राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम'तरंग २१९ यक्षों का वर्णन महाभारत में यथेष्ट रूप से मिलता है। गुह्यकों के सन्दर्भ में यक्षों का उल्लेख किया गया है। महाभारत में उन्हें देव योनि में रखा गया है। विराट अण्ड द्वारा ब्रह्मादि के उत्पन्न होने के पश्चात् यक्षों की उत्पत्ति बताई गयी है। महाभारत आदि पर्व (१:३५) में यक्षों को पुलस्त्य मुनि की सन्तान कहा गया है। आदि पर्व (६६:७) में राक्षस रावण पुलस्त्य का नाती था। अतएव यक्षों का सम्बन्ध राक्षसों से मिलाने का प्रयास किया गया है। यक्ष मानव थे। श्री शुकदेव जी ने यक्षों को महाभारत की कथा सुनायी थी (आदि पर्व १:१०८) यक्षों ने कुबेर का राजपद पर अभिषेक किया था। (वन पर्व १११:१०:११) पाण्डव भीमसेन ने यक्षों तथा राक्षसों को पराजित कर भगा दिया था। (वन पर्व १६०:५७-५८) सुन्द-उपसुन्द ने इनको पराजित तथा पीड़ित किया था। (वन पर्व २०८:७) यम ने यक्ष का रूप धारण कर युधिष्ठिर से प्रश्नोत्तर किया था। यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर, धर्मराज युधिष्ठिर ने चारो भाइयो को जीवित किया था। (वनपर्व ३१४:४७।) प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण आकाश में उड़ते उन्हें माला पहनाते, पुष्प वर्षा करते हुए दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूर्ति में भी शिरोभाग के दोनो पाश्र्वों में उड़ते यक्ष, माला सहित उत्कीर्ण किये मिलते हैं। ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार वे राक्षस तथा खसा की सन्तान हैं। वे अपनी माता को खा जाना चाहते थे अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा। यक्षो के रूप का वर्णन किया गया है। उन्हें चार हाथ तथा चार पैर वाला दिखाया गया है। रात्रि में अपने आहार निमित्त विचरण करते हैं। एक यक्ष वमुरुचि का रूप धारण कर अप्सरा क्रथस्थला के साथ नन्दन में निवास किये थे। उससे रजत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। यक्ष अपने पुत्र के साथ हिमालय में निवास निमित्त आया था। ब्रह्माण्ड (३:७:६०, १००-१७, २२:१४, ४१:३०, ७१:१११,) भागवत आदि पुराणो में यक्षो की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता तथा विश्वा माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत (२.६:१३, ६०८२४, १०:३:२७, ६२:१८, ८५.४१ ब्रह्माण्ड पुराण २:३२:१-२, ३५:१९१, ३६:११८) पुराणो में उन्हें रुद्र का अनुयायी कहा गया है। उनके स्वामी का नाम कुबेर दिया गया है। भागवत (४:१०:४,११:१६:१६,२३:२४) तथा मत्स्य पुराण (८:५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व शूलपाणी को दिया था। वृत्र की सहायता इन्द्र के विरोध में यक्षो ने की थी। दक्ष यज्ञ में सती के साथ गये थे। भागवत (६:१०२०,४:४.४:३४) उनके खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९) मे किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षो ने मोक्ष प्राप्त किया था। भागवत (७:७:५०)। ब्रह्मा के समीप जब ककुद्मी गये थे तो उनका अनर्त राज्य यक्षों ने ले लिया था। भागवत (९:३:३६) देवो के साथ भगवान् कृष्ण को यक्ष देखने आये थे। भागवत (७:८:३८,९:३१:२) रावण ने यक्षों को परास्त किया था। ब्रह्माण्ड पुराण (३:७:२५५)। वे पित्रो की पूजा करते थे। भागवत पुराण (३:१०:३८, १११, ११:८१, ४:२:२६, १४:४, २०:५०, ३०:९, ३३:७५)। मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता है कि देव गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण शंकर तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षो के स्वामी कुबेर ने वैताल, यक्ष, नाग तथा किन्नरो की सेना के साथ शंकर की सहायता निमित्त युद्ध में भाग लिया था। मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के व्यव- हार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका सम्बन्ध हरिकेश यक्ष से है।