राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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२२० राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ] पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरि- केश था। हरिकेश शिव का उपासक बन गया। पूर्ण भद्र ने अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान आकर्पित करते हुए कहा- रुद्र की उपासना उचित नहीं है। हमारा काम मानवों से भिन्न है। यक्ष स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं। कुत्सित जीवों का भक्षण करते हैं। हिंसक होते हैं। न हि यक्षकुलीनानामेतं मूढ व्रतं तव। गुह्यका यत यूयं वै स्वभावक्रूरचेतसः॥ क्रव्यादारचैव किंभक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक। मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं ॰ । महात्मना ॥ पिता की बात न मानकर हरिकेश काशी आकर तपस्या करने लगा। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने हरिकेश से वर माँगने के लिये कहा। हरिकेश ने शिव भक्ति का वर माँगा। शिवने प्रसन्न होकर यक्ष को वरदान दिया - 'यक्ष, तुम सबके पूज्य गणो के स्वामी तथा धनपति होगे। प्राणियो से अजेय होंगे। अन्नदाता होगे। क्षेत्रपाल होगे। उद्भ्रम तथा संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे होंगे। तुम दण्डपाणि होगे।' काशी तथा मथुरा दोनो स्थानो पर यक्ष लोग अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव की उपासना अपना लिये। यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय धर्म तथा रीतियो के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर लिया। उन्हें शिव के गणो मे सम्मिलित कर लिया गया। वे शिव के भक्त तथा अनुयायी हो गये थे। भागवत (२:६:१३) मे विराट् पुरुष के वर्णन के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्षो, मृग, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर, सर्पादि को एक वर्ग मे रखकर उन्हे विराट् पुरुष माना गया है। भागवत (६:८ २४) मे नारायण कवच के वर्णन मे कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेतादि को कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है। देवराज इन्द्र के विरुद्ध जाते हुए यक्षों का वर्णन किया गया है। दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण के
[दायाँ स्तम्भ] साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना की बाढ़ रोकने के लिये आये थे। (भा०६:१० २०)। नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय- जयकार करते आने वालों में-सिद्ध, विद्याधर, महा- नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सरायें, चारण, यक्ष, किम्पुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर, सुनन्द तथा कुमुद आदि विष्णु के सभी पार्षद वहाँ आये। भागवत (७:८:३८) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप से यक्षों का वर्णन किया गया है। रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था। उनके ५० ककुद्मी थे। वे ब्रह्मा से भेंट करने गये थे। लौटकर अपने नगर में आये। देखा कि उनके वंशजों ने यक्षों के भय से नगर का त्याग कर दिया था। भागवत पुराण (९:३:३५)। भागवत (१०:६:२७) में यक्षों को भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा गया है। भागवत पुराण (१०:३२:१६) में यक्षों को पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, दैत्य, विद्या- धर तथा मनुष्यो के साथ वर्णन किया गया है। भागवत पुराण (१०:९०:९) में भगवान् अपनी पत्नियो के साथ बिहार करने की उपमा यक्षराज कुबेरका यक्षिणियों के साथ बिहार करने के साथ देते हैं। उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है। उसमें कहा है- 'मैं दैत्यो में दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रो में चन्द्रमा, ओषधियो में सोमरस एवं यक्षराक्षस मे कुबेर हूँ। (११:१६:१६)। यक्षों को 'धन कृपण' कहा गया है 'जो मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई, कुटुम्बी और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण है।' भा० (११:२३:२४)।