भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२३६ राजतरंगिणी

पहाड़ भूला है। मेघ उसपर जमे थे। उनका शनैः शनैः इधर-उधर जाना, वाम पार्श्व में वर्षा जल द्वारा प्रवाहित कल-कल ध्वनि करता नाला, ग्रामों के शान्त गृहों से उठती धूम राशि, पडते फुहार में किंचित् खडे होकर उपत्यका को चुपचाप निरखते रहने में मुझे एक विचित्र आनन्द का बोध हो रहा था। यह दृश्य और यह स्थान मुझे इतना प्रिय लग रहा था मानो मैं स्वयं इस दृश्य का एक अंग बन गया था। इस समय हरवान का रूप बदल गया है। स्तीन के समय हरवान जो रूप उपस्थित करता रहा होगा वह अब नहीं है। शालीमार के दक्षिण पार्श्व से पक्की पिच की सडक हरवान ग्राम होती आगे निकल जाती है। सडक के समीप स्वच्छ जल पूर्ण नाला है। यहाँ पर तीन नाले हैं। दची ग्राम नाला, तेल बल नाला तथा शराब कुल। शराब कुल स्वच्छ जल की प्रणाली है। विहार की पहाडी के आधे भाग में बहती है। पूछने पर प्रकट हुआ। यह जल राज. के शराब बनाने के कारखाने की तरफ जाता है। अतएव इसका नाम शराब कुल पड़ा है। इस समय कार- खाना बन्द हैं। हरवान पहाड की उतार किंवा ढाल पर है। ढाल पर स्थान इतना समतल बनाया जा सकता है कि पर्वतीय शैली पर बहुत मकान बन सकते हैं। एक छोटा चौरस मैदान किंवा भूमि है। उसमे तीन चौकोर प्रांगण बने हैं। मध्यवर्तीय प्रांगण में चौकोर स्तूपाकार स्थान बना है। उसके दक्षिण पार्श्व में चौकोर प्रांगण के निर्मित पूर्वकालीन दिवालों के कुछ ध्वंसावशेष के आकार दोष रह गये हैं। मध्यवर्ती प्रांगण के समीप भी एक लम्बी दिवाल का भग्नावशेष रह गया है। प्रांगणो के ऊपर दिवालों का अवशेष बच गया है। दिवालें विचित्र रूप उप- स्थित करती हैं। निर्माणकर्त्ताओ तथा राजगीरो की कला पर प्रकाश डालती हैं। दिवालों की रचना पर यहाँ पर दो शब्द लिख देना उचित होगा। पत्थर के ढोकों सी दिवाल खड़ी की गई है। उनके बाहर बड़ी सुन्दरता से छोटे शिव लिंगो को तरह नदियों से प्राप्त पत्थरों को पलस्तर के स्थान पर लगाया गया है। स्थान स्थान पर सुन्दरता और बढाने के लिये बीच बीच में पत्थर के ढोके रख अतीव मनोरम रचना की गयी है। वे देखने में अत्यन्त सुन्दर लगती है। आधुनिक कला की याद दिलाती है। इस प्रकार की दिवाल रचना में कितना श्रम लगा होगा उन्हें देख करके ही अनुमान लगाया जा सकता है। यहाँ पर पुराने बर्तनों के टुकड़े तथा खपडे बहुत निकले हैं। प्राप्त टाइल्स में फूल-पत्तो तथा मानव आकार बने हैं। तत्कालीन पुरुषो तथा स्त्रियों की वेशभूषा तथा उनका चेहरा-मोहरा कैसा था। स्पष्ट मालूम होता है। मैने उन आकृतियो को ध्यानपूर्वक देखा। आर्यों की मुखाकृति जैसी है। मुख-रेखाएँ उनके हृष्ट पुष्ट, स्वस्थ तथा बलवान रूप को प्रकट करती हैं। उनका कद ऊँचा है। पाद की पेडली मास पेशी पुष्ट सम तथा आकर्षक हैं। नारियों का रूप उनका आकार अत्यन्त हृदयग्राही है। नासिका लम्बी आर्य जातीय सीधी है। रोमन नासिका की तरह उनमें मोड़ नहीं है। बाल उभडे गण्डस्थल पर अद्भुत शोभा बढाते हैं। कानों में गोलाकार बाला है। आज भी कश्मीर की स्त्रियाँ गुच्छे का बाला पहनती हैं। मुसलमान स्त्रियाँ चाँदियों के बाले गुच्छो में कानो से लटकाती हैं। बाली किंवा बाले पहनने की प्रथा कश्मीरी अंगनाओं से शीघ्रतापूर्वक लोप हो रही हैं। उनके स्थान पर तंग पहनने की प्रथा फैल चुकी है। टाइल्स पर बने आकार नर-नारियों के हैं। शरीर पर अलंकारों की बहुलता नही है। रोचक अलंकार हैं। वे शरीर की सुन्दरता बढाते हैं। उसे भद्देहर नही बनाते। इससे प्रकट होता है कि समाज उस समय कितना सुसंस्कृत तथा सभ्य था। पुरुष ढीला- ढाला वस्त्र पहने दिखाये गये हैं। वर्मधारी, अश्वा- रोही, धनुष-बाण धारी तथा चीर पट्ट पहने पुरुषों की आकृतियाँ मिली हैं। युवतियाँ मृदंग अथवा