राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
'चीनांश्चैव तुषारांश्च' के प्रयोग से मालूम होता है कि कम्बोज तथा दरद की तरह चीन तथा तुषार देश परस्पर मिले थे । दोनों की सीमाएँ एक साथ मिलती थी अन्यथा युगल प्रयोग न किया गया होता । मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' एक साथ उल्लेख किया गया है । वायु पुराण में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' का उल्लेख है । मार्कण्डेय पुराण में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' का उल्लेख है । वामन पुराण में 'वेरणा- श्चैव तुषारांश्च' शब्द का उल्लेख किया गया है । धरवो ने तुखारिस्तान का वर्णन किया है । उसमे बलख सम्मिलित हो जाता है । वक्षु अर्थात् आमू दरया के मध्यवर्ती दोनों तटवर्ती अंचलों को लेता चला जाता है । यद्यपि आमू दरया के दक्षिण का अंचल तुषार देश में आता है । वर्तमान तुर्किस्तान तुषार अर्थात् तुर्कों का अंचल कहा जा सकता है । पुराणों में उल्लेख मिलता है : सान्ध्रांस्तुपारान् लम्पाकान् पह्लवान् पारदान् शकान् । एतान् जनपदांश्चक्षु : प्लावयन्ति गतोदधिम् ॥ वायु पुराण में 'सान्ध्रांस्तुपारांस्तम्पाकान् तथा 'सान्ध्रांस्तुपारास्तम्बवान्' आया है । मार्कण्डेय पुराण में 'तुपारान् वर्वराकारान्' तथा 'तुषारान् वर्वराकारान्' का प्रयोग किया गया है। ब्रह्माण्ड पुराण में 'सान्ध्रांस्तुपारान् लम्पाकान्' का उल्लेख मिलता है । तुखार तथा तुषार शब्द एक ही है । जाति के लिए तोखरी अथवा तोखरो शब्द का प्रयोग किया गया है। विष्णु पुराण ( ४:२४:५३ ) में तुरुष्क शब्द का उल्लेख करते हुए 'तुरुष्कारा मुण्डारश्च' कहा गया है। इस प्रकार तुखार, तुषार, तोखरी, तुरुष्क, तुर्क सब एक ही जाति के नाम हैं। केवल उच्चारण के भेद प्रकट करते हैं । महाभारत में तुषार क्या तुखार दोनों ही शब्दों का प्रयोग किया गया है । तुषारवासियों को म्लेच्छ भी कहा गया है । (सभा पर्व ५०:१८५०) युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में वहाँ के निवासी आये थे तथा रसोई परोसने का कार्य करते दिखाई देते हैं । वन पर्व ( ५१:२५-२६, ५१:१९९१, १७७:२१. ) में उल्लेख मिलता है । पाण्डव लोग गन्धमादन से द्वैत वन की ओर लौटते समय तुषार देश को पार कर राजा सुबाहु के नगर में पहुँचे थे । भीष्म पर्व ( ७५.२१ ) में तुषारों के युद्ध में भाग लेने का वर्णन मिलता है । तुषार जनपद के घोर गण भीष्म द्वारा निर्मित क्रौंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व स्थान में व्यूह की रक्षा कर रहे थे । शान्ति पर्व ( ६५.२४२९ ) तुषारवासियों के निवास के विषय में कहा गया है । तुषारवासी म्लेच्छ मान्धाता के राज्य में निवास करते थे । मान्धाता के विषय में पुराणों में कहा गया है कि इक्ष्वाकुवंश की १८वीं पीढ़ी में हुए थे। वे अपने पिता युवनाश्व की कुक्षि से उत्पन्न हुए थे । पुरुकुत्स, अम्बरीष तथा मुचुकुन्द उनके पुत्र थे । मान्धाता चक्रवर्ती राजा थे । सात द्वीपों में उनका राज्य था । उनके राज्य विस्तार के विषय में कहा गया है । यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति । सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ( ब्रह्माण्ड पुराण ३.६३:६८-७२ ) हरिवंश पुराण उनका शक, पह्लव, दरद, अन्य म्लेच्छ तथा दस्यु जातियों के साथ उल्लेख करता है । स्ट्रेबो ( ९:५१५ ) कहता है कि ग्रीक अर्थात् यूनानियों के बलख से निकालने का श्रेय तोपरो जाति को भी है । यह स्थान तुर्किस्तान प्रतीत होता है । तोखरी जाति का स्थान हिन्दूकुश पर्वत के उत्तर बताया गया है। वह तोखरो जाति का उल्लेख करता है जो वास्तव में तुषार अर्थात् तुर्किस्तान के तुर्क हैं। मार्कण्डेय पुराण ( ५७:३९ ) में तुपारो
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का वर्णन है । उनका उल्लेख काम्बोज, दरद, वर्वर तथा चीनों के साथ आया है । १५वीं शताब्दी तक संस्कृत लेखों में तुर्कों के लिए तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया गया है । मेवाड़ के राजा मोकल का विक्रम संवत् १४८५ के चितोड गढ के लेख में उल्लेख है कि राजा ने अंग, कामरूप, वंग, निषाद, चीन तथा तुरुष्को पर विजय प्राप्त किया था । यह कवि का गौरव वर्णन है । ऐतिहासिक तथ्य नही है । इसका महत्व केवल इसलिए है कि उस समय भारत में रहने वाले मुसलमानो के लिए तुरुष्क शब्द का प्रयोग होता था । अपनी बाल्यावस्था की बातें मुझे याद है कि तुर्क शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए गाँवों में होता था । तुर्की नाई, तुर्की कहार आदि लोग हिन्दू से मुसलमान हो गये थे । हिन्दू नाई तथा मुसलमान नाई में भेद जानने के लिए तुर्क शब्द लगा दिया जाता था । (२) शुष्कलेत्र : कल्हण उक्त तीनो तुरुष्क राजाओं में किसी विशेष को शुष्कलेत्रादि क्षेत्रों में मठ, चैत्य, तथा उसी के सदृश अन्य निर्माण बनाने का उल्लेख करता है । अपितु उनका नाम सम्मिलित लेता है कि उन राजाओं ने निर्माण कराया । वह ग्राम दुत्त परगना मे हुकालेतर अथवा हुकालेतरी है । श्री स्तीन के निर्देश पर सन् १८९१ में पं० काशीराम ने यहाँ की यात्रा की थी । परन्तु उन्हें यहाँ कोई प्राचीन ध्वंसावशेष नही मिला । यह स्थान श्रीनगर से लगभग १४ मिल दक्षिण पश्चिम है । दामोदर उद्र क्षेत्र के पश्चिम ओर किंचित् दक्षिण दिशा की ओर झुकता है । शुष्कलेत्र क्षेत्र के उत्तर में नागम, पूर्व में गुन्द, दक्षिण में पेत कूट, पश्चिम में सुन्दरा तथा लरबल है । स्थान के समीप छोटे छोटे नाले है । चैत्य : चैत्य अमरकोश कार के अनुसार यज्ञशाला तथा आयतन होता है । परन्तु पालि में यह भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है । इसका पालिरूप चेतोय है । 'चितायां भवः चैत्यः' अर्थ किया जाता है । चिता से इसे सम्बन्धित कर दिया गया है । ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन परम्परा के अनुसार दिवंगत के पवित्र भस्म वा चिता स्थान के ऊपर स्मृति भवन, समाधि, तथा वृक्षों को लगाया जाता था । यह प्रथा आज भी प्रचलित है । महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू तथा लाल- बहादुर शास्त्री के भस्मस्थान पर उद्यान बना दिये गये हैं । महात्मा गान्धी की समाधि तथा जवाहरलाल जी के चितास्थान में शान्ति वन दिल्ली में बन गया है । राजाओं के दिवंगत होने पर उनके राज्यों में छतरियाँ बना दी जाती है । रामायण, महाभारत एवं भगवद्गीता में यह शब्द पावन वेदी, देवस्थान, प्रासाद एवं धार्मिक वृक्ष आदि के लिये प्रयुक्त हुआ है । 'देवस्थानेषु चैत्येषु' (महा ३:१९०:६७) 'प्रासाद- गोपुरसभाश्चैत्य' (भाग ११।२७) 'कच्चि- च्चैत्यशतैर्जुष्टः' (महा० वन० : १२२९) चैत्य शब्द प्राचीन शब्द है । भगवान् बुद्ध के समय में भी चैत्य के चापाल चैत्यादि पर्याय थे । बौद्ध काल में अस्थि एवं चिता भस्मो पर चैत्य बनाने की परम्परा चल पड़ी थी । कालान्तर में चैत्य विशालकाय होकर स्तूपों का रूप ग्रहण कर लिये । श्रीलंका में इन्हें दागव जो सस्कृत शब्द धातुगर्भका अपभ्रंश है कहा जाता है । तिब्बती भाषा में डुंगनेन कहते हैं । बौद्ध स्थापत्य में चैत्य निर्माण की एक विशेष कला विकसित हुई थी । गिर्जाघर एवं चर्चों ने चैत्य शैली के उपासना गृहों की नकल की है । अजन्ता एलोरा एवं ईसा से पूर्व बने चैत्यों के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है । उपासना भवन में जहाँ चर्च की वेदी तथा ईसा मसीह की मूर्ति एवं क्रास होता है वही पर बौद्ध उपासना स्थल में चैत्य तथा वेदी होती है । प्रारम्भ में चैत्य रामायण, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों के अनुसार
