भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 294

प्रथम तरंग ५०२ ह्लादोद्यान्नृत्तगीतक्षणे नर्तितुमुत्थितम् । प्रददौ ज्येष्ठरुद्राय सोऽवरोधवधुशतम् ॥ १५१ ॥ १५१. ज्येष्ठ रुद्र¹ के नृत्य एवं गान² के समय अन्तःपुर की स्त्रियों को नृत्य एवं गान निमित्त खड़ी होती देखकर आह्लादित राजा ने एक शत स्त्रियाँ ज्येष्ठरुद्र को दे दीं ।

भूतेश्वर के ऊपर अर्थात् उत्तर तरफ अनेक नाग पड़ते हैं। उनमें ब्रह्मसर भी एक नाग पड़ता है उसके ऊपर कालोदक है । हरमुकुट गंगा का यह अन्तिम तीर्थ स्थल है । प्रति वर्ष भाद्रपद में तीर्थ यात्रा काल पड़ता है । वर्ष मे जो लोग दिवंगत होते हैं, उनका अस्थि प्रवाह भी इसमें किया जाता है । इस सर के कुछ नीचे एक दूसरा सर है । उसे कालोदरू कहते हैं । नन्दीसर भी उसकी एक संज्ञा है। गाथा है। काल तथा शिव दोनों का यह निवास स्थान था। यही शिव के नन्दी भी रहते थे। कनकवाहिनी नदी में इनका तथा हरमुकुट पर्वत के पूर्व तथा दक्षिण पूर्व का जल कनकवाहिनी में आता है। नीलमत पुराण के अनुसार कनकवाहिनी का प्रवाह सोदर तीर्थ के दक्षिण है । यह काश्मीर का मानचित्र देखने से स्पष्ट होता है । वह उत्तर से बहती आती है। भूतेश्वर के समीपस्थ भूखण्ड का स्पर्श करती नीचे बहती दक्षिण की ओर चली जाती है। यदि सोदर अर्थात् नरनाग अथवा भूतेश्वर मन्दिर पर खड़े होकर देखें तो इन स्थानों के पूर्वीय अंचल का स्पर्श करती भयंकर गर्त में, बहती दक्षिण दिशा की ओर चली जाती है । कनकवाहिनी में हरमुकुट के गंगा सरोवर अर्थात् गंगवल और पवित्र नन्द कोल के जलस्रोत आकर मिलते हैं ।

(२) नृत्य एवं गान : मन्दिरों में देवताओ के सम्मुख नृत्य एवं गान निमित्त स्त्रियो की नियुक्त करने की प्रथा कश्मीर में प्राचीन काल से प्रचलित थी । गान तथा नृत्य वंश परम्परा गत भी चलता था। देव दासी प्रथा दक्षिण भारत की तरह इस समय कश्मीर में प्रचलित नही थी परन्तु स्त्रियाँ स्वतः अपने को देवता पर अर्पित कर देती थी। नृत्य एवं संगीत कार्य पेशेवर स्त्रियो तक सीमित नही था। मन्दिरो तथा देवालयों में घर गृहस्थो की भी स्त्रियाँ नृत्य एवं गान में भाग लेतो थी ।

कल्हण ने (रा० त० ४:२६९-२७०) राजा ललितादित्य के प्रसंग में वंशानुगत नृत्य एवं गान की प्रथा का वर्णन किया है। राजा ललिता- दित्य को एक वन में युवतियां नाचती और गाती दिखायी पड़ी थी । राजा ने उनसे उस एकान्त स्थान मे नृत्य एवं गान का कारण पूछा। युवतियो ने राजा को सूचित किया कि इस स्थान पर अनादि काल से उनके कुटुम्ब की कन्या किंवा युवतियों निश्चित समय पर आती थी । नाचती थीं । गाती थी । पुनः चली जाती थीं। राजा चकित हुआ । वहाँ उनका नृत्य तथा गान सुनने अथवा देखने वाला कोई नही था । प्रसंग वश उसे मालूम हुआ था । वहीं कोई देव स्थान कभी था। राजा को कौतूहल हुआ । उसने उस स्थान पर खनन कार्य किया । भूमि के नीचे केशव का मन्दिर मिला। वह शताब्दियों से वही भूमिस्थ हो गया था। अथवा मिट्टी पड़ते-पड़ते वह छिप गया था ।

वहाँ मन्दिर था। वह परम्परा किंवा जनश्रुति चली आ रही थी। जिस कुटुम्ब के लोग मन्दिर में गाते तथा नाचते रहे वे मन्दिर के भूमि में लोप

पाठभेद : श्लोक संख्या १५१ में 'नृत्त' का 'नृत्य' तथा 'सोऽवरोध' का पाठभेद 'स्वावराध' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : १५१ (१) ज्येष्ठरुद्र वादटिप्पणी १.११३ द्रष्टव्य है।