राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] प्रथम तरंग २२७
[Left Column] गलत दिया गया । इस पर प्रकाश परिशिष्ट 'कुशान राजा' में डाला गया है । कुशान वंशी किस प्रकार काश्मीर के राजा हुए कल्हण मौन है। वह दामोदर द्वितीय के पश्चात् सहसा कुशान वंशीय राजाओं का उल्लेख करता है । कोई कारण भी नही उपस्थित करता कि वह लम्बी राजाओ की श्रृंखला का जो दामोदर द्वितीय से कुशान वंशीय राजाओं तक हुए थे उल्लेख क्यों नही करता। प्रतीत होता है कश्मीर में लिखित, अलिखित कोई सामग्री प्राप्त नही थी जिसके आधार पर वह एक शताब्दी के राजाओ तथा कश्मीर की घटनाओ पर प्रकाश डालता । (२) हुष्क : मथुरा के लेख से हुष्क राजा हुविष्क प्रमाणित हुआ है। परिशिष्ट 'कुशान वंश' द्रष्टव्य है । (३) जुष्क : जुष्क राजा वास्तव में कुशान राजा वशिष्क था । परिशिष्ट 'कुशान वंश' द्रष्टव्य है। (४) कनिष्क : परिशिष्ट 'कुशान वंश' द्रष्टव्य है । (५) हुष्कपुर : वर्तमान उश्कुर गांव है। यह ग्राम बारहमूला से २ मील दक्षिण-पूर्व वितस्ता के वाम तट पर स्थित है। बारहमूला के डाक बंगला से आध मील पर है। कल्हण ने इसे वाराह क्षेत्र मे कहा है । (रा० त० ५:२५९, ६:१८६, ७:१३११, ८:३६०, ७१८, ८२२, ९४४) यहाँ ललितादित्य ने विहार तथा मन्दिर निर्माण कराया था (रा० त० ४:१८८) । कश्मीर के पश्चिमी पत्थरों से बने द्वार से प्रवेश करने पर यही हुएनसांग ठहरा था (हुएनसांग :१:२० ) अल्बेरूनी ने इसे बारहमूला के दूसरी तरफ लिखा है। (इण्डिया पृष्ठ १:२०७) । अबूरिहान उष्कर और बारहमूला को मिला दिया है। (फ्रेगमेंट्स ऑफ़ अरब पृष्ठ : ११६ )
[Right Column] बारहमूला के समीप उष्कर ग्राम वितस्ता के वाम पार्श्व में है। यहाँ दो चीजें दर्शनीय है । एक ऊँचा टीला उष्कर ग्राम के पास है। मैं जिस समय पहुँचा था यहाँ भारतीय फौज की छावनी थी । छावनी के फाटक तथा ऊँचे डूहूा के मध्य से बारह- मूला ऋषी बाबा की सड़क है। वह सड़क बारह- मूला से बाबा ऋषो जाती है । डूहूा पर एक भीमकाय शिवलिंग है । लगभग ६ फीट ऊँचा है। मेरे पास फीता नही था। अतएव ठीक नाप नही दे सकता । शिव लिंग में एक बाण बना है । बाण की नोक मूर्धा से प्रत्यंचा नीचे की तरफ होती भद्रपीठ तक चली गयी है । लिंग का भद्रपीठ चौकोर है। लिंग में बाण तथा यज्ञोपवीत तुल्य प्रत्यंचा बना मैने अब तक कहीं किसी लिंग में नहीं देखा है । इस लिंग का नाम क्या था । कहना कठिन है । बाण चिह्न अंकित होने के कारण 'बाणेश्वर' नाम रखा जा सकता है। इस समय केवल लिंग अकेला गड़ा है। यहाँ न तो कोई मन्दिर है न किसी प्रकार का ध्वंसावशेष । लिंग की पूजा भी नही होतो । बाणेश्वर लिंग होना असम्भव नही है । बाणेश्वर का मन्दिर रतलाम स्टेशन से ४४ मील पर स्थापित है । यह स्थान बाणासुर की राजधानी थी। कथा है कि बाणासुर ने बाणेश्वर लिंग की स्थापना की थी । संभव है। इस डूहूा पर कभी मन्दिर था वह तोड़ दिया गया । अब उसका ध्वंसावशेष मात्र रह गया है। डूहूा खोदने पर यहाँ के स्थान पर कुछ प्रकाश पड़ सकता है। यहाँ की ईंट आबादी पास होने के कारण गाँव वाले उठा ले गये हो । केवल मिट्टी का टीला मात्र शेष रह गया है। उष्कर ग्राम में, बारहमूला स्कूल के प्लेग्राउण्ड के पीछे मुकुलित कमल शैली के स्तूप का भग्नावशेष है । परिहासपुर तथा उष्कर दोनो स्तूपों की परि- कल्पना एक जैसी है। इस समय यह स्थान तार से घेर दिया गया है । बड़ी-बड़ी घास तथा जंगली खर-