राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २२३ यियासुना वितस्तान्तर्यदा तेनावधीरिमत् । तदा प्रभावात्ते तस्य तां धुनीमग्रतो व्यधुः ॥ १६३ ॥ १६३. वितस्ता गमनातुर राजा ने जब उनका तिरस्कार किया तो ब्राह्मणों ने अपने प्रभाव से वितस्ता¹ को राजा के सम्मुख उपस्थित कर दिया । सेयं वितस्ता दृष्ट्वैनां भोजयास्मान्स तैरिति । उक्तोऽपि मायाविहितामज्ञासीत्सरिदाहृतिम् ॥ १६४ ॥ १६४. ब्राह्मणों ने कहा -' यह वही वितस्ता है। इसे देखकर अब हमें भोजन कराओ । उनके इस प्रकार कहने पर भी राजा ने नदी का लाया जाना माया¹ ही समझा । भोज्यं ददामिनाऽस्नातो विप्राः सर्पंत सांप्रतम् । तेनेत्युक्तास्तमशपंस्ततः सर्पो भवेति ते ॥ १६५ ॥ १६५. 'विप्रो ! बिना स्नान किये मैं भोजन नहीं दूंगा। आप लोग इस समय सर्पंत¹ होइये ।' राजा के इस प्रकार कहने पर ब्राह्मणों ने शाप दिया --' तुम सर्प हो जाओ।'
भाजन राजा कभी सम्भल नहीं सकता। यद्यपि सम्बन्धियों तथा अन्य कारणों से नष्ट राजाओं का पुनरुत्थान देखा गया है। १६३ (१) वितस्ता : कल्हण ब्राह्मणों के प्रभाव, चमत्कार तथा अलौकिक शक्ति का यहाँ उल्लेख करता है। प्रतीत होता है। राजा किंचित् हठी था। वह ब्राह्मणों की शक्ति पर विशेष विश्वास नहीं करता था । अतएव उसने उपेक्षा भाव यहाँ प्रकट किया है। १६४ (१) माया : अलबेरूनी ने कश्मीर के ब्राह्मणों के चमत्कार का वर्णन किया है। वह कहता है कि कश्मीरी जड़ खिलौनों तथा प्रतिमानों को सजीव प्राणी की तरह चला देते थे। मैंने इसका यथा स्थान विस्तृत वर्णन किया है । निस्सन्देह योग तथा सिद्धियों द्वारा बहुत कुछ अनहोनी बातें प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती हैं। ब्राह्मणों के इस चमत्कार को देखकर भी राजा ने विशेष महत्त्व नहीं दिया। क्योंकि वह ब्राह्मणों की माया का उसे खेल समझता था । विप्रों तथा राजा के संवादों से प्रकट होता है कि ब्राह्मण भोजन पाने के लिए जिद कर रहे थे । और राजा भी स्नान के पश्चात् ही भोजन देने का हठकर बैठा था। यह ध्यान देने की बात है कि राजा ने भोजन देना अस्वीकार नहीं किया था। वह श्राद्ध निमित्त स्नान के पश्चात् देने पर हठ किया था। कल्हण स्वयं ब्राह्मण था । अतएव उसने यहाँ ब्राह्मणों की प्रतिभा दिखाने का स्वाभाविक प्रयास किया है। १६५ (१) सर्पंत : कल्हण ने यहाँ अपनी कविप्रतिभा का परिचय दिया है। पूर्व पद में 'सर्पंत सांप्रतम्' तथा उत्तर पद में 'सर्प' शब्द का प्रयोग कर अनुप्रास बैठाया। राजा ने उन्हें जैसे रेंगते हुए चले जाने के लिये कहा । उनका तिरस्कार किया। उस तिरस्कार से क्रुद्ध होकर राजा के ही 'सर्पंत' शब्द को पकड़ कर 'सर्प' हो जाने का शाप दिया । मनुष्य को सर्प रूप परिणत कर देना यह कोई नयी बात नहीं थी। इसके और भी प्रमाण पुरा साहित्य में मिलते हैं । नहुष जब इन्द्र पद पर आसीन हुए थे तो उन्होंने इन्द्राणी को प्राप्त करने का प्रयास किया। सप्तर्षियों से पालकी उठवायी। इन्द्राणी मिलन की उतावली में सत्वर गति से चलने के लिए 'सर्प-सर्प' कहने लगे ।