प्रथम तरंग २३३ प्राज्ये राज्यक्षणे तेषां प्रायः कश्मीरमण्डलम् । भोज्यमास्ते स्म बौद्धानां प्रव्रज्योर्जिततेजसाम् ॥ १७१ ॥ १७१. प्रव्रज्या ज्योति' से बौद्ध उन शक्तिशाली राजाओं के विस्तृत राज्यकाल में कश्मीर मण्डल का प्रायः उपभोग करते थे । काष्ठ के होते थे । कालान्तर मे वे पक्के पत्थर तथा ईंटा चूनों से बनने लगे । कनिष्क प्रसिद्ध बुद्धचरित्र के लेखक अश्वघोष का संरक्षक था । कनिष्क के समय में अश्वघोष का होना कहा जाता है। चीनी भाषामें बुद्ध चरित्र का अनुवाद सन् ४२० ई० में हुआ था । एक मत है कि बुद्ध घोष ने किसी युद्ध में पाया था । उसे निवास स्थान तथा अध्ययन अध्यापन एवं लेखन की पूर्ण सुविधा दी थी । बुद्ध चरित्र काशी से प्रकाशित हो चुका है। कुछ भाग संस्कृत तथा कुछ हिन्दी में हैं। पाठभेद : श्लोकसंख्या १७१ में 'कश्मीर' का 'काश्मीर' तथा 'स्म' का 'स' और 'च' पाठ भेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : (१) प्रव्रज्या : बौद्धों में दो वर्ग होते हैं। उपासक एवं भिक्षु । उपासक साधारण वेश भूषाधारी गृहस्थ होते हैं। प्रव्रज्या लेने वाला व्यक्ति गृह त्याग करता है। गृहस्थ धर्म त्याग करता है। सर दाढ़ी मुड़ाकर, संन्यासी बन चीवर धारण करता है । पिण्डपात, चीवर, शयनासन, ग्लान तथा प्रत्यय भिक्षुओं के चार निश्रय कहे जाते हैं। भिक्षा पात्र के अतिरिक्त उनके पास और कुछ नहीं होता । असंग्रही होते हैं । माला, गन्ध, विलेपन, अलंकार ऊँची शय्या, संगीत, सोना, चाँदी, आदि से विरत रहते हैं। भिक्षा मांग कर भोजन करते हैं। भिक्षा माँगने की भी एक शैली है। भिक्षु किसी गृहस्थ के द्वार पर चुपचाप जाकर खड़ा हो जायगा । कुछ मांगेगा नहीं, याचना नहीं करेगा । यदि गृहस्थ ने उसके पात्र में कुछ भोज्य पदार्थ डाल दिया तो ले लेता ३० है । अन्यथा वह लौट आता है । विहार में वृक्ष मूल, अथवा गुफा में आसन लगाता है । संघ शासन में भिक्षु शामिल रहता है । संघ उसे दण्ड दे सकता है । संघ से निकाल सकता है । भिक्षु त्रिरत्न किंवा तीन वचनों, बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मम् शरणम् गच्छामि, संघं शरणम् गच्छामि, कहकर तीनों की शरण लेता है । बुद्धधर्म में ब्रह्मचर्य पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वे अपने कठोर आचरण से लोगों को प्रभावित करते हैं। उनका नियंत्रित जीवन आकर्षक होता है। वे मध्याह्न के पूर्व केवल एक बार भोजन करते हैं। मध्याह्न के पश्चात् भोज्य सामग्री ग्रहण नहीं करते । केवल पेय पदार्थ लेते हैं। सनातन धर्मी संन्यासी दण्ड धारण करते हैं। गेरुआ वस्त्र पहनते हैं। परन्तु बौद्ध भिक्षु दण्डधारण नहीं करते । ऊपर से नीचे तक सुआच्छादित रहते हैं । परिव्राजक के पांच नाम होते हैं : (१) भिक्षु (२) परिव्राजक (३) कर्मन्दिन् (४) पाराशरिन् तथा (५) मस्करिन् । परिव्राजक और प्रव्रज्या के शाब्दिक अर्थ में भेद नहीं है। प्रव्रज्या का शाब्दिक अर्थ होता है । व्रज का अर्थ गमन होता है। प्र उपसर्ग विशेष लगाकर प्रव्रज्या शब्द बन जाता है । विशेषरूप से गृहत्याग करना यही साधारण अर्थ होता है । बीस वर्ष से कम आयु का व्यक्ति उपासक हो सकता है । श्रमणेर हो सकता है। उसे एक आचार्य किंवा उपाध्याय के निश्रय में रहना पड़ता था । बीस वर्ष से ऊपर होने पर ही वह भिक्षु हो सकता है। दस चीजें ग्रहण करने पर श्रमण होते हैं । दस भिक्षुओं के मध्य ही उपसम्पदा दी जा सकती है। भिक्षुओं को २२७ नियमों का
२३४ राजतरंगिणी तदा भगवतः शाक्यसिंहस्य परिनिर्वृतेः । अस्मिन्महीलोकधातौ सार्धं वर्षशतं ह्यगात् ॥ १७२ ॥ १७२. उस समय भगवान् शाक्य सिंह¹ का इस महीलोक में परिनिर्वाण² हुए एक सौ पचास वर्ष व्यतीत हो चुके थे । पालन करना पड़ता है । पञ्चशील ग्रहण करने वाला कोई भी व्यक्ति भिक्षु हो सकता है । जीवित माता पिता की अनुमति बिना कोई भिक्षु नहीं हो सकता । बौद्धों को राजकीय आश्रय कश्मीर में मिला था । कनिष्क ने तृतीय संगीति कश्मीर में की थी । फाहियान तथा सुंगयुन के वर्णनों से प्रकट होता है । गांधार में बौद्ध भिक्षुओं को राजकीय प्रश्रय था । उनकी यात्रा के समय कश्मीर में सनातन धर्म का प्रभाव बढ़ गया था । पाठभेद : श्लोक संख्या १७२ में 'तदा' का 'ततो'; 'परिनिर्वृतेः' का 'पुरनिवृते.' और 'परनिवृतेः'; तथा 'महीलोक' का 'सहलोक' 'सहीलोक' और 'शवलोक' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ( १ ) शाक्यसिंह : शाक्य भगवान् बुद्ध के वंश का नाम है। वह इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रियों की एक शाखा है । उस वंश में सिंह तुल्य अर्थात् श्रेष्ठ भगवान् बुद्ध हुए थे । अतएव उनका नाम शाक्यसिंह रख दिया गया था । वास्तव में उनका नाम 'सिद्धार्थ' था । भगवान् के जन्म स्थान के सम्बन्ध में अब कोई विवाद नहीं रह गया है । ईसा पूर्व ५६३ वर्ष में शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी अर्थात् रुमिनदेई में भगवान् का जन्म हुआ था । अशोक का स्तम्भ वहाँ पर गड़ा है । उसपर अंकित है—'हिय बुधे जाते ति' सुत्तनिपात में स्पष्ट उल्लेख आता है—'सो बोधिसत्तो' । भगवान् को शाक्य मुनि भी कहते हैं । कल्हण ने भगवान् का तत्कालीन प्रचलित मूल नाम दिया है । उसने बुद्ध तथा बौद्ध शब्द का प्रयोग भगवान् के प्रचलित बौद्ध धर्म के लिये सर्वत्र किया है । (२) परिनिर्वाण : कल्हण यहाँ कुशान राजाओं का काल भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण के १५० वर्ष पश्चात् देता है । यह अब तक के प्राप्त प्रमाणों के आधार पर ठीक नहीं बैठता । सिंहली परम्परा के अनुसार भगवान् बुद्ध का परिनिर्वाण ईसापूर्व ५४४ वर्ष में हुआ था । यही कारण है कि सन् १९५६ में विश्वव्यापी समारोह २५०० वर्ष पूर्ण होने पर परिनिर्वाण उत्सव मनाया गया था । राजा बिम्बसार तथा उनके पुत्र अजातशत्रु के भगवान् समकालीन थे । महाराज अशोक का भगवान् के परिनिर्वाण से २१८ वर्ष पश्चात् राज्याभिषेक हुआ था । यह सब काल प्रमाणतुला पर तोल कर प्रामाणिक माने गये हैं । यदि कल्हण की काल गणना मान ली जाय तो कुशान वंशीय राजाओं का काल ईसा पूर्व ४१६ वर्ष होता है । अशोक का राज्याभिषेक परिनिर्वाण के २१८ वर्ष पश्चात् हुआ था । इस प्रकार कुशान वंशीय राजाओं का काल अशोक के राज्याभिषेक से ६१ वर्ष पूर्व होता है । अर्थात् कुशान वंशीय राजाओं के पश्चात् अशोक का काल पड़ जाता है । हुएनसांग कनिष्क का शासन काल भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण के ४०० वर्ष पश्चात् रखता है । कल्हण स्वयं अशोक, जलोक, दामोदर तथा अन्य लुप्त राजाओं के पश्चात् कुशान वंशीय राजाओं का क्रम रखता है । कल्हण की काल गणना यहाँ प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । उसने तरका-
प्रथम तरंग २३५ बोधिसत्त्वश्च देशेऽस्मिन्नेको भूमीश्वरोऽभवत् । स च नागार्जुनः श्रीमान् षडर्हद्वनसंश्रयी ॥ १७३ ॥ १७३. इस देश में षडर्हद्वन¹ निवासी नागार्जुन² नामक भूमीश्वर हुआ। वह बोधि- सत्त्व भी था।
लीन किसी काल गणना के आधार पर यह समय नहीं दिया है। कुशान वंशीय राजाओं तथा कल्हण के काल में लगभग तेरह शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है। उसके समय तक भारत में बौद्धधर्म लुप्त हो चुका था। भारत में मुसलिम शासन दो शता- ब्दियों से कायम था। कश्मीर में स्वतः इतने राज- विप्लव, जलप्लावन, भूचाल आये थे कि कितनी ही इतिहास सामग्रियां नष्ट हो गयीं थी। यहाँ पर कल्हण कोई प्रमाण भी नहीं उपस्थित करता कि उसकी काल गणना का आधार क्या है? तर्क और प्रमाण की तुला पर कल्हण का यह समय ठीक नहीं उतरता।
कहा जाता है। हरवान में कनिष्क के समय में चतुर्थ बौद्ध परिषद हुई थी। खनन कार्य के पश्चात् इसे परिषद से और सम्बन्धित करने का प्रयास किया गया है। विहारों के निर्माण निमित्त यह स्थान प्रकृति की गोद में अत्यन्त सुहावना तथा उपयुक्त है। हरवान के ध्वंसावशेष स्थान से यदि उपत्यका की तरफ दृष्टिपात किया जाय तो हृदयग्राही सुन्दर दृश्य नेत्रों को अनायास सुखकर प्रतीत होता है।
हरवान के पृष्ठभाग में उत्तुङ्ग पर्वत है। दक्षिण दिशा में भी उत्तुङ्ग पर्वत है। सम्मुख पर्वत है। केवल वाम पार्श्व में ढुलता गया विस्तृत मैदान है। तीनों पार्श्वों में पर्वत द्वारा वेष्टित मध्य में खुली उपत्यका इतनी सुन्दर लगती है कि यहाँ चुपचाप बैठकर समय बिताते रहने में एक प्रकार के नैसर्गिक आनन्द का बोध होता है। सितम्बर माह की शालि से भरी पूरी उपत्यका केसरिया साड़ी पहने युवती कामिनी तुल्य लगती है। हरे-भरे पादप, पल्लवित वृक्षों का समूह, ग्राम का झुरमुट, पास बहती जल रेखा किसी प्राप्तयौवना के चीर पर बने बेल-बूटे जैसे लगते हैं।
पाठभेद : श्लोकसंख्या १७३ में 'न्नेको' का 'न्नेक', 'भूमीश्वरो' का 'भूम्येश्वरो', 'भवत्' का 'वसत्', 'च' का 'तु' और 'त', एवं 'र्हद्वन' का 'र्हन्धन; 'र्हर्वन' 'र्हत्वन' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : १७३ (१) षडहर्द्वन : वर्तमान हरवान है। इसका शाब्दिक अर्थ ६ सन्तों का वन है। श्रीनगर की जल पूर्ति निमित्त सन् १८९५ में यहाँ निर्माण कार्य आरम्भ किया गया। उस समय यहाँ के ध्वंसावशेषों का पता चला। सन् १९२५ में पुनः यहाँ खनन कार्य हुआ है। जलाशात सुन्दर झील का रूप उपस्थित करता है। सीढ़ियों से जलाशात के बांध पर लगभग ४० फीट जाना पड़ता है। एक तरफ हरा ऊँचा पर्वत है। दूसरी तरफ ऊँची भूमि है तथा बाँध के नीचे सुन्दर बगीचा है। इसमे चिनार के पेड़ लगे हुए हैं। वनोत्सव तथा वन विहार के लिए आदर्श स्थान है।
मैं प्रकृति के इस अनुपम दृश्य को देखता मुग्ध खड़ा था। सम्मुख पर्वत पर खानाबदोशों के कुछ कैम्प लगे थे। यहाँ से बूज होम दिखाई पड़ता था। उस समय वहाँ पर खनन कार्य हो रहा था। शायद वहाँ कभी सिद्ध रहते थे। गुह्यक गण रहते थे। भीमगृह वासी रहते थे। वे वास्तव में कौन थे अभी अनुस- न्धान का विषय है। इस स्थान पर मैं तीन बार जा चुका हूँ। वहाँ से होकर मैं यहाँ आया था। जिस समय मैं पहुँचा था आकाश मेघाच्छन्न था। हरवान पर जहाँ पर विहार बना था उसके पीछे का
