भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२३२ राजतरंगिणी

का वर्णन है । उनका उल्लेख काम्बोज, दरद, वर्वर तथा चीनों के साथ आया है । १५वीं शताब्दी तक संस्कृत लेखों में तुर्कों के लिए तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया गया है । मेवाड़ के राजा मोकल का विक्रम संवत् १४८५ के चितोड गढ के लेख में उल्लेख है कि राजा ने अंग, कामरूप, वंग, निषाद, चीन तथा तुरुष्को पर विजय प्राप्त किया था । यह कवि का गौरव वर्णन है । ऐतिहासिक तथ्य नही है । इसका महत्व केवल इसलिए है कि उस समय भारत में रहने वाले मुसलमानो के लिए तुरुष्क शब्द का प्रयोग होता था । अपनी बाल्यावस्था की बातें मुझे याद है कि तुर्क शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए गाँवों में होता था । तुर्की नाई, तुर्की कहार आदि लोग हिन्दू से मुसलमान हो गये थे । हिन्दू नाई तथा मुसलमान नाई में भेद जानने के लिए तुर्क शब्द लगा दिया जाता था । (२) शुष्कलेत्र : कल्हण उक्त तीनो तुरुष्क राजाओं में किसी विशेष को शुष्कलेत्रादि क्षेत्रों में मठ, चैत्य, तथा उसी के सदृश अन्य निर्माण बनाने का उल्लेख करता है । अपितु उनका नाम सम्मिलित लेता है कि उन राजाओं ने निर्माण कराया । वह ग्राम दुत्त परगना मे हुकालेतर अथवा हुकालेतरी है । श्री स्तीन के निर्देश पर सन् १८९१ में पं० काशीराम ने यहाँ की यात्रा की थी । परन्तु उन्हें यहाँ कोई प्राचीन ध्वंसावशेष नही मिला । यह स्थान श्रीनगर से लगभग १४ मिल दक्षिण पश्चिम है । दामोदर उद्र क्षेत्र के पश्चिम ओर किंचित् दक्षिण दिशा की ओर झुकता है । शुष्कलेत्र क्षेत्र के उत्तर में नागम, पूर्व में गुन्द, दक्षिण में पेत कूट, पश्चिम में सुन्दरा तथा लरबल है । स्थान के समीप छोटे छोटे नाले है । चैत्य : चैत्य अमरकोश कार के अनुसार यज्ञशाला तथा आयतन होता है । परन्तु पालि में यह भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है । इसका पालिरूप चेतोय है । 'चितायां भवः चैत्यः' अर्थ किया जाता है । चिता से इसे सम्बन्धित कर दिया गया है । ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन परम्परा के अनुसार दिवंगत के पवित्र भस्म वा चिता स्थान के ऊपर स्मृति भवन, समाधि, तथा वृक्षों को लगाया जाता था । यह प्रथा आज भी प्रचलित है । महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू तथा लाल- बहादुर शास्त्री के भस्मस्थान पर उद्यान बना दिये गये हैं । महात्मा गान्धी की समाधि तथा जवाहरलाल जी के चितास्थान में शान्ति वन दिल्ली में बन गया है । राजाओं के दिवंगत होने पर उनके राज्यों में छतरियाँ बना दी जाती है । रामायण, महाभारत एवं भगवद्गीता में यह शब्द पावन वेदी, देवस्थान, प्रासाद एवं धार्मिक वृक्ष आदि के लिये प्रयुक्त हुआ है । 'देवस्थानेषु चैत्येषु' (महा ३:१९०:६७) 'प्रासाद- गोपुरसभाश्चैत्य' (भाग ११।२७) 'कच्चि- च्चैत्यशतैर्जुष्टः' (महा० वन० : १२२९) चैत्य शब्द प्राचीन शब्द है । भगवान् बुद्ध के समय में भी चैत्य के चापाल चैत्यादि पर्याय थे । बौद्ध काल में अस्थि एवं चिता भस्मो पर चैत्य बनाने की परम्परा चल पड़ी थी । कालान्तर में चैत्य विशालकाय होकर स्तूपों का रूप ग्रहण कर लिये । श्रीलंका में इन्हें दागव जो सस्कृत शब्द धातुगर्भका अपभ्रंश है कहा जाता है । तिब्बती भाषा में डुंगनेन कहते हैं । बौद्ध स्थापत्य में चैत्य निर्माण की एक विशेष कला विकसित हुई थी । गिर्जाघर एवं चर्चों ने चैत्य शैली के उपासना गृहों की नकल की है । अजन्ता एलोरा एवं ईसा से पूर्व बने चैत्यों के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है । उपासना भवन में जहाँ चर्च की वेदी तथा ईसा मसीह की मूर्ति एवं क्रास होता है वही पर बौद्ध उपासना स्थल में चैत्य तथा वेदी होती है । प्रारम्भ में चैत्य रामायण, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों के अनुसार