भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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'चीनांश्चैव तुषारांश्च' के प्रयोग से मालूम होता है कि कम्बोज तथा दरद की तरह चीन तथा तुषार देश परस्पर मिले थे । दोनों की सीमाएँ एक साथ मिलती थी अन्यथा युगल प्रयोग न किया गया होता । मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' एक साथ उल्लेख किया गया है । वायु पुराण में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' का उल्लेख है । मार्कण्डेय पुराण में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' का उल्लेख है । वामन पुराण में 'वेरणा- श्चैव तुषारांश्च' शब्द का उल्लेख किया गया है । धरवो ने तुखारिस्तान का वर्णन किया है । उसमे बलख सम्मिलित हो जाता है । वक्षु अर्थात् आमू दरया के मध्यवर्ती दोनों तटवर्ती अंचलों को लेता चला जाता है । यद्यपि आमू दरया के दक्षिण का अंचल तुषार देश में आता है । वर्तमान तुर्किस्तान तुषार अर्थात् तुर्कों का अंचल कहा जा सकता है । पुराणों में उल्लेख मिलता है : सान्ध्रांस्तुपारान् लम्पाकान् पह्लवान् पारदान् शकान् । एतान् जनपदांश्चक्षु : प्लावयन्ति गतोदधिम् ॥ वायु पुराण में 'सान्ध्रांस्तुपारांस्तम्पाकान् तथा 'सान्ध्रांस्तुपारास्तम्बवान्' आया है । मार्कण्डेय पुराण में 'तुपारान् वर्वराकारान्' तथा 'तुषारान् वर्वराकारान्' का प्रयोग किया गया है। ब्रह्माण्ड पुराण में 'सान्ध्रांस्तुपारान् लम्पाकान्' का उल्लेख मिलता है । तुखार तथा तुषार शब्द एक ही है । जाति के लिए तोखरी अथवा तोखरो शब्द का प्रयोग किया गया है। विष्णु पुराण ( ४:२४:५३ ) में तुरुष्क शब्द का उल्लेख करते हुए 'तुरुष्कारा मुण्डारश्च' कहा गया है। इस प्रकार तुखार, तुषार, तोखरी, तुरुष्क, तुर्क सब एक ही जाति के नाम हैं। केवल उच्चारण के भेद प्रकट करते हैं । महाभारत में तुषार क्या तुखार दोनों ही शब्दों का प्रयोग किया गया है । तुषारवासियों को म्लेच्छ भी कहा गया है । (सभा पर्व ५०:१८५०) युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में वहाँ के निवासी आये थे तथा रसोई परोसने का कार्य करते दिखाई देते हैं । वन पर्व ( ५१:२५-२६, ५१:१९९१, १७७:२१. ) में उल्लेख मिलता है । पाण्डव लोग गन्धमादन से द्वैत वन की ओर लौटते समय तुषार देश को पार कर राजा सुबाहु के नगर में पहुँचे थे । भीष्म पर्व ( ७५.२१ ) में तुषारों के युद्ध में भाग लेने का वर्णन मिलता है । तुषार जनपद के घोर गण भीष्म द्वारा निर्मित क्रौंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व स्थान में व्यूह की रक्षा कर रहे थे । शान्ति पर्व ( ६५.२४२९ ) तुषारवासियों के निवास के विषय में कहा गया है । तुषारवासी म्लेच्छ मान्धाता के राज्य में निवास करते थे । मान्धाता के विषय में पुराणों में कहा गया है कि इक्ष्वाकुवंश की १८वीं पीढ़ी में हुए थे। वे अपने पिता युवनाश्व की कुक्षि से उत्पन्न हुए थे । पुरुकुत्स, अम्बरीष तथा मुचुकुन्द उनके पुत्र थे । मान्धाता चक्रवर्ती राजा थे । सात द्वीपों में उनका राज्य था । उनके राज्य विस्तार के विषय में कहा गया है । यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति । सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ( ब्रह्माण्ड पुराण ३.६३:६८-७२ ) हरिवंश पुराण उनका शक, पह्लव, दरद, अन्य म्लेच्छ तथा दस्यु जातियों के साथ उल्लेख करता है । स्ट्रेबो ( ९:५१५ ) कहता है कि ग्रीक अर्थात् यूनानियों के बलख से निकालने का श्रेय तोपरो जाति को भी है । यह स्थान तुर्किस्तान प्रतीत होता है । तोखरी जाति का स्थान हिन्दूकुश पर्वत के उत्तर बताया गया है। वह तोखरो जाति का उल्लेख करता है जो वास्तव में तुषार अर्थात् तुर्किस्तान के तुर्क हैं। मार्कण्डेय पुराण ( ५७:३९ ) में तुपारो