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शीर्षक: २३६ | राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ] पहाड़ सूखा है। मेघ उसपर जमे थे। उनका शनैः शनैः इधर-उधर जाना, वाम पार्श्व में वर्षा जल द्वारा प्रवाहित कल-कल ध्वनि करता नाला, ग्रामों के शान्त गृहों से उठती धूम राशि, पडते फुहार में किंचित् खड़े होकर उपत्यका को चुपचाप निरखते रहने मे मुझे एक विचित्र आनन्द का बोध हो रहा था। यह दृश्य और यह स्थान मुझे इतना प्रिय लग रहा था मानों मैं स्वयं इस दृश्य का एक अंग बन गया था। इस समय हरवान का रूप बदल गया है। स्टीन के समय हरवान जो रूप उपस्थित करता रहा होगा वह अब नही है। शालीमार के दक्षिण पार्श्व से पक्की पिच की सड़क हरवान ग्राम होती आगे निकल जाती है। सड़क के समीप स्वच्छ जल पूर्ण नाला है। यहाँ पर तीन नाले हैं। दची ग्राम नाला, तेल बल नाला तथा शराब कुल। शराब कुल स्वच्छ जल की प्रणाली है। विहार की पहाड़ी के आधे भाग में बहती है। पूछने पर प्रकट हुआ। यह जल राज् के शराब बनाने के कारखाने की तरफ जाता है। अतएव इसका नाम शराब कुल पड़ा है। इस समय कार- खाना बन्द है। हरवान पहाड़ की उतार किंवा ढाल पर है। ढाल पर स्थान इतना समतल बनाया जा सकता है कि पर्वतीय शैली पर बहुत मकान बन सकते हैं। एक छोटा चौरस मैदान किंवा भूमि है। उसमें तीन चौकोर प्रांगण बने हैं। मध्यवर्तींय प्रांगण में चौकोर स्तूपाकार स्थान बना है। उसके दक्षिण पार्श्व में चौकोर प्रांगण के निर्मित पूर्वकालीन दिवालोँ के कुछ ध्वंसावशेष के आकार शेष रह गये हैं। मध्यवर्ती प्रांगण के समीप भी एक लम्बी दिवाल का भग्नावशेष रह गया है। प्रांगणो के ऊपर दिवालोँ का अवशेष बच गया है। दिवालें विचित्र रूप उप- स्थित करती हैं। निर्माणकर्त्ताओं तथा राजगीरो की कला पर प्रकाश डालती हैं। दिवालो की रचना पर यहाँ पर दो शब्द लिख देना उचित होगा। पत्थर के ढोकों की दिवाल खड़ी की गई है। उनके बाहर बड़ी सुन्दरता से छोटे शिव लिंगों की
[दायाँ स्तम्भ] तरह नदियों से प्राप्त पत्थरों को पलस्तर के स्थान पर लगाया गया है। स्थान स्थान पर सुन्दरता और बढ़ाने के लिये बीच बीच मे पत्थर के ढोके रख अतीव मनोरम रचना की गयी हैं। वे देखने मे अत्यन्त सुन्दर लगती है। आधुनिक कला की याद दिलाती हैं। इस प्रकार की दिवाल रचना में कितना श्रम लगा होगा उन्हें देख करके ही अनुमान लगाया जा सकता है। यहाँ पर पुराने बर्तनों के टुकड़े तथा खपड़े बहुत निकले हैं। प्राप्त टाइल्स मे फूल-पत्ती तथा मानव आकार बने हैं। तत्कालीन पुरुषों तथा स्त्रियों की वेशभूषा तथा उनका चेहरा-मोहरा कैसा था। स्पष्ट मालूम होता हैं। मैने उन आकृतियों को ध्यानपूर्वक देखा। आर्यों की मुखाकृति जैसी है। मुख-रेखाएँ उनके हृष्ट पुष्ट, स्वस्थ तथा बलवान रूप को प्रकट करती है। उनका कद ऊँचा है। पाद की पेण्डली मांस पेशी पुष्ट सम तथा आकर्षक हैं। नारियो का रूप उनका आकार अत्यन्त हृदयग्राही है। नासिका लम्बी आर्य जातीय सीधी है। रोमन नासिका की तरह उनमें मोड़ नहीं हैं। बाल उभड़े गण्डस्थल पर अद्भुत शोभा बढ़ाते हैं। कानों में गोलाकार बाला है। आज भी कश्मीर की स्त्रियाँ गुच्छे का बाला पहनती हैं। मुसलमान स्त्रियाँ चाँदियों के बाले गुच्छों में कानो से लटकाती हैं। बाली किंवा बाले पहनने की प्रथा कश्मीरी अंगनाओं से शीघ्रतापूर्वक लोप हो रही हैं। उनके स्थान पर तंग पहनने की प्रथा फैल चुकी हैं। टाइल्स पर बने आकार नर-नारियों के हैं। शरीर पर अलंकारो की बहुलता नही हैं। रोचक अलंकार हैं। वे शरीर की सुन्दरता बढ़ाते हैं। उसे भंड़िहर नहीं बनाते। इससे प्रकट होता है कि समाज उस समय कितना सुसंस्कृत तथा सभ्य था। पुरुष ढीला- ढाला वस्त्र पहने दिखाये गये हैं। वर्मधारी, अश्वा- रोही, धनुष-वाण धारी तथा वीर पट्ट पहने पुरुषों की आकृतियाँ मिली हैं। युवतियाँ मृदंग अथवा
प्रथम तरंग २३७ ढोल बजाती तथा नर्तकियां नृत्यमुद्रा में खपड़ों तथा टाइल्स पर मिली हैं। हाथो का उल्लेख काश्मीरी साहित्य में मिलता है। हरवान के टाइल्स पर हाथो की मूर्ति खुदी मिली है। हस्तिशाला का उल्लेख भी (रा० त० ७: ७७२-७७६ में) कल्हण करता है। हरवान में स्तूप मन्दिर, ईंटा, टाइल्स छत्रावली के अतिरिक्त 'ये धर्मा हेतुप्रभवा' ब्राह्मी लिपि में मिला है। एक काकासन में बैठे साधू की आकृति भी मिली है। खरोष्ट्री लिपि का भी यहाँ दर्शन मिला है। कुछ ऊपर एक हाल है। हाल के पीछे एक वृत्ताकार हाल और है। इसे देखकर मुझे गौहाटी स्थित कामाक्षा देवी के मन्दिर का स्मरण आ गया। यदि इस हाल का प्रत्यास्थापन किया जाय तो कामरूप कामाक्षा के मन्दिर तुल्य पृष्ठ भाग में गर्भगृह तुल्य गोलाकार तथा मंडप आयताकार होगा। कामाक्षा देवी में मण्डप से गर्भ गृह में जाने के लिए द्वार बना है। परन्तु यहाँ आयताकार मण्डप से पृष्ठभागीय वृत्ताकार गर्भ गृह में जाने के लिए किसी द्वार किंवा मार्ग का चिन्ह मैने नहीं देखा। यह वृत्ताकार स्थान चैत्य हो सकता है। स्तूप होने का भी अनुमान लगाया जा सकता है। अजन्ता तथा एलोरा की गुफाओं में चैत्य के सम्मुख आयताकार मण्डप भिक्षुओं के बैठने तथा पूजा करने के लिए बना है। सम्भव है कि उसी स्थापत्य तुल्य यहाँ का निर्माण रहा हो। हरवान पिण्डपात किंवा भिक्षुओं के भिक्षा प्राप्त करने की दृष्टि से आदर्श स्थान माना जा सकता है। जल का सुपास है। जल दूर से लाने की यहाँ समस्या नहीं थी। निर्झर के कभी सूखने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बादाम, अखरोट तथा फलों के वृक्ष तथा उनके उद्यान यहाँ मुझे अधिकता से मिले। उपत्यका में शालि खूब उत्पन्न होती है। हरवान जिस समय अपनी गौरव गरिमा पर रहा होगा, उस समय यहाँ फल-फूल के वृक्ष खूब लगाये गये होंगे। खेतों में नाना प्रकार की सब्जी तथा अन्न उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता रहा होगा। पिण्डपात निमित्त स्थानीय जनता से भात, तरकारी तथा फलादि मिल जाना सरल था। इस समय चिनार के वृक्ष भी लगे हैं। मालूम नहीं उन दिनों यहाँ चिनार थे कि नहीं। कुछ लोगों का मत है कि चिनार के वृक्ष ईरान से हाँकर लगाये गये हैं। इस विवाद में न पड़कर मैं यही कहना चाहता हूँ कि अध्यात्म ज्ञान चर्चा एवं तपस्या निमित्त हरवान का स्थान शान्त तथा आदर्श कहा जायेगा। इस समय हरवान ग्राम का रूप बहुत कुछ बदल गया है। भौतिक दृष्टि से यह एक समृद्धिशाली ग्राम है। यहाँ अस्पताल, स्कूल, ट्राउट फार्मिंग सेण्टर, श्रीनगर वाटर वर्क्स तथा ध्वंसावशेषों के कारण प्रसिद्ध स्थान हो गया है। (२) नागार्जुन : उरुष्क राजाओ किंवा कुशान राजाओ का समकालीन नागार्जुन नही था। कल्हण के वर्णन से भ्रम उत्पन्न हो सकता है। चीनी ग्रन्थों में जो सामग्री इनके जीवन के सम्बन्ध में प्राप्त होती है उससे पता चलता है वह आन्ध्रभृत्यकुलीय शालिवाहन राजा श्री गौतमी पुत्र का समकालीन था। उसका काल सन् १६६-१९६ ई० तक था। कश्मीर में कल्हण वर्णित हुविष्क का काल सन् १०६ ई० आता है। कुछ मत है कि यह शालिवाहन राजा गौतमी पुत्र यज्ञश्री नहीं है परन्तु अब अनेक विद्वान् इसी को मानते है। नागार्जुन ने इस राजा के पास जो पत्र लिखे थे उनका अनुवाद तिब्बती तथा चीनी भाषा में उपलब्ध है। राजा यज्ञश्री नागार्जुन का सम- सामयिक माना जाता है। इस पत्र का नाम 'आर्य नागार्जुन वोधिसत्त्व सुहल्लेख' है। 'आर्य नागार्जुन वोधिसत्त्व' यह उल्लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। कल्हण ने इस श्लोक में उसे बोधि- सत्त्व कहा है। कल्हण के समय में नागार्जुन प्रख्यात था। वह बोधिसत्त्व माना जाता था। उसे कश्मीर मण्डल का भूमीश्वर भी कहा गया है। नागार्जुन नाम
२३६ राजतरंगिणी
