लिये। यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय धर्म तथा रीतियो के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर लिया। उन्हें शिव के गणो मे सम्मिलित कर लिया गया। वे शिव के भक्त तथा अनुयायी हो गये थे। भागवत (२:६:१३) मे विराट् पुरुष के वर्णन के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्षो, मृग, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर, सर्पादि को एक वर्ग मे रखकर उन्हे विराट् पुरुष माना गया है। भागवत (६:८ २४) मे नारायण कवच के वर्णन मे कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेतादि को कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है। देवराज इन्द्र के विरुद्ध जाते हुए यक्षों का वर्णन किया गया है। दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण के

[दायाँ स्तम्भ] साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना की बाढ़ रोकने के लिये आये थे। (भा०६:१० २०)। नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय- जयकार करते आने वालों में-सिद्ध, विद्याधर, महा- नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सरायें, चारण, यक्ष, किम्पुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर, सुनन्द तथा कुमुद आदि विष्णु के सभी पार्षद वहाँ आये। भागवत (७:८:३८) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप से यक्षों का वर्णन किया गया है। रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था। उनके ५० ककुद्मी थे। वे ब्रह्मा से भेंट करने गये थे। लौटकर अपने नगर में आये। देखा कि उनके वंशजों ने यक्षों के भय से नगर का त्याग कर दिया था। भागवत पुराण (९:३:३५)। भागवत (१०:६:२७) में यक्षों को भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा गया है। भागवत पुराण (१०:३२:१६) में यक्षों को पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, दैत्य, विद्या- धर तथा मनुष्यो के साथ वर्णन किया गया है। भागवत पुराण (१०:९०:९) में भगवान् अपनी पत्नियो के साथ बिहार करने की उपमा यक्षराज कुबेरका यक्षिणियों के साथ बिहार करने के साथ देते हैं। उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है। उसमें कहा है- 'मैं दैत्यो में दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रो में चन्द्रमा, ओषधियो में सोमरस एवं यक्षराक्षस मे कुबेर हूँ। (११:१६:१६)। यक्षों को 'धन कृपण' कहा गया है 'जो मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई, कुटुम्बी और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण है।' भा० (११:२३:२४)।

प्रथम तरंग २२१

रामायणकार को यक्षो का ज्ञान था। सुग्रीव ने बन्दरों को सीता के अन्वेषणार्थ जिन देशों तथा जातियो में जाने का नाम लिया था उनमें यक्ष का भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर मे निवास करती थी। (वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३:२३) । मत्स्य पुराण (अध्याय १२१) में यक्षों के निवास- स्थान के सम्बन्ध में उल्लेख है -- कैलास पर्वत के पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान चन्द्रप्रभा गिरि है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर चैत्ररथ वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा, यक्ष सेनापति, गुह्यकों से रक्षित निवास करता है। कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा मे हेमशृंग किंवा लोहित नामक एक पर्वत है। उसके पाद प्रदेश में लोहित सरोवर है। उससे लौहित्य महानद निकला है। उसके तट पर विशोक वन है। वहाँ परम धार्मिक मणिधर यक्ष एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा रक्षित निवास करता है। ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर रुद्र (वृष नन्दिकेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी। त्रिक- कूट के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। यहाँ वैद्युत पर्वत है। उस पाद में मानस दिव्य सरोवर है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर वैभाज दिव्य वन है। वहाँ प्रहेति का पुत्र कुबेर का सेवक ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास करता है। वायु पुराण (अध्याय ३६) में यक्षों का निवास स्थान दिया गया है-शतशृंग पर्वत पर अत्यन्त बली यक्षों के सौ पुर हैं। वायु पुराण (अध्याय ६९) में यक्षों के विषय में उल्लेख मिलता है- पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के अन्तर्गत हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों के राजा कुबेर हैं। अलका नगरी के कुबेर अधी- श्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस शरीर के भीतर प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीड़ित कर पीते हैं। सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के समान, अधि- कारी, तेजस्वी, बलवान्, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी, लोकों द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले, तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यक्ष परायण एवं देवताओं के समान धर्मात्मा होते हैं, उन्हें असुर कहा जाता है। गन्धर्वों का प्रभाव देवताओं की अपेक्षा तीन- चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्वों में देवताओं का चतुर्थांश प्रभाव हीन है। गुह्यक का प्रभाव यक्षों के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में केवल सोलहवां भाग देवताओं के प्रभाव का शेष रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों तुल्य होता है। यक्षों से तीन गुने हीन प्रभाव पिशाच होते हैं। रूप, वायु बल, धर्म, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपस्या, शास्त्र बल एवं पराक्रम में गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न होने वाले, वर्ग सुर तथा असुरों की अपेक्षा हीन होते हैं। उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट होती है। (१) यक्ष देवयोनि में थे। मानव थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचो के वर्ग में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा असुरों के वर्ग में उन्हें अधिक रखा गया है। (४) वे हिमालय निवासी थे। उनका आवास कैलास के आसपास था। (५) वे आसुरी मत, मांसादि खाने तथा रक्त पात करने वाले थे। किन्तु कालान्तर में वे शिव के अनुयायी हो कर शैवमतावलम्बी हो गये थे। ६) कुबेर उनका राजा था। वे युद्ध मे भाग लेते थे।

