राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २३३ प्राज्ये राज्यक्षणे तेषां प्रायः कश्मीरमण्डलम् । भोज्यमास्ते स्म बौद्धानां प्रव्रज्योर्जिततेजसाम् ॥ १७१ ॥ १७१. प्रव्रज्या ज्योति' से बौद्ध उन शक्तिशाली राजाओं के विस्तृत राज्यकाल में कश्मीर मण्डल का प्रायः उपभोग करते थे । काष्ठ के होते थे । कालान्तर मे वे पक्के पत्थर तथा ईंटा चूनों से बनने लगे । कनिष्क प्रसिद्ध बुद्धचरित्र के लेखक अश्वघोष का संरक्षक था । कनिष्क के समय में अश्वघोष का होना कहा जाता है। चीनी भाषामें बुद्ध चरित्र का अनुवाद सन् ४२० ई० में हुआ था । एक मत है कि बुद्ध घोष ने किसी युद्ध में पाया था । उसे निवास स्थान तथा अध्ययन अध्यापन एवं लेखन की पूर्ण सुविधा दी थी । बुद्ध चरित्र काशी से प्रकाशित हो चुका है। कुछ भाग संस्कृत तथा कुछ हिन्दी में हैं। पाठभेद : श्लोकसंख्या १७१ में 'कश्मीर' का 'काश्मीर' तथा 'स्म' का 'स' और 'च' पाठ भेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : (१) प्रव्रज्या : बौद्धों में दो वर्ग होते हैं। उपासक एवं भिक्षु । उपासक साधारण वेश भूषाधारी गृहस्थ होते हैं। प्रव्रज्या लेने वाला व्यक्ति गृह त्याग करता है। गृहस्थ धर्म त्याग करता है। सर दाढ़ी मुड़ाकर, संन्यासी बन चीवर धारण करता है । पिण्डपात, चीवर, शयनासन, ग्लान तथा प्रत्यय भिक्षुओं के चार निश्रय कहे जाते हैं। भिक्षा पात्र के अतिरिक्त उनके पास और कुछ नहीं होता । असंग्रही होते हैं । माला, गन्ध, विलेपन, अलंकार ऊँची शय्या, संगीत, सोना, चाँदी, आदि से विरत रहते हैं। भिक्षा मांग कर भोजन करते हैं। भिक्षा माँगने की भी एक शैली है। भिक्षु किसी गृहस्थ के द्वार पर चुपचाप जाकर खड़ा हो जायगा । कुछ मांगेगा नहीं, याचना नहीं करेगा । यदि गृहस्थ ने उसके पात्र में कुछ भोज्य पदार्थ डाल दिया तो ले लेता ३० है । अन्यथा वह लौट आता है । विहार में वृक्ष मूल, अथवा गुफा में आसन लगाता है । संघ शासन में भिक्षु शामिल रहता है । संघ उसे दण्ड दे सकता है । संघ से निकाल सकता है । भिक्षु त्रिरत्न किंवा तीन वचनों, बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मम् शरणम् गच्छामि, संघं शरणम् गच्छामि, कहकर तीनों की शरण लेता है । बुद्धधर्म में ब्रह्मचर्य पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वे अपने कठोर आचरण से लोगों को प्रभावित करते हैं। उनका नियंत्रित जीवन आकर्षक होता है। वे मध्याह्न के पूर्व केवल एक बार भोजन करते हैं। मध्याह्न के पश्चात् भोज्य सामग्री ग्रहण नहीं करते । केवल पेय पदार्थ लेते हैं। सनातन धर्मी संन्यासी दण्ड धारण करते हैं। गेरुआ वस्त्र पहनते हैं। परन्तु बौद्ध भिक्षु दण्डधारण नहीं करते । ऊपर से नीचे तक सुआच्छादित रहते हैं । परिव्राजक के पांच नाम होते हैं : (१) भिक्षु (२) परिव्राजक (३) कर्मन्दिन् (४) पाराशरिन् तथा (५) मस्करिन् । परिव्राजक और प्रव्रज्या के शाब्दिक अर्थ में भेद नहीं है। प्रव्रज्या का शाब्दिक अर्थ होता है । व्रज का अर्थ गमन होता है। प्र उपसर्ग विशेष लगाकर प्रव्रज्या शब्द बन जाता है । विशेषरूप से गृहत्याग करना यही साधारण अर्थ होता है । बीस वर्ष से कम आयु का व्यक्ति उपासक हो सकता है । श्रमणेर हो सकता है। उसे एक आचार्य किंवा उपाध्याय के निश्रय में रहना पड़ता था । बीस वर्ष से ऊपर होने पर ही वह भिक्षु हो सकता है। दस चीजें ग्रहण करने पर श्रमण होते हैं । दस भिक्षुओं के मध्य ही उपसम्पदा दी जा सकती है। भिक्षुओं को २२७ नियमों का