पहाड़ भूला है। मेघ उसपर जमे थे। उनका शनैः शनैः इधर-उधर जाना, वाम पार्श्व में वर्षा जल द्वारा प्रवाहित कल-कल ध्वनि करता नाला, ग्रामों के शान्त गृहों से उठती धूम राशि, पडते फुहार में किंचित् खडे होकर उपत्यका को चुपचाप निरखते रहने में मुझे एक विचित्र आनन्द का बोध हो रहा था। यह दृश्य और यह स्थान मुझे इतना प्रिय लग रहा था मानो मैं स्वयं इस दृश्य का एक अंग बन गया था। इस समय हरवान का रूप बदल गया है। स्तीन के समय हरवान जो रूप उपस्थित करता रहा होगा वह अब नहीं है। शालीमार के दक्षिण पार्श्व से पक्की पिच की सडक हरवान ग्राम होती आगे निकल जाती है। सडक के समीप स्वच्छ जल पूर्ण नाला है। यहाँ पर तीन नाले हैं। दची ग्राम नाला, तेल बल नाला तथा शराब कुल। शराब कुल स्वच्छ जल की प्रणाली है। विहार की पहाडी के आधे भाग में बहती है। पूछने पर प्रकट हुआ। यह जल राज. के शराब बनाने के कारखाने की तरफ जाता है। अतएव इसका नाम शराब कुल पड़ा है। इस समय कार- खाना बन्द हैं। हरवान पहाड की उतार किंवा ढाल पर है। ढाल पर स्थान इतना समतल बनाया जा सकता है कि पर्वतीय शैली पर बहुत मकान बन सकते हैं। एक छोटा चौरस मैदान किंवा भूमि है। उसमे तीन चौकोर प्रांगण बने हैं। मध्यवर्तीय प्रांगण में चौकोर स्तूपाकार स्थान बना है। उसके दक्षिण पार्श्व में चौकोर प्रांगण के निर्मित पूर्वकालीन दिवालों के कुछ ध्वंसावशेष के आकार दोष रह गये हैं। मध्यवर्ती प्रांगण के समीप भी एक लम्बी दिवाल का भग्नावशेष रह गया है। प्रांगणो के ऊपर दिवालों का अवशेष बच गया है। दिवालें विचित्र रूप उप- स्थित करती हैं। निर्माणकर्त्ताओ तथा राजगीरो की कला पर प्रकाश डालती हैं। दिवालों की रचना पर यहाँ पर दो शब्द लिख देना उचित होगा। पत्थर के ढोकों सी दिवाल खड़ी की गई है। उनके बाहर बड़ी सुन्दरता से छोटे शिव लिंगो को तरह नदियों से प्राप्त पत्थरों को पलस्तर के स्थान पर लगाया गया है। स्थान स्थान पर सुन्दरता और बढाने के लिये बीच बीच में पत्थर के ढोके रख अतीव मनोरम रचना की गयी है। वे देखने में अत्यन्त सुन्दर लगती है। आधुनिक कला की याद दिलाती है। इस प्रकार की दिवाल रचना में कितना श्रम लगा होगा उन्हें देख करके ही अनुमान लगाया जा सकता है। यहाँ पर पुराने बर्तनों के टुकड़े तथा खपडे बहुत निकले हैं। प्राप्त टाइल्स में फूल-पत्तो तथा मानव आकार बने हैं। तत्कालीन पुरुषो तथा स्त्रियों की वेशभूषा तथा उनका चेहरा-मोहरा कैसा था। स्पष्ट मालूम होता है। मैने उन आकृतियो को ध्यानपूर्वक देखा। आर्यों की मुखाकृति जैसी है। मुख-रेखाएँ उनके हृष्ट पुष्ट, स्वस्थ तथा बलवान रूप को प्रकट करती हैं। उनका कद ऊँचा है। पाद की पेडली मास पेशी पुष्ट सम तथा आकर्षक हैं। नारियों का रूप उनका आकार अत्यन्त हृदयग्राही है। नासिका लम्बी आर्य जातीय सीधी है। रोमन नासिका की तरह उनमें मोड़ नहीं है। बाल उभडे गण्डस्थल पर अद्भुत शोभा बढाते हैं। कानों में गोलाकार बाला है। आज भी कश्मीर की स्त्रियाँ गुच्छे का बाला पहनती हैं। मुसलमान स्त्रियाँ चाँदियों के बाले गुच्छो में कानो से लटकाती हैं। बाली किंवा बाले पहनने की प्रथा कश्मीरी अंगनाओं से शीघ्रतापूर्वक लोप हो रही हैं। उनके स्थान पर तंग पहनने की प्रथा फैल चुकी है। टाइल्स पर बने आकार नर-नारियों के हैं। शरीर पर अलंकारों की बहुलता नही है। रोचक अलंकार हैं। वे शरीर की सुन्दरता बढाते हैं। उसे भद्देहर नही बनाते। इससे प्रकट होता है कि समाज उस समय कितना सुसंस्कृत तथा सभ्य था। पुरुष ढीला- ढाला वस्त्र पहने दिखाये गये हैं। वर्मधारी, अश्वा- रोही, धनुष-बाण धारी तथा चीर पट्ट पहने पुरुषों की आकृतियाँ मिली हैं। युवतियाँ मृदंग अथवा
प्रथम तरंग २३७
ढोल बजाती तथा नर्तकियाँ नृत्यमुद्रा में खपड़ों तथा टाइल्स पर मिली हैं । हाथो का उल्लेख काश्मीरी साहित्य में मिलता है। हरवान के टाइल्स पर हाथी की मूर्ति खुदी मिली है। हस्तिशाला का उल्लेख भी (रा० त० ७: ७७२-७७६ में) कल्हण करता है। हरवान में स्तूप मन्दिर, ईंटा, टाइल्स छत्रावली के अतिरिक्त 'ये धर्मा हेतुप्रभवा' ब्राह्मी लिपि में मिला है। एक वाद्यासन में बैठे साधु की आकृति भी मिली है। खरोष्ट्री लिपि का भी यहाँ दर्शन मिलता है। कुछ ऊपर एक हाल है। हाल के पीछे एक वृत्ताकार हाल और है। इसे देखकर मुझे गोहाटी स्थित कामाक्षा देवी के मन्दिर का स्मरण आ गया। यदि इस हाल का प्रत्यास्थापन किया जाय तो कामरूप कामाक्षा के मन्दिर तुल्य पृष्ठ भाग में गर्भगृह तुल्य गोलाकार तथा मंडप आयताकार होगा। कामाक्षा देवी में मण्डप से गर्भ गृह में जाने के लिए द्वार बना है। परन्तु यहाँ आयताकार मण्डप से पृष्ठभागीय वृत्ताकार गर्भ गृह में जाने के लिए किसी द्वार किंवा मार्ग का चिन्ह मैंने नही देखा। यह वृत्ताकार स्थान चैत्य हो सकता है। स्तूप होने का भी अनुमान लगाया जा सकता है। अजन्ता तथा एलोरा की गुफाओं में चैत्य के सम्मुख आयताकार मण्डप भिक्षुओं के बैठने तथा पूजा करने के लिए बना है। सम्भव है कि उसी स्थापत्य तुल्य यहाँ का निर्माण रहा हो। हरवान पिण्डपान किंवा भिक्षुओं के भिक्षा प्राप्त करने की दृष्टि से आदर्श स्थान माना जा सकता है। जल का सुपास है। जल दूर से लाने की यहाँ समस्या नहीं थी। निर्झर के कभी सूखने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बादाम, अखरोट तथा फलों के वृक्ष तथा उनके उद्यान यहाँ मुझे अधिकता से मिले। उपत्यका में शान्ति खूब उत्पन्न होती है। हरवान जिस समय अपनी गौरव गरिमा पर रहा होगा, उस समय यहाँ फल-फूल के वृक्ष खूब लगाये गये होंगे। खेतों में नाना प्रकार की सब्जी तथा अन्न उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता रहा होगा। पिण्डपात निमित्त स्थानीय जनता से भात, तरकारी तथा फलादि मिल जाना सरल था। इस समय चिनार के वृक्ष भी लगे हैं। मालूम नहीं उस दिनो यहाँ चिनार थे कि नहीं। कुछ लोगों का मत है कि चिनार के वृक्ष ईरान से लाकर लगाये गये है। इस विवाद में न पड़कर मैं यही कहना चाहता हूँ कि अध्यात्म ज्ञान चर्चा एवं तपस्या निमित्त हरवान का स्थान शान्त तथा आदर्श कहा जायेगा। इस समय हरवान ग्राम का रूप बहुत कुछ बदल गया है। भौतिक दृष्टि से यह एक समृद्धिशाली ग्राम है। यहाँ अस्पताल, स्कूल, ट्राउट फार्मिंग सेन्टर, श्रीनगर वाटर वर्क्स तथा ध्वंसावशेषों के कारण प्रसिद्ध स्थान हो गया है। (२) नागार्जुन : तुरूष्क राजाओं किंवा कुशान राजाओं का समकालीन नागार्जुन नहीं था। कल्हण के वर्णन से भ्रम उत्पन्न हो सकता है। चीनी ग्रन्थों में जो सामग्री इनके जीवन के सम्बन्ध में प्राप्त होती है उससे पता चलता है वह मान्ध्रभृत्यकुलीय शालिवाहन राजा श्री गौतमी पुत्र का समकालीन था। उसका काल सन् १६६-१९६ ई० तक था। कश्मीर में कल्हण वर्णित हुविष्क का काल सन् १०६ ई० आता है। कुछ मत है कि यह शालिवाहन राजा गौतमी पुत्र यज्ञश्री नहीं है परन्तु अब अनेक विद्वान् इसी को मानते है। नागार्जुन ने इस राजा के नाम जो पत्र लिखे थे उनका अनुवाद तिब्बती तथा चीनी भाषा में उपलब्ध है। राजा यज्ञश्री नागार्जुन का सम- सामयिक माना जाता है। इस पत्र का नाम 'आर्य नागार्जुन बोधिसत्त्व महल्लेख' है। 'आर्य नागार्जुन बोधिसत्त्व' यह उल्लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। कल्हण ने इस श्लोक में उसे बोधि- सत्त्व कहा है। कल्हण के समय में नागार्जुन प्रख्यात था। वह बोधिसत्त्व माना जाता था। उसे कश्मीर मण्डल का भूमीश्वर भी कहा गया है। नागार्जुन नाम
२३८ राजतरंगिणी
के साथ आर्य एवं बोधिसत्व दोनों शब्द होने के कारण प्रकट होता है । बौद्ध जगत् में उसका अत्य- धिक आदर था । भूमीश्वर शब्द का प्रयोग कल्हण ने यहाँ राजा के अर्थ में नहीं किया है । बोधिसत्त्व राजा नहीं हो सकता । वह भौतिक जगत् से, उसकी सम्पदाओ से, उसके ऐश्वर्यो से अलग रहता है । यहाँ कल्हण ने उसे कश्मीर मण्डल का अधीश्वर उसी प्रकार कहा है जैसे 'एकलिंग' जी मेवाड़ के अधीश्वर हैं। यहाँ पर यह शब्द नागार्जुन की कश्मीर राज्य में महत्ता तथा उसके प्रभाव के कारण प्रयोग किया गया है । उसका प्रभाव राजा पर था । राजा का प्रभाव कश्मीरमण्डल पर था । अतएव वास्तव में कश्मीर मण्डल का वह भूमीश्वर तुल्य था । नागार्जुन बौद्ध दर्शन के माध्यमिक सम्प्रदाय का समर्थक था । उन्हें शून्यवादी कहा जाता है । उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ 'माध्यमिक कारिका' अथवा 'माध्यमिक शास्त्र' है । वह २७ प्रकरणों में विभक्त है । कारिकाएं ४०० हैं। यह माध्यमिक दर्शन का प्रधान ग्रन्थ है। महायान सूत्रो को संक्षेप रूप से इनमे संकलन किया गया है । इस महान् ग्रन्थ द्वारा नागार्जुन की अन्तर्दृष्टि, विवेक, तर्क तथा मेधा शक्ति का परिचय मिलता है । हिमालय निवासी एक अति वृद्ध भिक्षु से नागार्जुन सूत्र प्राप्त हुआ था । एक मत और है । अश्वघोष से काशी मे नागार्जुन ने शिक्षा प्राप्त की था । यही उसे महायान सिद्धान्त से प्रथम बार सम्पर्क स्थापित हुआ था। मै स्वयं निश्चय करने में अपने को असमर्थ पाता हूँ कि उनमे कौन बात सत्य है। युवानचाग ने बौद्ध धर्म को विश्व मे प्रकाशित करने वाले चार सूर्यों का वर्णन किया है। उसमें वह अश्वघोष, कुमारलब्ध, आर्य देव तथा नागार्जुन को स्थान देता है । इस समय तक नागार्जुन की २० रचनाओं के चीनी अनुवाद प्राप्त हो चुके है । नागार्जुन द्वारा प्रतिपादित शून्यवाद के मुख्य व्याख्याकार पांचवी शताब्दी मे बुद्ध पालित तथा भाव विवेक हुए हैं । कथा है। नागार्जुन विदर्भ में एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया था । अपने पिता का एक मात्र पुत्र था । पिता को बडी उम्र में पैदा हुआ था । ज्योतिषियो