२२२ राजतरंगिणी तपोविभूतयोऽचिन्त्या द्विजानामुग्रतेजसाम् । तादृशामपि ये कुर्युः प्रभावस्य विपर्ययम् ॥ १६० ॥ १६०. उग्र तेजस्वी द्विजों की तपो विभूतियाँ अचिन्त्य होती हैं क्योंकि उन जैसे राजाओं का भी प्रभाव जिन्होंने नष्ट कर दिया है। दायादादिबलैर्नष्टा दृष्टा भूयः समुत्थिता । श्रीर्विप्रावज्ञया शप्तान्नपुनःसंभवा पुनः ॥ १६१ ॥ १६१. दायाद¹ आदि के बल से नष्ट श्री का पुनरुत्थान देखा गया है किन्तु विप्रों की अवज्ञा द्वारा नष्ट श्री का होना असंभव है। श्राद्धार्थमुत्थितः स्नातुं द्विजैः कैश्चिद् बुभुक्षितैः । प्राक्स्नानाद्भोजनं राजा स कदाचिदयाच्यत ॥ १६२ ॥ १६२. किसी समय राजा श्राद्ध निमित्त स्नान करने के लिये उठा। उसी समय कुछ बुभुक्षु ब्राह्मणों ने राजा से स्नान के पूर्व ही भोजन मांगा। (७) मत परिवर्तन के कारण उन्हें शिव का गण बना लिया गया था। (८) गुह्यक लोग यक्षों की एक शाखा थे। (९) उनका सम्बन्ध भारत के उत्तर- पश्चिम सीमा तथा पर्वतीय भागों में रहने के कारण असुरों से होना स्वाभाविक था तथा उनका आचार-विचार प्रारम्भ से असुरों से मिलता था। (१०) यक्ष कश्मीर के सीमान्त मेरु के दक्षिण तथा कैलास के पश्चिम अर्थात् कश्मीर की उत्तरी पूर्वी तथा उत्तरे-पश्चिमी सीमा पर रहते थे। मैंने गुह्यकों के संदर्भ में लिखते हुए यक्षों के विषय में कुछ लिखा है। कल्हण ने यक्षों का विवेचन यहाँ शिल्पी के रूप में किया है। वे सेतु निर्माण करने में निपुण थे। पुराणों में यक्षों को वस्तुपूरक माना है। कहीं-कहीं उन्हें इतर योनि भी माना गया है। आँखों में पड़ने वालों के रूप में भी चित्रित किया गया है। कल्हण ने इन सब कपोलकल्पनाओं को छोड़ते हुए वास्तविकता का परिचय दिया है। ने यक्षों को एक जाति के रूप में चित्रित किया और उनका मुख्य काम शिल्प था। राज्य में देवर्... दूर करने के लिये राजा ने यक्षों द्वारा किया गया है। ये राजा दामोदर के समय गुह्यकों के साथ कश्मीर में आबाद थे। गुह्यक और यक्ष दोनों शिल्पों के रूप में चित्रित किये गये हैं। किन्तु कल्हण ने गुह्यकों का विवरण केवल सेतु के सम्बन्ध में दिया है। और यक्षों का सेतु अर्थात् बाँध बनाने के सम्बन्ध में किया है। अतएव गुह्यक यदि सेतु बनाने में प्रवीण थे तो यक्ष जलाभाव दूर करने के लिये बाध बनाने में चतुर दिखायी पड़ते हैं। १६१ (१) दायाद : दायाद शब्द का अर्थ उत्तराधिकारी—पुत्र, भाई, बन्धु होता है। दाय भाग हिन्दू कानून इसी शब्द के आधार पर बना है। कल्हण, राजा का बल किस प्रकार नष्ट होता है, इस ओर संकेत करता है। कश्मीर में राजा गण अपने उत्तराधिकारियों तथा सम्ब- न्धियों से बहुत परेशान किये गये थे। उनके कारण कश्मीर के राजा तथा कश्मीर राज्य दुर्बल होता रहा है। दिल्ली में मुसलिम बादशाहों को सर्वदा अपने सम्बन्धियों से भय बना रहता था। उत्तरा- धिकार के लिये गृह युद्ध होता रहता था। कल्हण यहाँ ब्राह्मणों के बल का वर्णन करता है। उग्रते... का कोप-

