राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २०७ कल्हण ने यहाँ शिव, शंकर, महादेव का नाम न लेकर गिरिजापति का नाम लिया है । यह विशेष महत्त्व रखता है । कल्हण संकेत करता है । राजा और रानी दोनों ने शरीर विसर्जन कर सायुज्य प्राप्त किया । इसलिये कल्हण ने कवि दृष्टि से गिरिजापति अर्थात् शिव शब्द का यहाँ प्रयोग किया है । पत्नी पति की अर्द्धांगिनी होती है । इसी से अर्धनारीश्वर की कल्पना की गयी है । शिव का शरीर पत्नी एवं पति दोनों का योग अर्थात् अर्धनारीश्वर है । एक भाग शिव तथा दूसरा भाग पार्वती का है। गिरिजा और पति दोनों मिलकर शिव हुए हैं । अतएव राजा जलोक अपनी पत्नी के साथ सायुज्य प्राप्त किया । अर्थात् शिव में मिल कर एकाकार हो गया । मुक्त हो गया । राजा का अंश शिव तथा पत्नी का अंश गिरिजा में मिलकर एक ही अर्धनारीश्वर के शरीर में साथ ही विलीन हो गये । पुरुष मिल गया पुरुष भाग में और स्त्री मिल गई स्त्री भाग में । सायुज्य शब्द का प्रयोग कल्हण ने बहुत समझ और तौलकर यहाँ किया है । राजा ब्रह्मासन पर बैठा था । उसे ब्रह्मलीन होना न कहकर गीरोपति अर्थात् शिव में सायुज्य प्राप्त करना लिखता है। ब्रह्मलीन केवल ऋषि तथा ब्राह्मणो का होना पुरानी परम्परा के अनुसार कहा गया है। राजा जलोक ब्राह्मण नहीं था । राजर्षि था । ऋषि नही था । अतएव कल्हण पुरानी परम्परा का निर्वाह करते हुए सायुज्य का उल्लेख करता है । कल्हण स्वयं शैव था अतएव उसकी दृष्टि में शिव के सायुज्य को विशेष महत्त्व था । मूल्यांकनः जलोक का चरित्र चित्रण भारतीय इतिहास में शून्यवत् है । उसका उल्लेख सर्वत्र अशोक के एक पुत्र के सन्दर्भ में किया गया है । राजा जलोक का चरित्र इतना महान् एवं आदर्श है कि उसके जैसे चरित्रवान राजा विश्व में इने गिने मिलेंगे । कल्कि अवतार का वर्णन पुराणों में मिलता है । म्लेच्छों के नाश तथा धर्म के पुन.स्थापना निमित्त कल्कि अवतार होने की भविष्यद् वाणी की गयी है । कल्कि के काल्पनिक रूप एवं क्रिया कलाप से जलोक का क्रिया कलाप मिलता है । सम्भव है जलोक का ही कल्कि अवतार की कल्पना रूप में चित्रण किया गया हो । परन्तु इस विवाद में यहाँ पड़ना उचित नहीं है । जलोक कल्कि अवतार के समान महान् सेनानी था । उसने म्लेच्छों से भूमि से विहीन किया । कल्हण के शब्दों में वह स्वयं अवतार था । बौद्धों के शब्दों में यह बोधिसत्त्व था । तत्कालीन सनातन धर्म तथा बौद्ध धर्म दोनों मतावलम्बियों ने उसे अवतार चाहे न भी हो अवतार के समकक्ष माना है । जलोक महान् सेनानी के अतिरिक्त, आदर्श राजा, विद्वान्, द्रष्टा, संगठन कर्ता, चरित्रमान, उदार, सहिष्णु, सरल, धर्मभीरु, दानी, एक पत्नीव्रतधारी, कर्मठ एवं योगी था । उसने इच्छा मृत्यु पाकर, स्वयं योग द्वारा शरीर त्याग कर, अपनी श्रेष्ठता तथा अलौकिकता की छाप लगायी है । राजा ने विदेशियों से कश्मीर मण्डल को मुक्त किया । कश्मीर की सैनिक शक्ति का संगठन किया । उसने कश्मीर वीरों को फौलाद की दीवाल तुल्य बना दिया । उन्हें विश्व के यूनानी जैसे वीर सैनिकों के सामने खड़ा कर दिया। वह राज्य पाकर बैठा नहीं रहा । ऐश्वर्य में डूबा नहीं । उसने एक विज्ञ कर्मशील राजा तुल्य अस्त्र उठाया । अभियान किया । भूखण्ड विजय किया । किन्तु उपनिवेशवाद का वरण नहीं किया । उसने विजय करने के पश्चात् भी कश्मीर मण्डल के अतिरिक्त अन्य भूखण्डों पर राज्य नहीं किया । उन्हें अपने राज्य में सम्मिलित नहीं किया । उनमें मित्रता स्थापित की । जिनका राज्य था उन्ही को वहाँ रहने दिया । उसने कश्मीर का सामरिक एवं सुरक्षा दृष्टि से अध्ययन किया । चतुर सेनापति के समान वह समझ गया । कश्मीर की सुरक्षा उसके संकट या द्वार