ने कहा । नागार्जुन केवल ७ वर्ष जीवित रहेगा । माता पिता दुःखी हुए । सातवें वर्ष उसे नालन्द विश्वविद्या- लय मे विद्यार्जनार्थ भेज दिया। उसने ९० दिनो मे त्रिपिटको का अध्ययन कर लिया था । आचार्य राहुल से नालन्दा में नागार्जुन का सम्पर्क स्थापित हुआ । वह भिक्षु बन गया । लोग नवयुवको का स्वरूप धारण कर उसका प्रवचन सुनते थे । नाग जाति के आमन्त्रण पर उनके बीच तीन मास व्यतीत किया। नागाओ के सम्पर्क के कारण उसका नाम नागार्जुन पड़ गया । एक कथा और है कि अर्जुन वृक्ष की छाया में उसका जन्म हुआ था। अतएव नाग तथा अर्जुन मिलाकर उसका नाम नागार्जुन पड गया था । नागार्जुन महायान सम्प्रदाय का प्रवर्तक था । उसने तिब्बत में अपने दर्शन एवं मतका प्रचार किया । वह कवि, दार्शनिक तथा वैद्य था । एक और कथा तिब्बत में नागार्जुन के विषय में प्रचलित है । नागार्जुन के जन्म के समय से माता पिता ने ज्योति- षियों से सम्पर्क स्थापित किया । यह प्रथा आज भी प्रचलित है । ग्रामो में यह कार्य पुरोहित करते हैं । उनके पास पत्रा होता है । एक रिकार्ड भी रखते हैं । उनमें ग्राम के प्रत्येक व्यक्ति के जन्म एवं मृत्यु का दिन तथा समय लिखा रहता है । मुझे भी अपना जन्म दिन तथा काल मालूम नही था । हमारे ग्रामीण पुरोहित से लगभग २० वर्ष पश्चात् मिला था । यह यह प्रथा कम होती जा रही है । साक्षरता के प्रचार के कारण लोग अपने यहाँ डायरी आदि में लिखने लगे हैं । अतएव अब ग्रामों के पुरोहितों के यहाँ रिकार्ड मिलना कठिन होता जा रहा है।
प्रथम तरंग २३९ ज्योतिषियो के अनुसार नागार्जुन की आयु केवल ७ दिनो की थी । उसके माता-पिता के धर्माचरण के कारण देवताओ ने उसको ७ सप्ताह बढा दिया । तत्पश्चात् पुनः आयु ७ वर्ष बढा दिया । सात वर्ष पूर्ण होने के पूर्व वह नालन्द बिहार में विद्याध्ययन निमित्त भर्ती किया गया वहाँ उसने अमितायु की पूजा आरम्भ की । देवता प्रसन्न हो गये । उसकी आयु ३०० वर्षों की हो गयी । उसको मृत्यु के सम्बन्ध में विचित्र कथा है । उसने स्वयं अपना मस्तक अपने हाथों से काटकर मृत्यु का आलिंगन किया था । कहा जाता है । नागार्जुन आन्ध्र प्रदेश के गन्तूर जिला में श्रीपर्वत पर रहते थे । कालान्तर में इसे विजयपुरी तथा नागार्जुन कोंडा कहने लगे । जन- श्रुति है । राजा शातवाहन के समय नागार्जुन ने काशी छोड़ने के पश्चात् श्रीपर्वत पर अपना निवास स्थान बनाया । कश्मीरी बौद्ध भिक्षु तथा बौद्ध धर्मानुयायी वहीं की यात्रा करने लगे । नागार्जुन कोण्डा में भगवान् बुद्ध की धातु एक स्तूप में पायी गयी है । उस स्तूप मे भगवान् की धातु एक गोले सुवर्ण मंजूषा मे मिली थी । सन् १९३३ में यह धातु महाबोधि संग्रहालय सारनाथ वाराणसी में केन्द्रीय सरकार ने सुरक्षित रखने के लिये दे दिया है । मैं प्रातः प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा मे भगवान् के इस पवित्र धातु का दर्शन करता हूँ । यह धातु मूल गन्धकुटी विहार में सुरक्षित है । यहाँ के खनन कार्य में बडे स्तूप, विहार, मन्दिर, मूर्तियो, लघु स्तूप, देहली, अधिष्ठान आदि अमरावती शैली के प्राप्त हुए है । प्राकृत अभिलेख ब्राह्मी लिपि में दूसरी तथा तीसरी शताब्दी के मिले हैं । वहाँ एक अर्धचन्द्रा- कार देवस्थान (संख्या २) नागार्जुन कोण्डा में दान देने वालों की तालिका अंकित मिली है । समीपवर्ती स्थानों में श्रीलंका, गांधार, चीन तथा कश्मीर के पर्यटकों तथा यात्रियों के लिये स्थान बनाने का उल्लेख है । नागार्जुन की एक मूर्ति नालन्द के खनन कार्य सन् १९१९–१९२० में प्राप्त हुई है । स्वर्गीय श्री राहुल सास्कृत्यायन तिब्बत से कुछ चित्र लाये थे । उनमें एक नागार्जुन का है । यह इस समय पटना संग्रहालय बिहार मे सुरक्षित है। रानी शांतिश्री ने अनेक चैत्य तथा विहारों का निर्माण नागार्जुन कोंडा में कराया था । एक अन्य उपासिका बोधिश्री ने चैत्यगृह वहां बनवाया था । उनमें विदेश तथा कश्मीर के भिक्षु आकर रहते थे । चीनी अनुवादों में उसके १८ ग्रन्थों का उल्लेख बुनियु नंजियो ने अपनी तालिका में दिया है । नागार्जुन ने 'सुहृल्लेख' अर्थात् अपने उन पत्रों का संग्रह किया था, जिसे उन्होंने पत्र स्वरूप अपने मित्र यज्ञश्री गौतमीपुत्र को लिखा था । नागार्जुन की जीवनी का अनुवाद चीनी भाषा मे कुमार जीव ने सन् ४०५ ई० में किया था । नागार्जुन का तिब्बती नाम है क्लुसग्रुव । प्राकृत आख्यायिका लीलावती के अनुसार नागा- र्जुन पोट्टिस तथा कुमारिल के साथ शातवाहन की राजसभा मे रहते थे । नागार्जुन सिद्ध हस्त लेखक थे । उनकी रचना शैली तथा युक्ति विश्व साहित्य में प्रसिद्ध है । माध्यमिक कारिका नागार्जुन के पाण्डित्य, विद्वत्ता, तर्कबुद्धि, दार्शनिक विचार तथा उसके व्यावहारिक ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है । नागार्जुन शून्यवाद का आचार्य है । वह कहता है : न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम् । चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥ नागार्जुन की दृष्टि में मूलतत्त्व शून्य है । किसी भी पदार्थ का स्वरूप निर्णय करने में चार ही कोटियो का प्रयोग संभाव्य हैं । पहला अस्ति है । दूसरा नास्ति है । तीसरा तदुभयम् चौथा नोभयम् है । परमार्थ इन चारो कोटियों
२४० राजतरंगिणी अथ निष्कण्टको राजा कण्टकोत्साग्रहारदः । अभीरभूवाभिमन्युः शतमन्युरिवापरः ॥ १७४ ॥ १७४. तत्पश्चात् निर्भीक एवं निष्कंटक१ तथा कण्टकोत्स२ अग्रहार दाता द्वितीय इन्द्र तुल्य अभिमन्यु३ राजा हुआ । से मुक्त होता है। अतएव उसके अभिधान निमित्त शून्य शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने किया है। आर्य नागार्जुन के नाम से अनेक वैद्यक, रसायन विद्या एवं तन्त्र के ग्रन्थ उपलब्ध हैं। दार्शनिक नागार्जुन को तान्त्रिक नागार्जुन से अनेक विद्वान् भिन्न मानते हैं। इस भिन्नता को प्रदर्शित करने के लिये तान्त्रिक नागार्जुन को सिद्ध नागार्जुन के नाम से अभिहित किया जाता है। नागार्जुन का काल द्वितीय शती के उत्तरार्ध तथा सिद्ध नागार्जुन का सातवीं शती के समीप रखा जाता है। आयुर्वेदाचार्य नागार्जुन सिद्धों की परम्परा में हुए हैं। इनका समय आठवीं तथा नवीं शताब्दी है। प्रबन्ध चिन्तामणि से पता चलता है कि नागार्जुन पादलिप्त सूरि के शिष्य हैं। इस पुस्तक के अनुसार पारद से स्वर्ण बनाने में उन्होंने सफलता प्राप्त की थी । भारत में इन मुख्य तीनो नागार्जुनो के कार्य लेखन, गुण एवं धर्म में अन्तर है। उन्हें प्राय मिलाकर एक व्यक्ति मान लिया जाता है। बौद्ध दर्शन माध्यमिककारिकाकार, आर्य नागार्जुन सबसे पूर्व नागार्जुन नामक व्यक्ति हुए थे। वे अन्य इसी नाम के प्रसिद्ध व्यक्तियों से भिन्न थे। आधुनिक युग में नागार्जुन के दर्शन का पुनर्जागरण हुआ है। जापान के वर्तमान सामाजिक जीवन मुख्यतया बौद्ध धर्मानुयायियों में इसने पुनः स्थान प्राप्त किया है। कल्हण नागार्जुन के विषय में यह सत्य ही लिखता है कि वह कुशान राजाओं के समय हुआ था। पाठभेद : श्लोक संख्या १७४ 'कण्टकोत्साम्र' का 'कण्ट- कोत्सर्ग' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १७४ (१) निष्कंटक : का अर्थ कंटकहीन होता है। राजाओ के अनेक कंटक होते हैं। राज मार्ग कण्टकाकीर्ण कहा गया है। राजा के पार्श्व में रहने वाले, उसके दायाद, कुटुम्बो तथा सम्बन्धी प्रथम कंटक होते हैं। उत्तराधिकार किंवा राजा के पश्चात् राज्य, पद, सम्पत्ति आदि पाने के इच्छुक राजा के सम्बन्धी अशुभ कामना करते हैं। कब राजा मरे और वे कब स्वयं राजा बन बैठें। यह मनोवृत्ति राजाओं के विरुद्ध षड्यन्त्र, विप्लव गृहयुद्ध तथा हत्याओ में परिणत होता रहती है। महत्त्वाकांक्षी सेनापति तथा अमात्य जो राज्य- लिप्सा से लिप्त होते हैं, अथवा स्वयं राज्य लेना चाहते हैं इसी श्रेणी में आते हैं। कौटिल्य ने इसीलिये राजा का एक महत्वपूर्ण कार्य कंटक- शोधन कहा है। (२) कण्टकोत्स : बोरू परगना में यह कन्डोर ग्राम है। हुरवलित्तर ग्राम से बहुत दूर नहीं है। , (३) अभिमन्यु : आईने अकबरी में नाम अवेहमुन दिया गया है। हसन अभिमन्यु के विषय में लिखा है। राजा अभिमन्यु ने १८४८ क० में लोगो की मरजी से ताज हकूमत सर पर रखकर पहला काम यह किया कि, बुध मजहब को कत्तैयन जड से उखाड़ दिया । इन दिनों चन्दर आचारज नाम एक निहायत ही फाजिल बरहमन था । उसने हिंदुस्तान मे महावाश