प्रथम तरंग २२३ यियासुना वितस्तान्तर्यदा तेनावधीरिमत् । तदा प्रभावात्ते तस्य तां धुनीमग्रतो व्यधुः ॥ १६३ ॥ १६३. वितस्ता गमनातुर राजा ने जब उनका तिरस्कार किया तो ब्राह्मणों ने अपने प्रभाव से वितस्ता¹ को राजा के सम्मुख उपस्थित कर दिया । सेयं वितस्ता दृष्ट्वैनां भोजयास्मान्स तैरिति । उक्तोऽपि मायाविहितामज्ञासीत्सरिदाहृतिम् ॥ १६४ ॥ १६४. ब्राह्मणों ने कहा -' यह वही वितस्ता है। इसे देखकर अब हमें भोजन कराओ । उनके इस प्रकार कहने पर भी राजा ने नदी का लाया जाना माया¹ ही समझा । भोज्यं ददामिनाऽस्नातो विप्राः सर्पंत सांप्रतम् । तेनेत्युक्तास्तमशपंस्ततः सर्पो भवेति ते ॥ १६५ ॥ १६५. 'विप्रो ! बिना स्नान किये मैं भोजन नहीं दूंगा। आप लोग इस समय सर्पंत¹ होइये ।' राजा के इस प्रकार कहने पर ब्राह्मणों ने शाप दिया --' तुम सर्प हो जाओ।'

भाजन राजा कभी सम्भल नहीं सकता। यद्यपि सम्बन्धियों तथा अन्य कारणों से नष्ट राजाओं का पुनरुत्थान देखा गया है। १६३ (१) वितस्ता : कल्हण ब्राह्मणों के प्रभाव, चमत्कार तथा अलौकिक शक्ति का यहाँ उल्लेख करता है। प्रतीत होता है। राजा किंचित् हठी था। वह ब्राह्मणों की शक्ति पर विशेष विश्वास नहीं करता था । अतएव उसने उपेक्षा भाव यहाँ प्रकट किया है। १६४ (१) माया : अलबेरूनी ने कश्मीर के ब्राह्मणों के चमत्कार का वर्णन किया है। वह कहता है कि कश्मीरी जड़ खिलौनों तथा प्रतिमानों को सजीव प्राणी की तरह चला देते थे। मैंने इसका यथा स्थान विस्तृत वर्णन किया है । निस्सन्देह योग तथा सिद्धियों द्वारा बहुत कुछ अनहोनी बातें प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती हैं। ब्राह्मणों के इस चमत्कार को देखकर भी राजा ने विशेष महत्त्व नहीं दिया। क्योंकि वह ब्राह्मणों की माया का उसे खेल समझता था । विप्रों तथा राजा के संवादों से प्रकट होता है कि ब्राह्मण भोजन पाने के लिए जिद कर रहे थे । और राजा भी स्नान के पश्चात् ही भोजन देने का हठकर बैठा था। यह ध्यान देने की बात है कि राजा ने भोजन देना अस्वीकार नहीं किया था। वह श्राद्ध निमित्त स्नान के पश्चात् देने पर हठ किया था। कल्हण स्वयं ब्राह्मण था । अतएव उसने यहाँ ब्राह्मणों की प्रतिभा दिखाने का स्वाभाविक प्रयास किया है। १६५ (१) सर्पंत : कल्हण ने यहाँ अपनी कविप्रतिभा का परिचय दिया है। पूर्व पद में 'सर्पंत सांप्रतम्' तथा उत्तर पद में 'सर्प' शब्द का प्रयोग कर अनुप्रास बैठाया। राजा ने उन्हें जैसे रेंगते हुए चले जाने के लिये कहा । उनका तिरस्कार किया। उस तिरस्कार से क्रुद्ध होकर राजा के ही 'सर्पंत' शब्द को पकड़ कर 'सर्प' हो जाने का शाप दिया । मनुष्य को सर्प रूप परिणत कर देना यह कोई नयी बात नहीं थी। इसके और भी प्रमाण पुरा साहित्य में मिलते हैं । नहुष जब इन्द्र पद पर आसीन हुए थे तो उन्होंने इन्द्राणी को प्राप्त करने का प्रयास किया। सप्तर्षियों से पालकी उठवायी। इन्द्राणी मिलन की उतावली में सत्वर गति से चलने के लिए 'सर्प-सर्प' कहने लगे ।

