भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२३० राजतरंगिणी सविहारस्य निर्माता जुष्को जुष्कपुरस्य यः । जयस्वामिपुरस्यापि शुद्धधीः संविधायकः ॥ १६६ ॥ १६९. उस शुद्धधी जुष्क राजा ने जुष्कपुर के विहार का निर्माण कराया। वह जय स्वामीपुर¹ का भी निर्माता था। ते तुरुष्कान्वयोद्भूता अपि पुण्याश्रया नृपाः । शुष्कलेत्रादिदेशेषु मठचैत्यादि चक्रिरे ॥ १७० ॥ १७०. तुरुष्क¹ वंश में उद्भूत होते हुए भी इन पुण्यात्मा नृपों ने शुष्कलेत्रादि² स्थलों में मठ, चैत्यादि बनवाया।

श्री पण्डित काशीराम से थो स्तीन ने सन् १८६१ ई० में जाँच कराया था। वहाँ के स्थानीय ब्राह्मणों की एक प्रचलित परम्परा से ज्ञात हुआ था। यहाँ कनिष्ठराज का राज्य था। यह स्थान पीर पंचाल जाने वाले दर्रा मार्ग पर श्रीनगर से १० मील दक्षिण स्थित है। यहाँ पर एक छोटी सराय है उसे कामपुर सराय कहते हैं। यह स्थान वितस्ता नदी से लगभग ९ मील पूर्व है। इसके दक्षिण वितस्ता पर बारहमूला पड़ता है इसके उत्तर पूर्व रावतपुर तथा पूर्व दक्षिण सैय्यद भोक्स की जियारत है। १६९ (१) जयस्वामीपुर : जयस्वामीपुर का पता अभी नहीं चल सका है। इस पर अनुसन्धान की आवश्यकता है। जयस्वामी विष्णु का नाम है। प्रतीत होता है । जुविष्क का झुकाव वैष्णव धर्म की ओर हो गया था। अन्यथा वह जयस्वामी शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता। उसने जुष्कपुर मे विहारों का भी निर्माण कराया था। इससे प्रतीत होता है। राजा सहिष्णु था। वह बौद्ध तथा वैष्णव दोनों धर्मों का आदर करता था। १७० (१) तुरुष्क : कनिष्क तथा उसके उत्तरा- धिकारी तुर्कवंशीय थे। यह मान्यता प्राचीन काल में प्रचलित रही है। अल्बेरूनी ने भी यही कहा है (२.१०) । तुरुष शब्द ऋग्वेद (२:४६:३२) में दान शब्द के साथ आया है। आर्यतर जाति बिना दान हुए आर्य के लिये सम्भवतः प्रयोग होता रहा है। पुराणों में तुषार शब्द तुरुष्क के लिये भी आया है। भागवत के पाठ में तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया गया है। इनका उल्लेख यवनादि राजाओं के साथ किया गया है। (वायुपुराण ६९:३६०:६२, मत्स्य पुराण २७२:१९:२१ ब्रह्माण्ड पुराण ३:७४:१७२—१७६, भागवत पुराण १२:१:३० ।) पुराणों मे उल्लेख आया है : काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा अंग लौकिकाः । चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुला बाह्यतो नराः ॥ मार्कण्डेय पुराण ५७:३९ 'बाह्यतो नराः' शब्द महत्त्व रखता है। इस ओर संकेत करता है कि ये भारत के बाहर से आने वाले लोग थे। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराणों के अनुसार कम्बोज, कश्मीर के राजौरी (राजपुरो) उपत्यका से हिन्दूकुश पर्वतमाला तक रहने वालों के लिये प्रयुक्त किया गया है । कुछ विद्वान् कम्बोज क्षेत्र को बदखशां के समीप हिन्दूकुश के पार तक ले जाते हैं। दरद-कृष्णगंगा के अर्ध्य भाग वाली उपत्यका अर्थात् उत्तरी कश्मीर में रहते हैं उसे वर्तमान काल में दर्दस्तान कहते हैं। कम्बोज और दरद नाम के साथ-साथ आने से यह प्रतीत होता है कि दोनों क्षेत्र परस्पर मिले थे। (मत्स्य पुराण २७३; वायु पुराण २.१०; ब्रह्माण्ड पुराण ३:७४)