राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २३७ ढोल बजाती तथा नर्तकियां नृत्यमुद्रा में खपड़ों तथा टाइल्स पर मिली हैं। हाथो का उल्लेख काश्मीरी साहित्य में मिलता है। हरवान के टाइल्स पर हाथो की मूर्ति खुदी मिली है। हस्तिशाला का उल्लेख भी (रा० त० ७: ७७२-७७६ में) कल्हण करता है। हरवान में स्तूप मन्दिर, ईंटा, टाइल्स छत्रावली के अतिरिक्त 'ये धर्मा हेतुप्रभवा' ब्राह्मी लिपि में मिला है। एक काकासन में बैठे साधू की आकृति भी मिली है। खरोष्ट्री लिपि का भी यहाँ दर्शन मिला है। कुछ ऊपर एक हाल है। हाल के पीछे एक वृत्ताकार हाल और है। इसे देखकर मुझे गौहाटी स्थित कामाक्षा देवी के मन्दिर का स्मरण आ गया। यदि इस हाल का प्रत्यास्थापन किया जाय तो कामरूप कामाक्षा के मन्दिर तुल्य पृष्ठ भाग में गर्भगृह तुल्य गोलाकार तथा मंडप आयताकार होगा। कामाक्षा देवी में मण्डप से गर्भ गृह में जाने के लिए द्वार बना है। परन्तु यहाँ आयताकार मण्डप से पृष्ठभागीय वृत्ताकार गर्भ गृह में जाने के लिए किसी द्वार किंवा मार्ग का चिन्ह मैने नहीं देखा। यह वृत्ताकार स्थान चैत्य हो सकता है। स्तूप होने का भी अनुमान लगाया जा सकता है। अजन्ता तथा एलोरा की गुफाओं में चैत्य के सम्मुख आयताकार मण्डप भिक्षुओं के बैठने तथा पूजा करने के लिए बना है। सम्भव है कि उसी स्थापत्य तुल्य यहाँ का निर्माण रहा हो। हरवान पिण्डपात किंवा भिक्षुओं के भिक्षा प्राप्त करने की दृष्टि से आदर्श स्थान माना जा सकता है। जल का सुपास है। जल दूर से लाने की यहाँ समस्या नहीं थी। निर्झर के कभी सूखने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बादाम, अखरोट तथा फलों के वृक्ष तथा उनके उद्यान यहाँ मुझे अधिकता से मिले। उपत्यका में शालि खूब उत्पन्न होती है। हरवान जिस समय अपनी गौरव गरिमा पर रहा होगा, उस समय यहाँ फल-फूल के वृक्ष खूब लगाये गये होंगे। खेतों में नाना प्रकार की सब्जी तथा अन्न उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता रहा होगा। पिण्डपात निमित्त स्थानीय जनता से भात, तरकारी तथा फलादि मिल जाना सरल था। इस समय चिनार के वृक्ष भी लगे हैं। मालूम नहीं उन दिनों यहाँ चिनार थे कि नहीं। कुछ लोगों का मत है कि चिनार के वृक्ष ईरान से हाँकर लगाये गये हैं। इस विवाद में न पड़कर मैं यही कहना चाहता हूँ कि अध्यात्म ज्ञान चर्चा एवं तपस्या निमित्त हरवान का स्थान शान्त तथा आदर्श कहा जायेगा। इस समय हरवान ग्राम का रूप बहुत कुछ बदल गया है। भौतिक दृष्टि से यह एक समृद्धिशाली ग्राम है। यहाँ अस्पताल, स्कूल, ट्राउट फार्मिंग सेण्टर, श्रीनगर वाटर वर्क्स तथा ध्वंसावशेषों के कारण प्रसिद्ध स्थान हो गया है। (२) नागार्जुन : उरुष्क राजाओ किंवा कुशान राजाओ का समकालीन नागार्जुन नही था। कल्हण के वर्णन से भ्रम उत्पन्न हो सकता है। चीनी ग्रन्थों में जो सामग्री इनके जीवन के सम्बन्ध में प्राप्त होती है उससे पता चलता है वह आन्ध्रभृत्यकुलीय शालिवाहन राजा श्री गौतमी पुत्र का समकालीन था। उसका काल सन् १६६-१९६ ई० तक था। कश्मीर में कल्हण वर्णित हुविष्क का काल सन् १०६ ई० आता है। कुछ मत है कि यह शालिवाहन राजा गौतमी पुत्र यज्ञश्री नहीं है परन्तु अब अनेक विद्वान् इसी को मानते है। नागार्जुन ने इस राजा के पास जो पत्र लिखे थे उनका अनुवाद तिब्बती तथा चीनी भाषा में उपलब्ध है। राजा यज्ञश्री नागार्जुन का सम- सामयिक माना जाता है। इस पत्र का नाम 'आर्य नागार्जुन वोधिसत्त्व सुहल्लेख' है। 'आर्य नागार्जुन वोधिसत्त्व' यह उल्लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। कल्हण ने इस श्लोक में उसे बोधि- सत्त्व कहा है। कल्हण के समय में नागार्जुन प्रख्यात था। वह बोधिसत्त्व माना जाता था। उसे कश्मीर मण्डल का भूमीश्वर भी कहा गया है। नागार्जुन नाम