प्रथम तरंग २४१ स्वनामाङ्कं शशाङ्काङ्कशेखरं विरचय्य सः। परार्घ्यविभवं श्रीमानभिमन्युपुरं व्यधात् ॥ १७५ ॥ १७५. इस श्रीमान् राजा ने अपने नाम पर परम वैभवशाली अभिमन्युपुर¹ नगर बसाकर उसमें उस नगर का आभूषण शशांकांकशेखर² मन्दिर का निर्माण कराया ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] (महाभाष्य) किताव अपने हमराह लाकर यहाँ के बरहमनों को तालीम दी और अपनी खुद तसीफ करदा किताव 'चन्द व्याकरण' यहाँ पर रायज कर दी । चूँकि (४३) नागसेन की तालीम और परचार से वहाँ के बहुत से लोग अपने मजहब बरगस्तर हो गये थे और बुध मजहब अख्तियार कर लिये थे अपने खादती अशगाल छोड़कर बड़े कामो में मुबतिला हो गये थे इसलिये उसकी नहूसत से इस मुल्क में बकसरत वरफ बरसना शुरू हो गयी । यहां तक कि यहाँ के वादशाह मोसम सरमा में पंजाब और (४४) वगैरह की तरफ हर साल जाने लगे । चन्दर आचारज हुस्न इखलाक और तालिफ कलूब से काम लेकर लोगो को अपने पुराने बाप-दादो के मजहब पर कायम रहने को तलकीन करता । इस वजह से यहाँ के बहुत से लोगों ने बुध मजहब छोड़कर अपना पुराना आवाई मजहब अख्तयार कर लिया । नीलमत पुराण किताव पर अजसरे नव अमल पैदा होकर साविक् रवाज़ के मुताबिक नजर व खैरात करने लगे । इसको बरकत से बरफ की मुसीबत से निजात पाई । राजा अभिमन्यु ने परगना वागल में मौजा आम- पुरा आवाद करके बरहमनो को बख्श दिया । चन्दर आचारज को खास एक जागीर देकर ताजीम और तकरीम से उसकी परवरिश की । यह राजा बौद्ध मजहब के पीरो के साथ मजलिश मुना- जिरह मुनकद कराता था । इससे इस मजहब के लोगो को बडी खराबी का सामना करना पडता था । ३३ साल हकूमत करके इस दुनिया को छोड़ दिया । गुलजार कश्मीर का मुसन्निफ लिखता है कि यही चन्दर आचारज है जिसने किताव नीलमत ३१
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पुराण चदमा नीलनाग से निकाली है । या खुद तसनीफ की है । फकत अल्लाह ज्यादा जानता है । (पृष्ठ ४४) पुरातन इतिहासकार छविल्लाकर की लुप्त राजाओं की तालिका में यह अन्तिम नाम है । कल्हण ने इस राजा का वर्णन छविल्लाकर के वर्णन के आधार पर किया है । अभिमन्यु कौन था । किस वंश का था । किस प्रकार कश्मीर का राजा हुआ इस पर कल्हण ने कोई प्रकाश नही डाला है । कुशान राजा वसुदेव की शक्ति क्षीण हो गयी थी । उसका राज्य मथुरा मण्डल के समीप सीमित रह गया था । नाग जाति के उपद्रवों के कारण कुशान शक्तिहीन होकर अपना अधिकांश राज्य खो बैठे थे । कल्हण ने हविष्क के पश्चात् कुशानवंशीय और किसी राजा का वर्णन नहीं किया है । कुशान राजाओ के प्रति किसी प्रबल विद्रोह एवं संघर्ष की ओर कल्हण संकेत नही करता । निर्विवाद मालूम होता है । वासुदेव तथा उसके पश्चात् के राजा निर्बलता के कारण कनिष्क के साम्राज्य को सम्हाल सकने में असमर्थ रहे । केन्द्रीय शक्ति के क्षीण होने के कारण शासन सूत्र शिथिल होकर टूट गया । प्रदेश तथा विजित भूखण्ड स्वतन्त्र हो गये । निस्सन्देह यही प्रक्रिया कश्मीर में हुई होगी । कश्मीर की व्यवस्था कुशान राजा न कर सके । पंजाब तथा मथुरा के समीप उसकी शक्ति नाग जाति के विद्रोह को दबाने में लग गयी । कश्मीर जैसे दूर पर्वतीय प्रदेश से सम्बन्ध विच्छेद हो जाना स्वाभाविक था ।
२४० राजतरंगिणी अथ निष्कण्टको राजा कण्टकोत्साग्रहारदः । अभीर्बभूवाभिमन्युः शतमन्युरिवापरः ॥ १७४ ॥ १७४. तत्पश्चात् निर्भीक एवं निष्कंटक१ तथा कण्टकोत्स२ अग्रहार दाता द्वितीय इन्द्र तुल्य अभिमन्यु३ राजा हुआ । से मुक्त होता है । अतएव उसके अभिधान निमित्त शून्य शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने किया है । आर्य नागार्जुन के नाम से अनेक वैद्यक, रसायन विद्या एवं तन्त्र के ग्रन्थ उपलब्ध हैं । दार्शनिक नागार्जुन को तान्त्रिक नागार्जुन से अनेक विद्वान् भिन्न मानते हैं । इस भिन्नता को प्रदर्शित करने के लिये तान्त्रिक नागार्जुन को सिद्ध नागार्जुन के नाम से अभिहित किया जाता है । नागार्जुन का काल द्वितीय शती के उत्तरार्ध तथा सिद्ध नागार्जुन का सातवी शती के समीप रखा जाता है । आयुर्वेदाचार्य नागार्जुन सिद्धों की परम्परा में हुए हैं । इनका समय आठवीं तथा नवी शताब्दी है । प्रबन्ध चिन्तामणि से पता चलता है कि नागार्जुन पादलिप्त सूरि के शिष्य है । इस पुस्तक के अनुसार पारद से स्वर्ण बनाने में उन्होंने सफलता प्राप्त की थी । भारत में इन मुख्य तीनो नागार्जुनो के कार्य लेखन, गुण एवं धर्म में अन्तर है । उन्हे प्राय मिलाकर एक व्यक्ति मान लिया जाता है । बौद्ध दर्शन माध्यमिककारिकाकार, आर्य नागार्जुन सबसे पूर्व नागार्जुन नामक व्यक्ति हुए थे । वे अन्य इसी नाम के प्रसिद्ध व्यक्तियो से भिन्न थे । आधुनिक युग में नागार्जुन के दर्शन का पुनर्जागरण हुआ है । जापान के वर्तमान सामाजिक जीवन मुख्यतया बौद्ध धर्मानुयायियों में इसने पुनः स्थान प्राप्त किया है । कल्हण नागार्जुन के विषय में यह सत्य ही लिखता है कि वह कुशान राजाओं के समय हुआ था । पाठभेद : श्लोक संख्या १७४ 'कण्टकोत्साम्र' का 'कण्ट- कोत्सर्ग' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७४ (१) निष्कंटक : का अर्थ कंटकहीन होता है । राजाओं के अनेक कंटक होते हैं । राज मार्ग कण्टकाकीर्ण कहा गया है । राजा के पार्श्व में रहने वाले, उसके दायाद, कुटुम्बों तथा सम्बन्धी प्रथम कंटक होते हैं । उत्तराधिकार किंवा राजा के पश्चात् राज्य, पद, सम्पत्ति आदि पाने के इच्छुक राजा के सम्बन्धी अशुभ कामना करते हैं । कब राजा मरे और वे कब स्वयं राजा बन बैठें । यह मनोवृत्ति राजाओं के विरुद्ध षड्यन्त्र, विप्लव गृहयुद्ध तथा हत्याओ में परिणत होता रहती है । महत्त्वाकांक्षी सेनापति तथा अमात्य जो राज्य- लिप्सा से लिप्त होते हैं, अथवा स्वयं राज्य लेना चाहते हैं इसी श्रेणी में आते हैं । कौटिल्य ने इसीलिये राजा का एक महत्वपूर्ण कार्य कंटक- शोधन कहा है । (२) कण्टकोत्स : वोरू परगना में यह कन्कोर ग्राम है । हुरवलितर ग्राम से बहुत दूर नहीं है । (३) अभिमन्यु : आईने अकबरी में नाम अबेह्मुन दिया गया है । हसन अभिमन्यु के विषय में लिखा है । राजा अभिमन्यु ने १८३४ क० में लोगो की मरजी से ताज हुकूमत सर पर रखकर पहला काम यह किया कि, बुध मजहब को कत्तैयन जड से उखाड दिया । इन दिनों चन्दर आचारज नाम एक निहायत ही फाजिल बरहमन था । उसने हिन्दुस्तान में महावाश
प्रथम तरंग २४१ स्वनामाङ्कं शशाङ्काङ्कशेखरं विरचय्य सः । परार्ध्यविभवं श्रीमानभिमन्युपुरं व्यधात् ॥ १७५ ॥ १७५. इस श्रीमान् राजा ने अपने नाम पर परम वैभवशाली अभिमन्युपुर¹ नगर बसाकर उसमें उस नगर का आभूषण शशांकांकशेखर² मन्दिर का निर्माण कराया ।
(महाभाष्य) किताब अपने हमराह लाकर यहाँ के बरहगनों को तालीम दी और अपनी खुद तसीफ करदा किताब 'चन्द व्याकरण' यहाँ पर रायज कर दी । चूंकि (४३) नागसेन की तालीम और परवार से वहाँ के बहुत से लोग अपने मजहब बरगस्तर हो गये थे और बुध मजहब अख्तियार कर लिये थे अपने खादती अशगाल छोड़कर बड़े कामों में मुवतिला हो गये थे इसलिये उसकी नहूसत से इस मुल्क में बकसरत वरफ बरसना शुरू हो गयी । यहां तक कि यहाँ के बादशाह मौसम सरमा में पंजाब और (४४) वगैरह की तरफ हर साल जाने लगे । चन्दर आचारज हुस्न इसनाक और तालिफ कलूब से काम लेकर लोगो को अपने पुराने बाप-दादो के मजहब पर कायम रहने को तलकीम करता । इस वजह से यहाँ के बहुत से लोगों ने बुध मजहब छोड़कर अपना पुराना आवाई मजहब अख्तयार कर लिया । नीलमत पुराण किताब पर अउसरे नव अमल पैदा होकर साबिक् रवाज के मुताबिक नजर व खैरात करने लगे । इसकी बरकत से बरफ की मुसीबत से निजात पाई । राजा अभिमन्यु ने परगना वागल में मौजा आम- पुरा आवाद करके वरहगनों को बख्श दिया । चन्दर आचारज को खास एक जागीर देकर ताजीम और तकरीम से उसकी परवरिश की । यह राजा बौद्ध मजहब के पीरो के साथ मजलिसा मुना- जिरह मुनकद्द कराता था । इसमे इस मजहब के लोगों को बड़ी खराबी का सामना करना पड़ता था । ३३ साल हकूमत करके इस दुनिया को छोड़ दिया ।
पुराण चश्मा नीलनाग से निकाली है । या खुद तसनीफ की है । फकत अल्लाह ज्यादा जानता है । (पृष्ठ ४४)
पुरातन इतिहासकार छविलाकर की लुप्त राजाओ की तालिका में यह अन्तिम नाम है । कल्हण ने इस राजा का वर्णन छविलाकर के वर्णन के आधार पर किया है ।
अभिमन्यु कौन था । किस वंश का था । किस प्रकार कश्मीर का राजा हुआ इस पर कल्हण ने कोई प्रकाश नहीं डाला है । कुशान राजा वसुदेव की शक्ति क्षीण हो गयी थी । उसका राज्य मथुरा मण्डल के समीप सीमित रह गया था । नाग जाति के उपद्रवों के कारण कुशान शक्तिहीन होकर अपना अधिकांश राज्य खो बैठे थे । कल्हण ने हविष्क के पश्चात् कुशानवंशीय और किसी राजा का वर्णन नहीं किया है । कुशान राजाओ के प्रति किसी प्रबल विद्रोह एवं संघर्ष की ओर कल्हण संकेत नहीं करता । निर्विवाद मालूम होता है । वासुदेव तथा उसके पश्चात् के राजा निर्बलता के कारण कनिष्क के साम्राज्य को सम्हाल सकने में असमर्थ रहे । केन्द्रीय शक्ति के क्षीण होने के कारण शासन सूत्र शिथिल होकर टूट गया । प्रदेश तथा विजित भूखण्ड स्वतन्त्र हो गये । निस्सन्देह यही प्रक्रिया कश्मीर में हुई होगी ।
