भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 321

२३४ राजतरंगिणी तदा भगवतः शाक्यसिंहस्य परिनिर्वृतेः । अस्मिन्महीलोकधातौ सार्धं वर्षशतं ह्यगात् ॥ १७२ ॥ १७२. उस समय भगवान् शाक्य सिंह¹ का इस महीलोक में परिनिर्वाण² हुए एक सौ पचास वर्ष व्यतीत हो चुके थे । पालन करना पड़ता है । पञ्चशील ग्रहण करने वाला कोई भी व्यक्ति भिक्षु हो सकता है । जीवित माता पिता की अनुमति बिना कोई भिक्षु नहीं हो सकता । बौद्धों को राजकीय आश्रय कश्मीर में मिला था । कनिष्क ने तृतीय संगीति कश्मीर में की थी । फाहियान तथा सुंगयुन के वर्णनों से प्रकट होता है । गांधार में बौद्ध भिक्षुओं को राजकीय प्रश्रय था । उनकी यात्रा के समय कश्मीर में सनातन धर्म का प्रभाव बढ़ गया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १७२ में 'तदा' का 'ततो'; 'परिनिर्वृतेः' का 'पुरनिवृते.' और 'परनिवृतेः'; तथा 'महीलोक' का 'सहलोक' 'सहीलोक' और 'शवलोक' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ( १ ) शाक्यसिंह : शाक्य भगवान् बुद्ध के वंश का नाम है। वह इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रियों की एक शाखा है । उस वंश में सिंह तुल्य अर्थात् श्रेष्ठ भगवान् बुद्ध हुए थे । अतएव उनका नाम शाक्यसिंह रख दिया गया था । वास्तव में उनका नाम 'सिद्धार्थ' था । भगवान् के जन्म स्थान के सम्बन्ध में अब कोई विवाद नहीं रह गया है । ईसा पूर्व ५६३ वर्ष में शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी अर्थात् रुमिनदेई में भगवान् का जन्म हुआ था । अशोक का स्तम्भ वहाँ पर गड़ा है । उसपर अंकित है—'हिय बुधे जाते ति' सुत्तनिपात में स्पष्ट उल्लेख आता है—'सो बोधिसत्तो' । भगवान् को शाक्य मुनि भी कहते हैं । कल्हण ने भगवान् का तत्कालीन प्रचलित मूल नाम दिया है । उसने बुद्ध तथा बौद्ध शब्द का प्रयोग भगवान् के प्रचलित बौद्ध धर्म के लिये सर्वत्र किया है । (२) परिनिर्वाण : कल्हण यहाँ कुशान राजाओं का काल भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण के १५० वर्ष पश्चात् देता है । यह अब तक के प्राप्त प्रमाणों के आधार पर ठीक नहीं बैठता । सिंहली परम्परा के अनुसार भगवान् बुद्ध का परिनिर्वाण ईसापूर्व ५४४ वर्ष में हुआ था । यही कारण है कि सन् १९५६ में विश्वव्यापी समारोह २५०० वर्ष पूर्ण होने पर परिनिर्वाण उत्सव मनाया गया था । राजा बिम्बसार तथा उनके पुत्र अजातशत्रु के भगवान् समकालीन थे । महाराज अशोक का भगवान् के परिनिर्वाण से २१८ वर्ष पश्चात् राज्याभिषेक हुआ था । यह सब काल प्रमाणतुला पर तोल कर प्रामाणिक माने गये हैं । यदि कल्हण की काल गणना मान ली जाय तो कुशान वंशीय राजाओं का काल ईसा पूर्व ४१६ वर्ष होता है । अशोक का राज्याभिषेक परिनिर्वाण के २१८ वर्ष पश्चात् हुआ था । इस प्रकार कुशान वंशीय राजाओं का काल अशोक के राज्याभिषेक से ६१ वर्ष पूर्व होता है । अर्थात् कुशान वंशीय राजाओं के पश्चात् अशोक का काल पड़ जाता है । हुएनसांग कनिष्क का शासन काल भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण के ४०० वर्ष पश्चात् रखता है । कल्हण स्वयं अशोक, जलोक, दामोदर तथा अन्य लुप्त राजाओं के पश्चात् कुशान वंशीय राजाओं का क्रम रखता है । कल्हण की काल गणना यहाँ प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । उसने तरका-