२२४ राजतरंगिणी अशेषमेकेनैवाह्ना श्रुत्वा रामायणं तव । शापस्य शान्तिर्भवितेत्यूचिरे ते प्रसादिताः ॥ १६६॥ १६६. राजा द्वारा प्रसन्न हुए ब्राह्मणों ने कहा -- 'सम्पूर्ण रामायण एक दिन मे सुनने पर शाप शान्त १ हो जायगा ।' स दामोदरसूदान्तर्धावन्दूरमुदन्यया । शापोष्णश्वासधूमेन जनैरद्यापि लक्ष्यते ॥ १६७ ॥ १६७. आज भी लोग उस शाप ग्रस्त १ राजा को उसके उष्णश्वास के धूम से पहचानते हैं जो जल निमित्त दामोदर सूद में इधर उधर प्यासा घूमता रहता है । अथाभवन्स्वनामाङ्कपुरत्रयविधायिनः । हुष्कजुष्ककनिष्काख्यास्त्रयस्तत्रैव पार्थिवाः ॥ १६८ ॥ १६८. तत्पश्चात् वहीं पर तीन राजा हुष्क १ जुष्क तथा कनिष्क नाम के हुए जिन्होने अपने नाम पर तीन नगर (हुष्कपुर, जुष्कपुर, कनिष्कपुर) बसाये ।

सप्तर्षियो मे अगस्त्य ऋषि ने क्रोधित होकर शाप दिया -- 'तू सर्प हो जाथ ! राजा नहुष सर्प होकर पृथ्वी पर गिर पडे । अगस्त्य को उसकी दशा पर दया आयी । उन्होने शाप शान्ति के लिये कहा- युधिष्ठिर के राज्य काल में तुम्हें सर्प योनि से मुक्ति प्राप्त होगी । (मै० उ०. ११ : १७' अनु० : १५६- १५७' आ० ६ . १८ : २-३' : भा० ६ : ७-८' विष्णु० : १ : २४) राजा नहुष तथा राजा दामोदर द्वितीय दोनो ब्राह्मणों के कारण पतित होकर सर्प गति पाये थे । राजा नहुष तथा राजा दामोदर दोनो को ब्राह्मणों का कोपभाजन बनना पड़ा था । उनके कारण राज्य के साथ ही साथ मनुष्य योनि त्याग कर सर्प होना पडा । १६६ (१) शाप : ऋषि, मुनि, देवी, देवता, सक्षम ब्राह्मण क्रोधित होने पर शाप देते हैं । शाप देने वाले की भी शक्ति क्षय होती है । शाप सर्वदा क्रोध के कारण दिया जाता है । आन्तरिक क्रोध का शाप बाहरी साकार रूप है । क्रोध स्वत. अवगुण तथा दोष है । प्रायः देखा गया है कि शाप देने वाला ही शाप शान्ति का उपाय भी बताता है । नहुष के शापित होने पर अगस्त्य ने शाप शमन का उपाय बताया था । यहाँ पर भी शाप देने वाले विप्रो ने ही उसके शान्ति का उपाय राजा को बताया था । १६७ (१) शापग्रस्त : कल्हण के समय तक यह कहावत प्रचलित थी । दामोदर ऊद्र में उसे सर्प स्वरूप व्याकुल तृषित गर्म श्वास लेते हुए लोग देखते हैं । इससे दो बातें प्रकट होती हैं । मालूम होता है राजा शाप मुक्त नहीं हुआ था । कल्हण उसकी मृत्यु, राज्य काल, उसके उत्तराधिकारियों के विषय में कुछ नही लिखता । इस विषय पर कही से और प्रकाश अभी तक नहीं पड़ सका है । स्थानीय वृद्ध ग्रामीण इस प्रकार की कथा कहते हैं । परन्तु नयी पीढी उन्हें भूल रही हैं । कल्हण ब्राह्मणों के शाप के अद्भुत प्रभाव की धाक बैठाता है । चेतावनी देता है । विप्र के विमुख होने पर परिणाम भयंकर होता है । कहावत है-दुर्भाग्य गर्म श्वास पैदा करती है । और सौभाग्य उसे शीतल बना देता है । १६८ (१) आइने अकबरी में उन्हें झ्येश्क, जेश्क, केनश्क तीन भाई कहा गया है । अबुल

