भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग २२१

रामायणकार को यक्षो का ज्ञान था। सुग्रीव ने बन्दरों को सीता के अन्वेषणार्थ जिन देशों तथा जातियो में जाने का नाम लिया था उनमें यक्ष का भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर मे निवास करती थी। (वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३:२३) । मत्स्य पुराण (अध्याय १२१) में यक्षों के निवास- स्थान के सम्बन्ध में उल्लेख है -- कैलास पर्वत के पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान चन्द्रप्रभा गिरि है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर चैत्ररथ वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा, यक्ष सेनापति, गुह्यकों से रक्षित निवास करता है। कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा मे हेमशृंग किंवा लोहित नामक एक पर्वत है। उसके पाद प्रदेश में लोहित सरोवर है। उससे लौहित्य महानद निकला है। उसके तट पर विशोक वन है। वहाँ परम धार्मिक मणिधर यक्ष एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा रक्षित निवास करता है। ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर रुद्र (वृष नन्दिकेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी। त्रिक- कूट के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। यहाँ वैद्युत पर्वत है। उस पाद में मानस दिव्य सरोवर है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर वैभाज दिव्य वन है। वहाँ प्रहेति का पुत्र कुबेर का सेवक ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास करता है। वायु पुराण (अध्याय ३६) में यक्षों का निवास स्थान दिया गया है-शतशृंग पर्वत पर अत्यन्त बली यक्षों के सौ पुर हैं। वायु पुराण (अध्याय ६९) में यक्षों के विषय में उल्लेख मिलता है- पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के अन्तर्गत हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों के राजा कुबेर हैं। अलका नगरी के कुबेर अधी- श्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस शरीर के भीतर प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीड़ित कर पीते हैं। सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के समान, अधि- कारी, तेजस्वी, बलवान्, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी, लोकों द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले, तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यक्ष परायण एवं देवताओं के समान धर्मात्मा होते हैं, उन्हें असुर कहा जाता है। गन्धर्वों का प्रभाव देवताओं की अपेक्षा तीन- चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्वों में देवताओं का चतुर्थांश प्रभाव हीन है। गुह्यक का प्रभाव यक्षों के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में केवल सोलहवां भाग देवताओं के प्रभाव का शेष रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों तुल्य होता है। यक्षों से तीन गुने हीन प्रभाव पिशाच होते हैं। रूप, वायु बल, धर्म, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपस्या, शास्त्र बल एवं पराक्रम में गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न होने वाले, वर्ग सुर तथा असुरों की अपेक्षा हीन होते हैं। उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट होती है। (१) यक्ष देवयोनि में थे। मानव थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचो के वर्ग में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा असुरों के वर्ग में उन्हें अधिक रखा गया है। (४) वे हिमालय निवासी थे। उनका आवास कैलास के आसपास था। (५) वे आसुरी मत, मांसादि खाने तथा रक्त पात करने वाले थे। किन्तु कालान्तर में वे शिव के अनुयायी हो कर शैवमतावलम्बी हो गये थे। ६) कुबेर उनका राजा था। वे युद्ध मे भाग लेते थे।