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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग २३५ बोधिसत्त्वश्च देशेऽस्मिन्नेको भूमीश्वरोऽभवत् । स च नागार्जुनः श्रीमान् षडर्हद्वनसंश्रयी ॥ १७३ ॥ १७३. इस देश में षडर्हद्वन¹ निवासी नागार्जुन² नामक भूमीश्वर हुआ। वह बोधि- सत्त्व भी था।

लीन किसी काल गणना के आधार पर यह समय नहीं दिया है। कुशान वंशीय राजाओं तथा कल्हण के काल में लगभग तेरह शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है। उसके समय तक भारत में बौद्धधर्म लुप्त हो चुका था। भारत में मुसलिम शासन दो शता- ब्दियों से कायम था। कश्मीर में स्वतः इतने राज- विप्लव, जलप्लावन, भूचाल आये थे कि कितनी ही इतिहास सामग्रियां नष्ट हो गयीं थी। यहाँ पर कल्हण कोई प्रमाण भी नहीं उपस्थित करता कि उसकी काल गणना का आधार क्या है? तर्क और प्रमाण की तुला पर कल्हण का यह समय ठीक नहीं उतरता।

कहा जाता है। हरवान में कनिष्क के समय में चतुर्थ बौद्ध परिषद हुई थी। खनन कार्य के पश्चात् इसे परिषद से और सम्बन्धित करने का प्रयास किया गया है। विहारों के निर्माण निमित्त यह स्थान प्रकृति की गोद में अत्यन्त सुहावना तथा उपयुक्त है। हरवान के ध्वंसावशेष स्थान से यदि उपत्यका की तरफ दृष्टिपात किया जाय तो हृदयग्राही सुन्दर दृश्य नेत्रों को अनायास सुखकर प्रतीत होता है।

हरवान के पृष्ठभाग में उत्तुङ्ग पर्वत है। दक्षिण दिशा में भी उत्तुङ्ग पर्वत है। सम्मुख पर्वत है। केवल वाम पार्श्व में ढुलता गया विस्तृत मैदान है। तीनों पार्श्वों में पर्वत द्वारा वेष्टित मध्य में खुली उपत्यका इतनी सुन्दर लगती है कि यहाँ चुपचाप बैठकर समय बिताते रहने में एक प्रकार के नैसर्गिक आनन्द का बोध होता है। सितम्बर माह की शालि से भरी पूरी उपत्यका केसरिया साड़ी पहने युवती कामिनी तुल्य लगती है। हरे-भरे पादप, पल्लवित वृक्षों का समूह, ग्राम का झुरमुट, पास बहती जल रेखा किसी प्राप्तयौवना के चीर पर बने बेल-बूटे जैसे लगते हैं।

पाठभेद : श्लोकसंख्या १७३ में 'न्नेको' का 'न्नेक', 'भूमीश्वरो' का 'भूम्येश्वरो', 'भवत्' का 'वसत्', 'च' का 'तु' और 'त', एवं 'र्हद्वन' का 'र्हन्धन; 'र्हर्वन' 'र्हत्वन' पाठभेद मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : १७३ (१) षडहर्द्वन : वर्तमान हरवान है। इसका शाब्दिक अर्थ ६ सन्तों का वन है। श्रीनगर की जल पूर्ति निमित्त सन् १८९५ में यहाँ निर्माण कार्य आरम्भ किया गया। उस समय यहाँ के ध्वंसावशेषों का पता चला। सन् १९२५ में पुनः यहाँ खनन कार्य हुआ है। जलाशात सुन्दर झील का रूप उपस्थित करता है। सीढ़ियों से जलाशात के बांध पर लगभग ४० फीट जाना पड़ता है। एक तरफ हरा ऊँचा पर्वत है। दूसरी तरफ ऊँची भूमि है तथा बाँध के नीचे सुन्दर बगीचा है। इसमे चिनार के पेड़ लगे हुए हैं। वनोत्सव तथा वन विहार के लिए आदर्श स्थान है।

मैं प्रकृति के इस अनुपम दृश्य को देखता मुग्ध खड़ा था। सम्मुख पर्वत पर खानाबदोशों के कुछ कैम्प लगे थे। यहाँ से बूज होम दिखाई पड़ता था। उस समय वहाँ पर खनन कार्य हो रहा था। शायद वहाँ कभी सिद्ध रहते थे। गुह्यक गण रहते थे। भीमगृह वासी रहते थे। वे वास्तव में कौन थे अभी अनुस- न्धान का विषय है। इस स्थान पर मैं तीन बार जा चुका हूँ। वहाँ से होकर मैं यहाँ आया था। जिस समय मैं पहुँचा था आकाश मेघाच्छन्न था। हरवान पर जहाँ पर विहार बना था उसके पीछे का