भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 984 में से

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२१० राजतरंगिणी

जीवन का अविच्छिन्न अंग बना दिया था । संगीता- दिकला पेशा न होकर, क्रय-विक्रय की सामग्री न होकर, भगवान् के मनोरंजन, उनके प्रति श्रद्धा भक्ति प्रकट करने, उनके सानिध्य में रहने का एक साधन हो गयी । कला जीविकोपार्जन का साधन न होकर मानव विकास का सोपान बन गयी । राजा ने राजकोश का प्रयोग अपने विलास के लिये नहीं किया । जनता का धन जनता के जीवन स्तर को उठाने के लिये, सार्वजनिक कार्यों के लिये खर्च किया । उसने मन्दिरों पर दान चढ़ाया । विहारों का निर्माण कराया । मन्दिरों का निर्माण कराया । जनता को उनके लिये सक्रिय किया । उनके सम्मुख दान का आदर्श रखा । राजा की देश-भक्ति संकुचित नहीं थी । वह प्रतिक्रियावादी नहीं था । उसने कश्मीर मण्डल का सामाजिक ढाँचा शिथिल देखा । रूद्ध देखा । जड़ देखा । विद्या की कमी देखी । उसने सोत्साह कश्मीर के बाहर से विद्वानों को बुलाया । उन्हें सब तरह की सुविधा देकर कश्मीर को समृद्ध करने की ओर उन्हें प्रेरित किया । निश्चित योजनानुसार चलाने का स्तुत्य प्रयास किया । राजा का व्यक्तिगत चरित्र बड़ा निर्मल था । वह राज्य कार्य में व्यस्त रहने पर भी धार्मिक कर्म से विरत नहीं हो सका । उसने भौतिक तथा आध्या- त्मिक दोनों कार्य-कलापों को एक समान तुला के दोनों पलड़ों की तरह रखा । राजा स्वयं योगी था । उसने चारपाई पर राज्य प्रासाद में रोग ग्रस्त होकर मरना उचित नहीं समझा । उसने राज सुख त्याग दिया । उसने शरीर तथा इन्द्रियों के शिथिल होने के पूर्व शरीर त्याग देना उचित समझा । उसने एक ऋषि तुल्य अपने परलोक की यात्रा निमित्त स्वयं यात्रा मार्ग प्रशस्त किया । वह चोर मोचन तीर्थ में आकर बैठ गया । योग का आश्रय लिया । अपनी पत्नी जिसका पाणिग्रहण किया था । जिसे सप्तपदी के समय वचन दिया था कि इसे सर्वदा साथ रहेगा विलग नहीं होगा, उसने एक अंग से स्वर्ग जाना पसन्द नहीं किया । अपनी अर्धांगिनी को भी साथ लिया । दोनों पति-पत्नी ने एक साथ संसार का त्याग किया । उसने तपस्वियों एवं ऋषियों जैसी मृत्यु आलिंगन की भूमिका तैयार की । पद्मासन लगाया । निश्चेष्ट अवस्थित धूप हीन ज्योति तुल्य निश्चल ध्यानरत हो गया । इसी रूप से उसने सायुज्य प्राप्त किया । राजा जलोक का व्यक्तित्व इतना ऊँचा है कि कवि की वाणी, लेखक की वाणी उसके वर्णन में, उस तक पहुँचने में असमर्थता का बोध करती है । कश्मीर मण्डल के राजाओं की लम्बी श्रृंखला में इतना महान्, समर चतुर, सेनानी, दानी, राजनीतिज्ञ, कलाप्रेमी, शास्त्रज्ञ, तपस्वी, निर्मल चरित्र, राजा का दर्शन नहीं मिलता । उसने अपने लिये अपने सुख के लिये कुछ नहीं किया । जो कुछ किया कश्मीर मण्डल के लिये किया । वहाँ की जनता के लिये किया । मुसलिम इतिहासकार भी जलोक के जीवन से अत्यन्त प्रभावित थे । उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिये अबुल फजल उसको विजय समुद्र पर्यन्त होना लिखता है । आजम, वंबुद्दीन उसे उत्तरौय ईरान का विजेता मानते हैं । हसन उसे कन्धार और बलख तक पहुँचा देते हैं । कन्नौज और बिहार तक उसे पहुँचाना हसन के लिये साधारण बात थी । कन्नौज तक उसका आना प्रमाणित होता है । इन वर्णनों का इतना महत्त्व अवश्य है कि जलोक को सभी एक महान् विजेता समझते थे और विजेता रूप में उसका चित्रण करते हैं । वह पहला कश्मीरी राजा था जो गोनन्द के पश्चात् कश्मीरी सेना लेकर कश्मीर मण्डल के बाहर विजयर्थ निकला था । लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् कश्मीर-वाहिनी ने मथुरा युद्ध के बाद पुनः अपना पराक्रम प्रदर्शित किया था ।

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