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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 984 में से

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पृष्ठ 311

२२४ राजतरंगिणी अशेषमेकेनैवाह्ना श्रुत्वा रामायणं तव । शापस्य शान्तिर्भवितेत्यूचिरे ते प्रसादिताः ॥ १६६॥ १६६. राजा द्वारा प्रसन्न हुए ब्राह्मणों ने कहा -- 'सम्पूर्ण रामायण एक दिन मे सुनने पर शाप शान्त १ हो जायगा ।' स दामोदरसूदान्तर्धावन्दूरमुदन्यया । शापोष्णश्वासधूमेन जनैरद्यापि लक्ष्यते ॥ १६७ ॥ १६७. आज भी लोग उस शाप ग्रस्त १ राजा को उसके उष्णश्वास के धूम से पहचानते हैं जो जल निमित्त दामोदर सूद में इधर उधर प्यासा घूमता रहता है । अथाभवन्स्वनामाङ्कपुरत्रयविधायिनः । हुष्कजुष्ककनिष्काख्यास्त्रयस्तत्रैव पार्थिवाः ॥ १६८ ॥ १६८. तत्पश्चात् वहीं पर तीन राजा हुष्क १ जुष्क तथा कनिष्क नाम के हुए जिन्होने अपने नाम पर तीन नगर (हुष्कपुर, जुष्कपुर, कनिष्कपुर) बसाये ।

सप्तर्षियो मे अगस्त्य ऋषि ने क्रोधित होकर शाप दिया -- 'तू सर्प हो जाथ ! राजा नहुष सर्प होकर पृथ्वी पर गिर पडे । अगस्त्य को उसकी दशा पर दया आयी । उन्होने शाप शान्ति के लिये कहा- युधिष्ठिर के राज्य काल में तुम्हें सर्प योनि से मुक्ति प्राप्त होगी । (मै० उ०. ११ : १७' अनु० : १५६- १५७' आ० ६ . १८ : २-३' : भा० ६ : ७-८' विष्णु० : १ : २४) राजा नहुष तथा राजा दामोदर द्वितीय दोनो ब्राह्मणों के कारण पतित होकर सर्प गति पाये थे । राजा नहुष तथा राजा दामोदर दोनो को ब्राह्मणों का कोपभाजन बनना पड़ा था । उनके कारण राज्य के साथ ही साथ मनुष्य योनि त्याग कर सर्प होना पडा । १६६ (१) शाप : ऋषि, मुनि, देवी, देवता, सक्षम ब्राह्मण क्रोधित होने पर शाप देते हैं । शाप देने वाले की भी शक्ति क्षय होती है । शाप सर्वदा क्रोध के कारण दिया जाता है । आन्तरिक क्रोध का शाप बाहरी साकार रूप है । क्रोध स्वत. अवगुण तथा दोष है । प्रायः देखा गया है कि शाप देने वाला ही शाप शान्ति का उपाय भी बताता है । नहुष के शापित होने पर अगस्त्य ने शाप शमन का उपाय बताया था । यहाँ पर भी शाप देने वाले विप्रो ने ही उसके शान्ति का उपाय राजा को बताया था । १६७ (१) शापग्रस्त : कल्हण के समय तक यह कहावत प्रचलित थी । दामोदर ऊद्र में उसे सर्प स्वरूप व्याकुल तृषित गर्म श्वास लेते हुए लोग देखते हैं । इससे दो बातें प्रकट होती हैं । मालूम होता है राजा शाप मुक्त नहीं हुआ था । कल्हण उसकी मृत्यु, राज्य काल, उसके उत्तराधिकारियों के विषय में कुछ नही लिखता । इस विषय पर कही से और प्रकाश अभी तक नहीं पड़ सका है । स्थानीय वृद्ध ग्रामीण इस प्रकार की कथा कहते हैं । परन्तु नयी पीढी उन्हें भूल रही हैं । कल्हण ब्राह्मणों के शाप के अद्भुत प्रभाव की धाक बैठाता है । चेतावनी देता है । विप्र के विमुख होने पर परिणाम भयंकर होता है । कहावत है-दुर्भाग्य गर्म श्वास पैदा करती है । और सौभाग्य उसे शीतल बना देता है । १६८ (१) आइने अकबरी में उन्हें झ्येश्क, जेश्क, केनश्क तीन भाई कहा गया है । अबुल

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