कश्मीर की व्यवस्था कुशान राजा न कर सके । पंजाब तथा मथुरा के समीप उसकी शक्ति नाग जाति के विद्रोह को दबाने में लग गयी । कश्मीर जैसे दूर पर्वतीय प्रदेश से सम्बन्ध विच्छेद हो जाना स्वाभाविक था ।
गुलजार कश्मीर का मुसनिक लिखता है कि यही चन्दर आचारज है जिसने किताब नीलमत ३१
२४२ राजतरंगिणी चन्द्राचार्यादिभिर्लब्ध्वाऽऽदेशं तस्मात्तदाऽगमम्। प्रवर्तितं महाभाष्यं स्वं च व्याकरणं कृतम् ॥ १७६ ॥ १७६. चन्द्राचार्यादि १ ने राजा के आदेश पर उस समय लुप्तप्राय भाष्य २ का जनता में प्रचार किया । साथ ही साथ उन्होंने अपने स्वरचित व्याकरण ३ का भी प्रचार किया ।
अभिमन्यु इस स्थिति से लाभ उठाकर या तो स्वयं कश्मीर मण्डल का राजा हो गया होगा अथवा कश्मीर की जनता ने उसके गुणों के कारण शासन निमित्त राजा चुना होगा । पाठभेद : श्लोक संख्या १७५ में 'नामाङ्क' का 'नामाङ्क।' 'नामाङ्क' और 'शशाङ्काङ्क' का 'शशाङ्कार्थ' पाठ- भेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७५ (१) अभिमन्युपुर : यह श्रीनगर के नैऋत्यकोण में चार मील दूर विमयन ग्राम है । रानी दिद्दा द्वारा बसाया गया अभिमन्युपुर जिसका वर्णन राज० तरं० ६: २९९ में किया है दूसरा ग्राम है । दोनों को एक ही अभिमन्युपुर नहीं मानना चाहिए । (२) शशांकांकशेखर : शशांक का अर्थ शशि या चन्द्रमा होता है । शेखर का अर्थ शिर का आभूषण है । शिर पर धारण की जाने वाली किरीट तथा पुष्पमाला है । भगवान् शिव का शिरोभूषण चन्द्रमा है । अतएव शशांकशेखर शंकर का नाम पड़ा है। कल्हण ने शशांकशेखर अर्थात् शिव के मन्दिर की समानता नगर के अलंकार से की है। शशांक जिस प्रकार शिव का अलंकार है उसी प्रकार अभिमन्युपुर नगर का आभूषण किंवा अलंकार शशांकशेखर का मन्दिर था । कल्हण का तात्पर्य यह मालूम होता है कि मन्दिर इतना सुन्दर था कि यह नगर का आभूषण मालूम होता था । कल्हण ने इस मन्दिर के माध्यम से यह कहने का प्रयास किया है कि राजा शिवभक्त था । कुशान राजाओं द्वारा प्रचलित बुद्धधर्म को राजाश्रय प्राप्त नहीं था । राजाश्रय प्राप्त हो गया था । वे शिवभक्त किंवा सनातनधर्मी थे । कश्मीर ने चार धार्मिक क्रान्तियों का सामना तीन शताब्दियों के अन्दर किया था । पहली धार्मिक क्रान्ति बुद्धधर्म प्रचार की अशोक ने की थी। उसकी विरोधी दूसरी क्रान्ति जलोक ने सनातन धर्म को चलाकर की । तीसरी क्रान्ति कुशान राजाओं ने बुद्ध धर्म की पुनःप्रतिष्ठा तथा राजाश्रय देकर की । सनातन धर्म पृष्ठ भाग में रह गया । चौथी क्रान्ति राजा अभिमन्यु ने पुनः बौद्धधर्म के स्थान पर सनातन धर्म को स्थापित कर की थी । एक प्रकार से सनातन तथा बौद्धधर्म के अनुयायी राजा अपने धर्मों का प्रचार तथा राजाश्रय देते रहे । एक ही कश्मीर मण्डल जैसे लघु स्थान में धार्मिक क्रान्तियां एक के पश्चात् दूसरी होती रही । परन्तु ये राजविप्लव का रूप नहीं ले सकी । विचार आते रहे । जाते रहे । जनता समयानुकूल उनको स्वीकार तथा अस्वीकार करती रही । पाठभेद : श्लोक संख्या १७६ में ' लब्ध्वाऽऽदेशं ' वा 'लब्ध्वादेश'; 'लब्ध्वादेशान्' 'लब्ध्यादेशं' 'लब्धादेशात्' तथा 'स्वं च' का 'चन्द्र' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७६ (१) चन्द्राचार्य : इनका नाम चन्द्रगोमी था । चन्द्राचार्य एवं चन्द्र नाम से इनकी ख्याति थी । इन्होंने पाणिनीय व्याकरण के आधार पर अपने एक और व्याकरण की रचना की । उसमे 'स्वर वैदिको' प्रकरण नहीं मिलता । इस आधार पर विद्वानों का मत है कि ये बौद्ध थे । क्योकि बौद्ध वेद को मान्यता नहीं देते ।
प्रथम तरंग २...
[बायाँ स्तम्भ] इनका कहाँ जन्म हुआ था अनिश्चित है। कुछ विद्वानों का मत है कि 'व तथा ब' में इन्होंने भेद नहीं किया है। अन्तस्थ 'व'कारान्त पदों को भी पवर्गोय 'ब'कारान्त प्रकरण में पढ़ा है। अतएव कहा जाता है कि वे वंग (बंगाल) निवासी थे। कारण यह दिया जाता है कि 'वंग' प्रदेशीय लोगों में यह उच्चारण दोष पाया जाता है। इनके वंश का विशेष परिचय नहीं मिलता है। (२) महाभाष्य : यहाँ पतंजलि के महा- भाष्य से अभिप्राय है। वह दूसरी शताब्दी ईसापूर्व में हुआ था। पाणिनि पर उसने महाभाष्य लिखा है। राजा जयापीड के समय (रा० त० ४४८८) में इसी प्रकार का प्रयास किया गया था। राजा अभि- मन्यु ने व्याकरण शास्त्र के लुप्त हो जाने के कारण साहित्य को नवजीवन तथा एकरूपता देने के लिये चन्द्राचार्य जिन्हें चन्द्रगोभिन भी कहा जाता है। तथा अन्य विद्वानों को नियुक्त किया था। मालूम होता है। उस समय काश्मीर में व्याकरणाचार्यों की कमी हो गयी थी। शिक्षको के अभाव में उसने चन्द्रा- चार्यादि की सहायता द्वारा लुप्तप्राय ज्ञान के पुनः जीवन निमित्त प्रयास किया था। जयापीड के समय में भी पतंजलि के महाभाष्य के प्रचार निमित्त पुनः प्रयास होता दिखायी पड़ता है। हिन्दू राजाओं के अतिरिक्त कश्मीर का सुलतान बडशाह जैनुल आबदीन जो स्वयं संस्कृत का ज्ञाता था। उसके निर्देश पर रामानन्द ने महाभाष्य पर टीका लिखी थी। युद्धभट्ट स्वयं महाराष्ट्र में अथ- र्ववेद के ज्ञानार्जन निमित्त गया था। वह बादशाह के पास न्यायाधीश शिवाभट्ट की प्रेरणा पर भेजा गया था। लुप्तप्राय वेद का ज्ञान प्राप्त कर, उसका प्रचार कश्मीर में आकर करें। लगभग ५०० वर्ष पश्चात् स्वर्गीय रणजीत सीताराम पण्डित के भाई स्वर्गीय श्री एस. पी. पंडित को जब अथर्ववेद की पाण्डुलिपि दक्षिण में प्राप्त नहीं हो सकी, तो कश्मीरी पाण्डु- लिपियों को उन्होंने अपना आधार माना था।
[दायाँ स्तम्भ] कल्हण ने पतंजलि का नाम महाभाष्य के साथ नहीं लिखा है। परन्तु राजतरंगिणी के गवेषक विद्वानो का मत है कि यहाँ कल्हण का तात्पर्य पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य से ही है। उन्हें योग सूत्र, चरक संहिता तथा व्याकरण महाभाष्य का रचनाकार माना जाता है। परन्तु प्रथम दोनों ग्रन्थ उपलब्ध है। तृतीय का लेखक भिन्न व्यक्ति है इस प्रकार का मत कुछ विद्वानों ने प्रकट किया है। परन्तु सत्रहवीं शताब्दी के वैयाकरण नागोजी किंवा नागेश भट्ट ने अपने व्याकरण ग्रन्थ मंजूषायां 'इति चरके पतंजलि:' शब्द का प्रयोग किया है तथापि आधुनिक विद्वान् चरक संहिता का संग्रह योग सूत्रकार पतंजलि को नहीं मानते। महाभाष्यकार पतंजलि का काल नितान्त निश्चयात्मक रूप से निश्चित नहीं हो सका है। शुङ्ग वंशीय राजा पुष्यमित्र के श्रौतयज्ञ में, कहा जाता है, पतंजलि पुरोहित थे। 'इह पुष्यमित्रं याजयामः' महाभाष्य से सिद्ध होता है। यवनों ने साकेत और माध्यमिका पर आक्रमण किया था। पतंजलि उस समय वर्तमान थे। इस प्रकार महाभाष्य तथा पतंजलि दोनो का समय ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी ठहरता है। इस आधार पर विद्वानो का मत है कि ईसा पूर्व २०० वर्ष से १४० वर्ष के मध्य महाभाष्य की रचना हुई थी। महाभाष्य में 'मुनित्रय' को विशेष महत्त्व दिया गया है। वह मुनित्रय अष्टाध्यायीकार पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन, तथा महाभाष्यकार पतंजलि है। अष्टाध्यायी पर कात्यायन ने वार्तिकों की रचना कर व्याकरण को अधिक व्यापक, पूर्ण, सुगम एवं स्पष्ट किया है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य द्वारा वातिको की व्याख्या को और आगे बढ़ाया है तथा उसमें उन सूत्रों को भी विवेचना की गयी है जिन पर कात्यायन ने लेखनी नहीं उठायी थी। 'वाक्यपदीय' कार भर्तृहरि ने महाभाष्य की रचना का हेतु उपस्थित किया है। उनका मत है
२४४ राजतरंगिणी तस्मिन्नवसरे बौद्धा देशे प्रबलतां ययुः । नागार्जुनेन सुधिया बोधिसत्त्वेन पालिताः ॥ १७७ ॥ १७७. सुधी बोधिसत्त्व नागार्जुन१ द्वारा पालित बौद्ध उस समय देश में प्रबल हो गये थे। कि जिस समय व्याकरण के विद्वान् संक्षेप रुचि तथा अल्पविद्यापरिग्रही हो गये तो 'संग्रह' ग्रन्थ का सन्ध्या काल आ गया। उस समय तीर्थदर्शी मुनि पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की। उसमें न्याय बीजों का भी निबन्धन है। इससे स्पष्ट होता है। 'संग्रह' ग्रन्थ में व्याकरण सम्बन्धी अत्यन्त विस्तृत विवेचन था। महाभाष्य की शैली पाण्डित्यपूर्ण है। व्याख्या शैली सरल है। गद्य अत्यन्त सरल है। अकृत्रिम है। स्पष्ट है। धारा प्रवाहिक है। भर्तृहरि की टीका का अधिकांश अबतक अनुपलब्ध है। विवादास्पद विषयों का योग्यतापूर्वक निर्वाह किया है। पहले पूर्व पक्ष को उपस्थित कर उसके पश्चात् उत्तर पक्ष को उपस्थित किया है। अनन्तर उसने अपना मत प्रकट किया है। यह शैली कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में भी अपनायी है। महाभाष्य में दार्शनिक दृष्टि के साथ ही सांख्य शब्दनित्यवाद किंवा शब्द ब्रह्मवाद का निर्देश किया गया है। 