भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२१२ राजतरंगिणी हरप्रसादपात्रेण सच्चरित्रानुरागिणा । बबन्ध सुखिना सख्यं येन वैश्रवणः स्वयम् ॥ १५५ ॥ १५५. उस हर प्रसाद पात्र एवं सच्चरित्रानुरागी सुखी राजा से स्वयं वैश्रवण १ मैत्री सूत्र में बँधे थे। कुबेर इव यो राज्ञामग्र्यः स्वाज्ञाविधायिनः । आदिश्य गुह्यकान्दीर्घं गूढसेतुमबन्धयत् ॥ १५६ ॥ १५६. कुबेर तुल्य राजाओं में अग्र उसने आज्ञानुवर्ती गुह्यकों को आदेश देकर दीर्घ गूढ सेतु २ बँधवाया। यदि वह अशोक वंशोत्पन्न होता तो भारत य इतिहास इस पर प्रकाश अवश्य डालता । अब तक की प्राप्त सामग्रियों के आधार पर अशोक के किसी दामोदर पौत्र का होना नही मिलता है। १५४ (१) माहेश्वर : कल्हण ने राजा को यहाँ पर शिव के उपासक रूप में उपस्थित किया है। उसने महेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। कल्हण ने श्लोक संख्या १३५ में भी जलोक के लिये माहेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। यह राजा निस्सन्देह अपने पूर्व राजा जलोक के समान महेश किंवा शिव का उपासक था। अन्यथा उसे उत्तराधिकार मिलना कठिन होता । यह जनता अथवा मन्त्रिमण्डल द्वारा निर्वाचित राजा था। अथवा जलोक कुलावतंस था। यह सब अप्रकट है। यहाँ केवल एक कड़ी माहेश्वर शब्द उसे जलोक से जोडती है। यह श्लोक और श्लोक संख्या १३५ इस बात को प्रमाणित करते है कि जलोक तथा दामोदर दोनो का मत एक था। वे एक ही देव के उपासक थे । माहेश्वर शिव के एक अवतार हुए हैं। शिव के अडतालीस नामो में एक नाम महेश्वर है। आठ मातरः में एक माहेश्वरी है। १५५ (१) वैश्रवण : अथर्ववेद (८.२० २६) में कुबेर वैश्रवण का उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण (१७:४.१ १०) के अनुसार कुबेर वैश्रवण एक राजा है। राक्षस उनकी प्रजा है। तैत्तिरीय अरण्यक (१.३१.३) ने कुबेर को एक देवता रूप में प्रस्तुत किया है। वे नमस्करणीय है। प्रार्थित है। वैवस्वत मन्वन्तर में विश्रवा ऋषि का इसे पुत्र कहा गया है। इनकी माता इडविटा थी। उनकी माता का नाम मंदाकिनी भी मिलता है। धनपतित्व के निमित्त इसने तपस्या की। कुबेर हो गया। जिस स्थान पर तपस्या की थी वह महाभारत (श. ४६:२२) के अनुसार कौबेर तीर्थ हो गया। देवी पार्वती की ओर इसने एक बार देखा तो इसका बांया नेत्र नष्ट हो गया। दक्षिण भाग पीला पड़ गया। इसलिये उसका नाम एकाक्ष पिंग्लू हो गया। उत्तर दिशा का अधिपति माना गया है। उत्तरस्थित यक्ष लोक में निवास करता है। यक्षों के अधिपतित्व प्राप्त की कामना से इसने तपस्या की थी। तपस्या स्थान कावेरी नर्मदा संगम माना गया है। गन्धमादन पर्वत शिखर पर इसका निवास स्थान है। मेरु पर्वत के उत्तर विभावरी भी इसका एक निवास स्थान है। वृद्धि तथा ऋद्धि इसकी शक्तियां है। इसकी सभा का नाम कुबेर सभा है। कुबेर की एक पत्नी का नाम भद्रा है। इसकी पूरी का नाम अलकापुरी है। पूर्व जन्म से कापिल्य नगरी में अग्निहोत्री यज्ञदत्त का गुणनिधि नामक पुत्र था। मुचकुंद से इसका संवाद, ब्राह्मण क्षत्रिय एकता होने पर राज्य सुख की वृद्धि होतो