'प्रथम तरंग २२५

फजल कहता है । तातार में एक कथा प्रचलित है । ओधुज तुरुष्क राजा ने बोखारा, बलख, इमोर, काबुल तथा कश्मीर जीता था । उस समय कश्मीर का राजा जगम् था । उसने कश्मीर में जर्फेन नामक धर्म चलाया । यह घटना ई० पू० २८०० वर्ष पहले घटी थी । हसन इनके सम्बन्ध में रत्नाकर पुराण का सन्दर्भ देकर एक विचित्र बात कहता है— 'तुर्किस्तान के शहजादों में से ३ आदमी हुष्क, जुष्क, कनिष्क राजा सन्दिमान के इस तख्त पर हमराह थे । इस बिना पर अपनी पैदाश खसलत के बमूजिब इन तीनों शाहजादो को मुल्क कश्मीर बतौर जागीर बख्शा । इस मुल्क के बहुत से लोगो को अपना गरवेदा बना लिया । एक हफ्ता तक कश्मीर की सैर वह सपाहत अख्तियार कर वापसी अख्त- यार किया ।' रत्नागर किंवा रत्नाकर पुराण की गाथा को मिथ्या करार देने के लिये यहाँ एक और प्रमाण उपस्थित हो जाता है । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क के कालों का निर्धारण हो चुका है । कनिष्क (७८-१०१ ई०) ईसा के पश्चात् हुआ था । हजरत सुलेमान का काल ईसा से ९७० वर्ष पूर्व है । हजरत सुलेमान का काल ९७० ईसा पूर्व से ९३३ वर्ष ईसा पूर्व निर्धारित हो चुका है । सन्धिमति, सन्धिमान, सन्धिमदि एक ही व्यक्ति के नाम है । अभिमन्यु के काल तथा सन्धिमान के काल में लगभग ११०० वर्षों का अन्तर है । सम्राट् कनिष्क तथा हजरत सुलेमान के समय में १०४८ वर्षों का अन्तर है । अभिमन्यु, हुष्क, जुष्क, कनिष्क, सन्धिमत तथा हजरत सुलेमान जिन्हें एक ही समय में रखने का प्रयास किया है । उनके ऐतिहासिक कालों में शताब्दियों का अन्तर है । वे एक समय नही हुए थे । उनका एक काल में होना ऐतिहासिक तथ्यों के परे है । रत्नाकर पुराण की कपोल कल्पना, उसके अनुवाद तथा उसके अस्तित्व २९ में गम्भीर सन्देह प्रकट करने का अकाट्य प्रमाण उपस्थित करती है । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क को सन्दिमान अर्थात् हजरत सुलेमान ने काश्मीर का राज्य जागीर के रूप में दिया । उन्हें तुर्किस्तान से साथ लाकर, गद्दी पर बैठाया । इतिहास इसकी साक्षी देने में असमर्थता प्रकट करता है । हुष्क, जुष्क, तथा कनिष्क तीनों को काश्मीर राज की जागीर दी गयी और तीनों एक साथ राज्य किस प्रकार कर लिये ऐतिहासिक तथ्यों तथा घटनाओं के विरुद्ध होते हुए भी मानवीय प्रकृति के तथा व्यावहारिक दृष्टि से सम्भव नहीं है । एक साथ तीन राजा सिंहासन पर बैठें। राज्य करें, वह भी जहाँ राज्य प्रणाली राजतंत्र पर आधारित हो इतिहास इस प्रकार का उदाहरण भूत वर्तमान तथा किसी काल में देने में असमर्थ है । गणतन्त्र शासन प्रणाली में यह सम्भव हो सकता है । जैसे कि रोम में दो काउन्सिलों की प्रथा थी । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क तीनों तीन विभिन्न व्यक्ति थे । तीनों का राज्यकाल भिन्न था । अतएव हसन तथा रत्नाकर पुराण की गाथा मनगढन्त कपोल कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नही है । हज़रत सुलेमान और कनिष्कादि : हसन अपने इतिहास में लिखता है—यह तीनों राजे हजरत सुलेमान की मदद से क० १७९८ संवत् में हुकूमत कश्मीर पर मुन्तकिल हो गये । मखलूक खुदा को अपने अदल व इन्साफ और सखावत से दिल खुश किया । इन तीनों ने तीन गांव आबाद किये । चुनांचः हुष्क ने मौजा अशकूरा, कनिष्क ने परगना बहो में कांपपुरा और जुष्क ने परगना काक मे मौजा जकरो जंजी आबराजल करने मौजा जकरों की आबादी के लिए, सन्दलार से पानी की एक नहर जारी की । मजकूरह बाला तीनों राजाओ ने इकता- लीस साल इन्तहाई, इत्तफाक व इतहाद से, हकूमत की । और बहुत से लोगों को अपने मजहब का गरवीदा बनाया । इसके पहले एक शख्स शख सहूम