'वाक्यपदीय' में भर्तृहरि ने इस पर विस्तृत व्याख्या की है। कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय उपयुक्त तथा विज्ञ अध्यापकों तथा शुद्ध पाठ के अभाव में उसका व्यवहार कम हो गया था । शनैः शनैः उसे लोग भूल गये थे । (तरंग ४ : ४८८) राजा जयापीड के समय में कल्हण पुनः वर्णन करता है कि महाभाष्य का प्रायः लोप हो गया था । राजा ने कश्मीर मण्डल के बाहर से विद्वानों को बुलाकर उन्हें कश्मीर में रखा। महाभाष्य का पठन-पाठन पुनः आरम्भ हुआ था। (३) चान्द्र व्याकरण के (१:२:२६) के 'अजयत् जर्त्तो हूणान्' को परिवर्तित कर कुछ विद्वानों ने 'जर्त्तो' के स्थान पर 'गुप्तो' कर दिया इसमें अभिमन्यु का काल गुप्त सम्राटों के पश्चात् सिद्ध करते हैं। किन्तु 'जर्त' शब्द का उल्लेख महाभारत में प्राप्त है। यह शब्द राजा के लिये भी प्रयुक्त किया गया है। उससे प्रकट होता है कि जर्त ने हूणों को पराजित किया था। अतएव अभिमन्यु का काल प्राचीन प्रतीत होता है। राजतरंगिणी में कल्हण ने जो समय दिया है वह चन्द्राचार्य के वास्तविक समय के बहुत निकट है। १७७ (१) बोधिसत्त्व नागार्जुन : कल्हण ने यहाँ पर नागार्जुन के लिये पुनः बोधिसत्त्व शब्द का प्रयोग किया है। बौद्ध गण नागार्जुन द्वारा पालित अर्थात् कश्मीर मण्डल में रक्षित थे। उनका किसी प्रकार अनिष्ट नहीं हो सकता था। बोधिसत्त्व स्वतः प्रबोधि प्राप्त के पश्चात् बुद्ध हो जाते हैं। नागार्जुन के आध्यात्मिक शक्ति का उल्लेख यहाँ पर कल्हण करता है। नागार्जुन यद्यपि कश्मीर मण्डल के राजा नहीं थे परन्तु श्लोक संख्या १७७ में उसे भूमीश्वर कहा है। राजा यद्यपि शिव उपासक था परन्तु वह मालूम पड़ता है, बौद्धों का विरोध करने में असमर्थ था। भगवान् बुद्ध की पूजा कल्हण के समय तक प्रचलित थी। बुद्ध जन्मोत्सव मनाने का कल्हण उल्लेख करता है। बारहवी शताब्दी सन् ११११ ई० की हादोग्राम में एक शिलालेख मिलता है। वह बुद्ध अवलोकितेश्वर की स्तुति से आरम्भ होता है। परि- हासपुर में बोधिसत्त्व तथा एक बुद्ध की मूर्ति मिली थी। हुएनसांग १०० तथा ओकुक (सन् ७५९ ई०) ८०० विहारों के होने का उल्लेख करता है। प्रताप सिंह संग्रहालय श्रीनगर में बोधिसत्त्व पद्मपाणि की एक मूर्ति रखी है।
प्रथम तरंग २४५ ते वादिनः पराजित्य वादेन निखिलान्बुधान् । क्रियां नीलपुराणोक्तामच्छिन्दन्नागमद्विषः ॥ १७८ ॥ १७८. आगम द्वेषी१ उन बौद्धों ने अपने विरोधी निखिल विद्वानों को वाद में परास्तकर२ नीलमत पुराणोक्त धार्मिक क्रियाओं को उच्छिन्न३ कर दिया । १७८ (१) आगम : शब्द का अर्थ लिखित प्रमाण ज्ञान, परम्परा गत सिद्धान्त, शास्त्र किंवा विधि, वेद तथा न्याय के चार प्रकार के प्रमाणों में अन्तिम प्रमाण है । आगम शास्त्र साधारणतया तन्त्र शास्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं । निगमागम शब्द का प्रयोग बहुत होता है । निगम जिस प्रकार वेद है उसी प्रकार आगम तन्त्र भी है । निगम कर्म, ज्ञान तथा उपासना का स्वरूप बनाता है। आगम उनके उपायभूत साधनों का वर्णन करता है। वाराही तन्त्र के अनुसार आगम का सात लक्षण यथा-सृष्टि, प्रलय देवार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट् कर्म तथा साधन और ध्यान योग है। षट्कर्म,-शान्ति, वशी- करण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण हैं। महानिर्वाण तन्त्र के अनुसार प्राणी पवित्रतया अपवित्र अर्थात् मेध्य तथा अमेध्य है । विचारों से प्राय. हीन होते हैं । प्राणियों के कल्याणार्थ शंकर ने पार्वती को आगमों का उपदेश स्वयं दिया था 'कलि आगम सम्मत' अर्थात् कलियुग में आगम की पूजा पद्धति उपयोगी एवं लाभप्रद कही गयी है। वेद में बहुदेववाद का बहुल है। उनकी भिन्नता के कारण उनके तीन प्रकार हो गये हैं । वैष्णव आगम अर्थात् पांचरात्र और वैखानस आगम एवं शैव आगम में पाशुपत, शैव सिद्धान्ती तथा त्रिक । तीसरा शाक्त आगम है। द्वैत द्वैता- द्वैत एवं अद्वैत दृष्टियों से भी तीन भेद माने गये है। अनेक आगम वेद मूलक हैं। अनेक तन्त्रों पर आगम का बाह्य प्रभाव भी लक्षित होता है। बौद्ध धर्म ने वैदिक सिद्धान्त के विरुद्ध आवाज उठायी थी । वेद एवं ब्राह्मणों की समालोचना से बौद्ध- साहित्य भरा पड़ा है। बौद्धों की इसी मनोवृत्ति की ओर संकेत करते हुए कल्हण ने बौद्धों को आगम द्वेषी रूप में यहाँ चित्रित किया है। शिव तथा त्रिक सूत्र के पूर्व भी कश्मीर में आगम तन्त्र शास्त्र का अस्तित्व मिलता है । मालिनी, विजय, स्वच्छन्द, विज्ञान भैरव, आनन्द- भैरव, उच्छुस्म भैरव, मृगेन्द्र, मातंग, नेत्र, नव स्वास, स्वयंभू एवं रुद्रयामल रूप मिलते है । (२) वाद : वाद का अर्थ वाणी, शब्द, वचन, कथन, वर्णन, निरूपण, वाद-विवाद, शास्त्रार्थ, तथा खण्डन मण्डन होता है । वाद प्रतिवाद का अर्थ झगड़ा-बहस आज कल होता है। कल्हण ने यहाँ वाद शब्द शास्त्रार्थ के अर्थ में प्रयुक्त किया है। पराजित शब्द के 'वादेन' के पूर्व रखने से स्पष्ट हो जाता है कि बौद्धों ने शास्त्रार्थ में तत्कालीन विद्वानों को परास्त किया था। बौद्धों ने आगमों का खण्डन कर अपने मत का मण्डन किया था । (३) उच्छिन्न : कल्हण बौद्धों की प्रबल बुद्धिप्रबलता का यहाँ उल्लेख करता है। सभी कश्मीर मण्डल के विद्वानों को बौद्धों ने शास्त्रार्थ में पाण्डित्य, अकाट्य तर्क, एवं विद्वत्ता के कारण परास्त कर दिया था। उनके धर्म प्रचार का इतना गम्भीर प्रभाव पड़ा कि कश्मीर में नील मत विहित धार्मिक संस्कार आदि समूल नष्ट हो गये। यह एक सामाजिक क्रान्ति थी। उसने समाज के ढाँचे को बदल दिया । लोग प्राचीन सनातनधर्मी परम्पराओं को स्वतः त्याग दिये । राजा इस सामाजिक एवं धार्मिक क्रान्ति में सम्मिलित नहीं था परन्तु बौद्धों के अनुशासन, विचार तथा प्रचार के कारण धार्मिक कृत्य स्वतः उच्छिन्न हो गये थे ।
२४६ राजतरंगिणी मण्डले विप्लुताचारे विच्छिन्नबलिकर्मभिः । नागैर्जनक्षयश्चक्रे प्रभूतहिमवर्षिभिः ॥ १७६ ॥ १७६. जब उस मण्डल में आचार विलुप्त हो गये, बलिकर्म¹ विच्छिन्न हो गये तो नागों² द्वारा की गई प्रभूत हिम³ वर्षा द्वारा जन क्षय होने लगा। हिमान्यां बौद्धबाधाय पतन्त्यां प्रतिवत्सरम् । शीते दार्वाभिमारादौ षण्मासान्पार्थिवोऽवसत् ॥ १८० ॥ १८०. बौद्धों को बाधा पहुँचाने के लिये प्रति वर्ष हिम वर्षा होने लगी। अतएव राजा शीत काल में छः मास तक दार्वाभिसार⁴ में निवास करने लगा।
१७२ (१) बलि कर्म : अनेक प्रकार के बलि कर्म एवं संस्कार नील मत पुराण में विहित हैं। बौद्धों के कारण बलि कर्म बन्द हो गया था। बौद्ध नाग पूजा, मूर्ति पूजा तथा देव पूजा में उस समय तक विश्वास नहीं करते थे। पंच महा यज्ञों में पाँचवाँ बलि है। बलि अर्थात् जीवों को अन्न दानादि से सन्तुष्ट करने का नाम भूतयज्ञ है। बलि का दूसरा प्रकार पशुओं का वध किंवा बलिदान है। बलि का बलिदान काल में पूर्वाभिमुख तथा खड्गधारी बलि देने वाले का मुख उत्तर दिशा की ओर रहना चाहिए। 'वैश्वदेव' कर्म करने के काल में जो अन्न भाग अलग रख दिया जाता है। उसे प्रय- मोक्त बलि कहा जाता है। यह अन्न भाग देव यज्ञ के लक्ष्यभूत देव के प्रति एवं जल, वृक्ष, गृहपशु इत्यादि देवताओं को समर्पित किया जाता है। बलि का अन्न भाग अग्नि में नहीं डाला जाता। भूमि पर फेंक दिया जाता है। (२) नाग : नाग पूजा कश्मीर में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी। ऑनिस क्रोटस सम्राट् सिकन्दर के साथ यूनान से भारत में आया था। उसके लेख का उल्लेख स्ट्राबों ने किया है—दर्भा- भिसार के राजा का दूत दो बड़े नागों का पालन- पोषण करता था। इसी प्रकार तक्षशिला के राजा ने एक बड़ा भारी नाग दिखाया था। उसे वह बड़े स्नेह से खिलाता था। उसकी पूजा देवता तुल्य करता था।
आइने अकबरी में अबुल फजल लिखता है— "कश्मीर में नाग पूजा सम्राट् अकबर के समय तक होती रही है। यद्यपि वहाँ के रहने वाले प्रायः मुसलमान हो गये थे। इस समय ७०० नाग मूर्तियाँ कश्मीर के विभिन्न स्थानों में पूजी जाती हैं। अबुल फजल ने यह उद्धरण आइने अकबरी में पुण्यभट्ट से लेकर दिया है। नीलमत पुराण में भगवान् विष्णु ने नाग पूजा के प्रसंग में कहा है— नागस्य यस्य ये स्थाने निवसिष्यन्ति मानवाः । ते तं संपूजयिष्यन्ति पुष्पधूपानुलेपनैः ॥ नैवेद्यैर्विविधैर्गन्धैः प्रेक्षादानैश्च शोभनैः । त्वयोक्तं च सदाचारं पालयिष्यन्ति ये जनाः ॥ २८९-२९०
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- + तस्मादस्य सदा पूजां बलिं च विधिना बुधः । क्षिप्त्यात्तत्प्रियामस्थैरभ्यर्च्याऽसौ सदा मुदा ॥ २९७ (३) हिमपात : प्रतीत होता है कि बौद्धों के प्राबल्य के पश्चात् कश्मीर में कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनका कारण बौद्धों के सर थोपा गया। लगातार कई वर्षों तक अकाल पड़ता रहा। हिमपात इतना होने लगा कि लोग व्याकुल हो गये थे। चन्द्रदेव, एक ब्राह्मण नेता ने प्रचार आरम्भ कर दिया कि इन सब अनर्थों का मूल कारण बौद्धों का प्रचार