राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २४१ स्वनामाङ्कं शशाङ्काङ्कशेखरं विरचय्य सः। परार्घ्यविभवं श्रीमानभिमन्युपुरं व्यधात् ॥ १७५ ॥ १७५. इस श्रीमान् राजा ने अपने नाम पर परम वैभवशाली अभिमन्युपुर¹ नगर बसाकर उसमें उस नगर का आभूषण शशांकांकशेखर² मन्दिर का निर्माण कराया ।
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] (महाभाष्य) किताव अपने हमराह लाकर यहाँ के बरहमनों को तालीम दी और अपनी खुद तसीफ करदा किताव 'चन्द व्याकरण' यहाँ पर रायज कर दी । चूँकि (४३) नागसेन की तालीम और परचार से वहाँ के बहुत से लोग अपने मजहब बरगस्तर हो गये थे और बुध मजहब अख्तियार कर लिये थे अपने खादती अशगाल छोड़कर बड़े कामो में मुबतिला हो गये थे इसलिये उसकी नहूसत से इस मुल्क में बकसरत वरफ बरसना शुरू हो गयी । यहां तक कि यहाँ के वादशाह मोसम सरमा में पंजाब और (४४) वगैरह की तरफ हर साल जाने लगे । चन्दर आचारज हुस्न इखलाक और तालिफ कलूब से काम लेकर लोगो को अपने पुराने बाप-दादो के मजहब पर कायम रहने को तलकीन करता । इस वजह से यहाँ के बहुत से लोगों ने बुध मजहब छोड़कर अपना पुराना आवाई मजहब अख्तयार कर लिया । नीलमत पुराण किताव पर अजसरे नव अमल पैदा होकर साविक् रवाज़ के मुताबिक नजर व खैरात करने लगे । इसको बरकत से बरफ की मुसीबत से निजात पाई । राजा अभिमन्यु ने परगना वागल में मौजा आम- पुरा आवाद करके बरहमनो को बख्श दिया । चन्दर आचारज को खास एक जागीर देकर ताजीम और तकरीम से उसकी परवरिश की । यह राजा बौद्ध मजहब के पीरो के साथ मजलिश मुना- जिरह मुनकद कराता था । इससे इस मजहब के लोगो को बडी खराबी का सामना करना पडता था । ३३ साल हकूमत करके इस दुनिया को छोड़ दिया । गुलजार कश्मीर का मुसन्निफ लिखता है कि यही चन्दर आचारज है जिसने किताव नीलमत ३१
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] पुराण चदमा नीलनाग से निकाली है । या खुद तसनीफ की है । फकत अल्लाह ज्यादा जानता है । (पृष्ठ ४४) पुरातन इतिहासकार छविल्लाकर की लुप्त राजाओं की तालिका में यह अन्तिम नाम है । कल्हण ने इस राजा का वर्णन छविल्लाकर के वर्णन के आधार पर किया है । अभिमन्यु कौन था । किस वंश का था । किस प्रकार कश्मीर का राजा हुआ इस पर कल्हण ने कोई प्रकाश नही डाला है । कुशान राजा वसुदेव की शक्ति क्षीण हो गयी थी । उसका राज्य मथुरा मण्डल के समीप सीमित रह गया था । नाग जाति के उपद्रवों के कारण कुशान शक्तिहीन होकर अपना अधिकांश राज्य खो बैठे थे । कल्हण ने हविष्क के पश्चात् कुशानवंशीय और किसी राजा का वर्णन नहीं किया है । कुशान राजाओ के प्रति किसी प्रबल विद्रोह एवं संघर्ष की ओर कल्हण संकेत नही करता । निर्विवाद मालूम होता है । वासुदेव तथा उसके पश्चात् के राजा निर्बलता के कारण कनिष्क के साम्राज्य को सम्हाल सकने में असमर्थ रहे । केन्द्रीय शक्ति के क्षीण होने के कारण शासन सूत्र शिथिल होकर टूट गया । प्रदेश तथा विजित भूखण्ड स्वतन्त्र हो गये । निस्सन्देह यही प्रक्रिया कश्मीर में हुई होगी । कश्मीर की व्यवस्था कुशान राजा न कर सके । पंजाब तथा मथुरा के समीप उसकी शक्ति नाग जाति के विद्रोह को दबाने में लग गयी । कश्मीर जैसे दूर पर्वतीय प्रदेश से सम्बन्ध विच्छेद हो जाना स्वाभाविक था ।