राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ राजतरंगिणी
नामी ने डेढ़ सौ साल से लेकर इनके वक्त तक खिता कश्मीर में बुद्धमत का प्रचार किया था और बहुत से लोगों को इस मजहब में दाखिल कर लिया था। उसके पैरोकारों में एक शख्स नागसेन ने मौजा हारून में बुद्धमत के प्रचार में बदिल बजान कोशिश की थी। उन्हीं दिनों बरहमनों और जैनियों के मा बैन मजहबी मुआमलात पर सख्त झगड़ा बरपा हुए जिससे जनबैन में सख्त खून रेंज़ी हुई। हुष्क और कनिष्क के पास इन झगड़ों को दबाने के लिए काफी फौज न थी। इसलिए यह इस मुआमला (हुकूमत) के चलाने से आजिज् रहे। इसलिए तमाम बरहमनों के इत्तफाक् राय से अभिमन्यु जो राजा वीरमचन्द की औलाद से था और परगना दाच्छेन वारह में जागीर रखता था। तख्त सल्तनत पर बैठा। हुष्क, कनिष्क और जुष्क हुकूमत से अलग कर दिये गये। (पृष्ठ ४२-४३) उक्त बातें मनगढंत हैं। हज़रत सुलेमान ने अगर इन लोगों को गद्दी पर बैठाया तो उनको भग- वान् बुद्ध के समय या उनके पश्चात् होना चाहिए। परन्तु भगवान् बुद्ध हज़रत सुलेमान के ४१६ वर्ष पश्चात् हुए थे। उनके जीवन में शताब्दियों का अन्तर है। बाइबिल के हज़रत सोलेमन और कुरान शरीफ़ के हज़रत सुलेमान एक ही व्यक्ति हैं। कनिष्क का काल सन् ईसवी की पहली शताब्दी है। कनिष्क और भगवान् बुद्ध के समयों में चार शताब्दियों का अन्तर है। कनिष्क के समय में तृतीय बुद्ध परिषद कश्मीर में हुई थी। अतएव कनिष्क को हज़रत सुलेमान से जोड़ना इतिहास की सत्यता, तथा सिद्ध घटनाओं, तथ्यों और काल निर्णय से परे जाना होगा। छिन्नश्रृंखलाः कल्हण की इतिहास श्रृंखला वहीं टूट जाती है। जलोक के पश्चात् दामोदर द्वितीय तत्पश्चात् वह हुष्क, जुष्क, कनिष्क का उल्लेख करता है। दामोदर द्वितीय से उक्त राजाओं के कालों में शताब्दियों का अन्तर पड़ता है। कल्हण ने इन तीनों राजाओं का वर्णन छविल्लाकर के आधार पर किया है। (रा० त० १:२०) कल्हण यहाँ मौन हो जाता है। इस लम्बे काल में कश्मीर में कितने राजा हुए। कश्मीर मण्डल की क्या अवस्था थी ? कोई प्रकाश नहीं पड़ता। अशोक के पश्चात् लगभग अड़तालीस वर्षों तक मौर्य वंश का राज्य ईसा पूर्व १८४ वर्ष तक था। मौर्य वंश के पश्चात् ईसा पूर्व १८४ वर्ष में शुंग वंश का राज्य पाटलीपुत्र में हुआ। कनिष्क का काल ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी का उत्तरार्ध है। जलोक तथा दामोदर का राज्य काल कल्हण ने नहीं दिया है। यदि उन दोनों का सम्मिलित राज्य काल पचास से साठ वर्ष भी मान लें तो दामोदर और कनिष्क के बीच कम से कम एक शताब्दी का अन्तर पड़ जाता है। कल्हण स्पष्ट कहता है। जलोक के पश्चात् दामोदर द्वितीय राजा हुआ। परन्तु दामोदर द्वितीय के पश्चात् कश्मीर मण्डल में कौन राजा हुआ उसपर कुछ प्रकाश नहीं डालता। इस शताब्दी का इतिहास अभी तक अन्धकार की गोद में है। जलोक की वंश परम्परा लुप्त हुई। दामोदर राजा हुआ। प्रतीत होता है कि दामोदर का वंश भी लुप्त हो गया था। दामोदर के शाप ग्रस्त होने पर क्या घटनाएँ घटी कुछ पता नहीं चलता। दामोदर ने रामायण सुनकर प्रायश्चित्त किया या नहीं यह भी सन्दिग्ध है। वह सर्प हो गया। सर्प तुल्य गर्म श्वास लेता था। इससे यही प्रकट होता है। उसने प्रायश्चित्त शायद नहीं किया। उसके वंश में कोई था या नहीं। उसके सर्प होने पर कश्मीर की क्या अवस्था हुई सब कुछ लुप्त है। क्योंकि कल्हण ने ५२ लुप्त राजाओं में से केवल पाँच राजा अर्थात् अशोक से अभिमन्यु यथा जलोक, हुष्क, जुष्क, कनिष्क तथा अभिमन्यु का वर्णन किया है। अतएव इनकी काल गणना अमान्य है। इन दोनों राजाओं का क्रम भी