भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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'प्रथम तरंग २२५

फजल कहता है । तातार में एक कथा प्रचलित है । ओधुज तुरुष्क राजा ने बोखारा, बलख, इमोर, काबुल तथा कश्मीर जीता था । उस समय कश्मीर का राजा जगम् था । उसने कश्मीर में जर्फेन नामक धर्म चलाया । यह घटना ई० पू० २८०० वर्ष पहले घटी थी । हसन इनके सम्बन्ध में रत्नाकर पुराण का सन्दर्भ देकर एक विचित्र बात कहता है— 'तुर्किस्तान के शहजादों में से ३ आदमी हुष्क, जुष्क, कनिष्क राजा सन्दिमान के इस तख्त पर हमराह थे । इस बिना पर अपनी पैदाश खसलत के बमूजिब इन तीनों शाहजादो को मुल्क कश्मीर बतौर जागीर बख्शा । इस मुल्क के बहुत से लोगो को अपना गरवेदा बना लिया । एक हफ्ता तक कश्मीर की सैर वह सपाहत अख्तियार कर वापसी अख्त- यार किया ।' रत्नागर किंवा रत्नाकर पुराण की गाथा को मिथ्या करार देने के लिये यहाँ एक और प्रमाण उपस्थित हो जाता है । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क के कालों का निर्धारण हो चुका है । कनिष्क (७८-१०१ ई०) ईसा के पश्चात् हुआ था । हजरत सुलेमान का काल ईसा से ९७० वर्ष पूर्व है । हजरत सुलेमान का काल ९७० ईसा पूर्व से ९३३ वर्ष ईसा पूर्व निर्धारित हो चुका है । सन्धिमति, सन्धिमान, सन्धिमदि एक ही व्यक्ति के नाम है । अभिमन्यु के काल तथा सन्धिमान के काल में लगभग ११०० वर्षों का अन्तर है । सम्राट् कनिष्क तथा हजरत सुलेमान के समय में १०४८ वर्षों का अन्तर है । अभिमन्यु, हुष्क, जुष्क, कनिष्क, सन्धिमत तथा हजरत सुलेमान जिन्हें एक ही समय में रखने का प्रयास किया है । उनके ऐतिहासिक कालों में शताब्दियों का अन्तर है । वे एक समय नही हुए थे । उनका एक काल में होना ऐतिहासिक तथ्यों के परे है । रत्नाकर पुराण की कपोल कल्पना, उसके अनुवाद तथा उसके अस्तित्व २९ में गम्भीर सन्देह प्रकट करने का अकाट्य प्रमाण उपस्थित करती है । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क को सन्दिमान अर्थात् हजरत सुलेमान ने काश्मीर का राज्य जागीर के रूप में दिया । उन्हें तुर्किस्तान से साथ लाकर, गद्दी पर बैठाया । इतिहास इसकी साक्षी देने में असमर्थता प्रकट करता है । हुष्क, जुष्क, तथा कनिष्क तीनों को काश्मीर राज की जागीर दी गयी और तीनों एक साथ राज्य किस प्रकार कर लिये ऐतिहासिक तथ्यों तथा घटनाओं के विरुद्ध होते हुए भी मानवीय प्रकृति के तथा व्यावहारिक दृष्टि से सम्भव नहीं है । एक साथ तीन राजा सिंहासन पर बैठें। राज्य करें, वह भी जहाँ राज्य प्रणाली राजतंत्र पर आधारित हो इतिहास इस प्रकार का उदाहरण भूत वर्तमान तथा किसी काल में देने में असमर्थ है । गणतन्त्र शासन प्रणाली में यह सम्भव हो सकता है । जैसे कि रोम में दो काउन्सिलों की प्रथा थी । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क तीनों तीन विभिन्न व्यक्ति थे । तीनों का राज्यकाल भिन्न था । अतएव हसन तथा रत्नाकर पुराण की गाथा मनगढन्त कपोल कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नही है । हज़रत सुलेमान और कनिष्कादि : हसन अपने इतिहास में लिखता है—यह तीनों राजे हजरत सुलेमान की मदद से क० १७९८ संवत् में हुकूमत कश्मीर पर मुन्तकिल हो गये । मखलूक खुदा को अपने अदल व इन्साफ और सखावत से दिल खुश किया । इन तीनों ने तीन गांव आबाद किये । चुनांचः हुष्क ने मौजा अशकूरा, कनिष्क ने परगना बहो में कांपपुरा और जुष्क ने परगना काक मे मौजा जकरो जंजी आबराजल करने मौजा जकरों की आबादी के लिए, सन्दलार से पानी की एक नहर जारी की । मजकूरह बाला तीनों राजाओ ने इकता- लीस साल इन्तहाई, इत्तफाक व इतहाद से, हकूमत की । और बहुत से लोगों को अपने मजहब का गरवीदा बनाया । इसके पहले एक शख्स शख सहूम

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