राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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शीर्षक: प्रथम तरंग २२९
बायाँ स्तम्भ (Left Column): अधरों पर गम्भीर मुद्रा के साथ आध्यात्मिकता मिश्रित मुसकान है । भरी पूरी मुखाकृति है । कंघी से सँवारे केश में सीमंत मन में अनायास पवित्र भाव उत्पन्न करते हैं । मिथुन, काम एवं भौतिक सौन्दर्य दर्शक मुद्रा के यह विपरीत मुद्रा है तथा कलाकृति है । मूर्ति बी. सी. १९: भग्न मस्तक है । नासिका, भौं, अधरों पर की मुसकान देखते बनती है । मस्तक पर बाल कढ़े हुए हैं । मध्य भाग से कानों के ऊपर होते हुए कंघी किये हुए केश पीछे की ओर घूमे हैं । खण्डित पीन पयोधर की क्रम संख्या बी. सी. ३५ है । स्तन पर कुच बन्ध लगा है । कण्ठ में मुक्ता माला के अतिरिक्त स्तनों पर दूसरी मुक्तामाला सुशोभित है । कामिनी के शृंगार के रूप को प्रकट करती है । तत्कालीन काश्मीर के लोग कितने शृंगार तथा कला के प्रिय थे । उस पर प्रकाश डालती है । मस्तक खण्ड बी. सी. १६ : एक भिक्षु का है । उसकी दाढ़ी-मूंछ तो मुंडी हैं परन्तु मस्तक पर बाल कढ़े हैं । यह तत्कालीन काश्मीरी लोगों के बाल रखने की एक शैली पर प्रकाश डालता है । इस प्रकार के बाल काटने को बनारस की तरफ 'खत' काटना, कहते थे । मेरे बचपन में पुराने लोग 'खत' कटाते थे । मेरा भी बाल बचपन में इसी ढंग पर काटा जाता था । इस समय पाश्चात्य शैली पर बाल काटा जाने लगा है । पुरानी बातें लोग भूल रहे हैं । मूर्ति खण्ड बी. सी. ३४ : विचित्र मूर्ति है । उसका कटि तथा ऊरु मात्र शेष रह गया है । इस मूर्ति का शिश्न तथा अण्डकोष खुला है । कन्धा से आता कुर्ता कटि प्रदेश तक रह गया है । कुर्ता के छोर पर मुक्ता पंक्ति गुथी है । यह किसी श्वेताम्बर जैन सन्त की मूर्ति हो सकती है । इसके अतिरिक्त यहाँ से हाथ, कलाई, पद, भुजाओं के खण्डित भाग मिले हैं । उन्हें देखने से तत्कालीन वेशभूषा तथा विभिन्न प्रकार के प्रायोगिक अलंकारों पर प्रकाश पड़ता है । कंकण, चूड़ियाँ,
दायाँ स्तम्भ (Right Column): भुजबन्द पहनने की चाल थी । कलाई की उँगलियाँ बहुत ही सुन्दर तथा लहर की तरह बनायी गयी हैं । (६) जुष्कपुर : श्रीनगर के उत्तर में एक बड़ा ग्राम है । इसका वर्तमान नाम जुकुर है । हरि पर्वत से ४ मील दूर है । यहाँ के प्राचीन ध्वंसावशेषों के शिलाखण्ड, मजारों, कब्रिस्तानों तथा मसजिदों में लगे मैने देखा है । बहुत पत्थर गढकर नवीन इमारतों में लगाये गये हैं । अतएव उनका पूर्व रूप निश्चित करना दिन पर दिन कठिन होता जायेगा । जनरल श्री कनिंघम को सन् १८४७ में तथा श्री स्टीन को वहाँ बहुत शिलाखण्ड मिले थे । जनरल कनिंघम ने सन् १८४७ ई० नवम्बर मास में वहाँ की यात्रा की थी। उन्हें उस स्थान पर बहुत अधिक संख्या में पत्थर के स्तम्भ मिले थे । कुछ कश्मीरी पुरातन शैली से अलंकृत पत्थर थे । सबका उपयोग तराश कर मसजिदों तथा जियारातो में किया गया था । (एनिसिएण्ट ज्योग्राफी पृष्ठ ८५) जनरल कनिंघम ने जिन स्तम्भों तथा पत्थरों को देखा था वे निस्सन्देह जुष्कपुर में निर्मित विहारों के अवशेष थे । अगले श्लोक से यह स्पष्ट प्रकट होता है कि उसने जुष्कपुर में विहार का निर्माण किया था । जुष्कपुर के उत्तर देवीपुर, पूर्व में तात्वल, पश्चिम प्राचीन अमरेश्वर, ऊबरहर और धुर दक्षिण डंगरपुर तथा दूर पर हरिपर्वत पड़ता है । (७) कनिष्कपुर : वर्तमान कानिशपुर है । यह श्रीनगर-बारहमूला सड़क पर स्थित है । ग्राम के पास एक पुराना टीला है । वहाँ से अलंकृत पत्थर मिले थे । कहा जाता है कि राजा कनिष्क का यहाँ निवासस्थान था । इस स्थान पर प्राचीन ध्वंसावशेषों के शिलाखण्ड तथा मुद्राएँ मिलती हैं, जनरल कनिंघम ने १८४७ में यहा की यात्रा की थी । प्राचीन ध्वंसावशेषो के शिलाखण्डादि उन्हें जियारातो तथा कब्रों में लगे मिले थे । बहुत अधिक संख्या में इस प्रकार के ध्वंसावशेष बिखरे थे । श्री स्टीन लिखते हैं । पण्डित साहिबराम के तीर्थ में इसका मूल नाम कनिष्कपुर दिया गया है ।