राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ राजतरंगिणी अर्थात् दरों की रक्षा पर अवलम्बित है। यह प्रथम कश्मीरी राजा था जिसने एक ठोस सैनिक नीति की स्थापना की। उसने भविष्य के राजाओं को चेतावनी दी जबतक कश्मीर के द्वारों की दृढ़ता पूर्वक रक्षा होती रहेगी, कश्मीर की स्वतन्त्रता कायम रहेगी। राजा ने द्वारों अर्थात् दरों की मोर्चेबन्दी की। वहीं सैनिक चौकियां तथा शिविर स्थापित किया। और उसकी रानी ईशान देवी ने द्वारों की रक्षा के निमित्त आध्यात्मिक शक्ति मातृ चक्रों की स्थापना की। यदि पति ने भौतिक शक्ति को उत्साहित किया तो पत्नी ने आध्यात्मिक शक्ति का कश्मीर मण्डल की रक्षा के लिये आश्रय लिया। वह धर्म निरपेक्ष किंवा लौकिक राजा था। उसने सभी धर्मों के प्रति समभाव रखा। बौद्धों के प्रति उसका रोष स्वाभाविक था। बौद्धों का संघटन, राष्ट्र के प्रति निसंकोच निष्ठा भावना का अभाव, प्रारम्भ में उसे उनका विरोधी बना दिया था। उसने सनातन धर्म की पुनः स्थापना की। कल्कि अवतार तुल्य उसने सनातन धर्म का कश्मीर मण्डल में उद्धार किया। परन्तु समय आते ही वह सहिष्णु हो गया। कृत्या के साथ हुआ उसका संवाद उसके चरित्र को ऊपर उठा देता है। वह बौद्धों के प्रति झुकता है। उनके विहारों की स्थापना करता है। उनके प्रति क्रोध, उग्र व्यवहार सबको तिरोहित कर देता है। स्वमांस देने की घटना उसे पौराणिक आदर्श राजाओं की श्रेणी में बैठा देती है। राजा लोकप्रिय था। लोकनायक था। लोक वीर था। अनेक लोकविजेता था। लोकनाथ था। अनेक लोकप्रिय गाथाएं उसके जीवन के साथ सम्बन्धित कर दी गयी थीं। उसकी महानता प्रमाणित करने के लिये अनेक अलौकिक घटना पूर्ण गाथाएं उसके नाम के साथ जोड़ दी गयी हैं। राजा ने कश्मीर मण्डल को ऊपर उठाया। तत्कालीन ऐतिहासिक जगत् में उसका स्थान बनाया। उसने अनेक उपनिवेश कश्मीर मण्डल में बसाये। जनजीवन को उन्नत किया। समाज को विकसित करने के लिये विद्या का आश्रय लिया। जनता में नव चेतना एवं स्फूर्ति का संचार किया। उसने कश्मीर मण्डल में नव क्रान्ति की। जिसने कश्मीर जीवन में एक नवीन प्रेरणा का सूत्रपात किया। निष्क्रियता से लोगों को उठाकर कर्मशीलता की ओर प्रेरित किया। राजशास्त्र का राजा विद्वान् था। राजशास्त्र का अध्ययन किया था। यह उसके प्रशासनिक सुधारों से स्पष्ट प्रतीत होता है। उसने रूढ एवं जड़ता प्राप्त प्राचीन शासन पद्धति में आमूल परिवर्तन किया। उसे समयोपयोगी बनाया। शासन के ढाँचे को वैज्ञानिक ढंग पर ढाला। शासन पद्धति का नवीनीकरण किया। पुनःसंघटन किया। शासन को जनता के लिए उपयोगी बनाया। जनता की सुविधा, कार्यों की सरलता, समृद्धि का ध्यान रखते हुए राज्ययन्त्र को सुशासित, समयोपयोगी एवं मुनियोजित किया। अशोक ने भेरी घोष के स्थान पर धर्म घोष किया था। उसके पुत्र जलोक ने भेरी घोष किया, धर्मघोष किया और विवेक घोष का आश्रय लिया। उसने अपना जीवन एकांगी नहीं बनाया। उसने अपने जीवन को राज्योपम सन्तुलित रखा। किसी का त्याग, किसी का नितान्त विसर्जन, किसी का सम्पूर्ण ग्रहण, उसने नहीं किया। राज्य के लिए, लोक के लिये, जब जिस समय, जो उपयोगी सिद्ध हुआ, उसे एक राजर्षि तुल्य निस्संकोच ग्रहण किया। सन्त अवधूत ने अपने पाण्डित्य से बौद्धों को शास्त्रार्थ में परास्त किया था। लोक ने इन खण्डन मण्डन से स्वयं निष्कर्ष निकाला। अपना मार्ग सुनिश्चित किया। शैवमतावलम्बी होते हुए भी वह सहिष्णु था। कृत्या की घटना से स्पष्ट करती है। बौद्धों के प्रति जो भी कुछ विरोधी भाव था उसे वर्णाश्रम धर्म प्रचार भावना की प्रबलता होते ही क्षण मात्र में त्याग दिया। उसने विनष्ट विहारों का पुनर्निमाण, राजकोश