भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२४० राजतरंगिणी अथ निष्कण्टको राजा कण्टकोत्साग्रहारदः । अभीर्बभूवाभिमन्युः शतमन्युरिवापरः ॥ १७४ ॥ १७४. तत्पश्चात् निर्भीक एवं निष्कंटक१ तथा कण्टकोत्स२ अग्रहार दाता द्वितीय इन्द्र तुल्य अभिमन्यु३ राजा हुआ । से मुक्त होता है । अतएव उसके अभिधान निमित्त शून्य शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने किया है । आर्य नागार्जुन के नाम से अनेक वैद्यक, रसायन विद्या एवं तन्त्र के ग्रन्थ उपलब्ध हैं । दार्शनिक नागार्जुन को तान्त्रिक नागार्जुन से अनेक विद्वान् भिन्न मानते हैं । इस भिन्नता को प्रदर्शित करने के लिये तान्त्रिक नागार्जुन को सिद्ध नागार्जुन के नाम से अभिहित किया जाता है । नागार्जुन का काल द्वितीय शती के उत्तरार्ध तथा सिद्ध नागार्जुन का सातवी शती के समीप रखा जाता है । आयुर्वेदाचार्य नागार्जुन सिद्धों की परम्परा में हुए हैं । इनका समय आठवीं तथा नवी शताब्दी है । प्रबन्ध चिन्तामणि से पता चलता है कि नागार्जुन पादलिप्त सूरि के शिष्य है । इस पुस्तक के अनुसार पारद से स्वर्ण बनाने में उन्होंने सफलता प्राप्त की थी । भारत में इन मुख्य तीनो नागार्जुनो के कार्य लेखन, गुण एवं धर्म में अन्तर है । उन्हे प्राय मिलाकर एक व्यक्ति मान लिया जाता है । बौद्ध दर्शन माध्यमिककारिकाकार, आर्य नागार्जुन सबसे पूर्व नागार्जुन नामक व्यक्ति हुए थे । वे अन्य इसी नाम के प्रसिद्ध व्यक्तियो से भिन्न थे । आधुनिक युग में नागार्जुन के दर्शन का पुनर्जागरण हुआ है । जापान के वर्तमान सामाजिक जीवन मुख्यतया बौद्ध धर्मानुयायियों में इसने पुनः स्थान प्राप्त किया है । कल्हण नागार्जुन के विषय में यह सत्य ही लिखता है कि वह कुशान राजाओं के समय हुआ था । पाठभेद : श्लोक संख्या १७४ 'कण्टकोत्साम्र' का 'कण्ट- कोत्सर्ग' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७४ (१) निष्कंटक : का अर्थ कंटकहीन होता है । राजाओं के अनेक कंटक होते हैं । राज मार्ग कण्टकाकीर्ण कहा गया है । राजा के पार्श्व में रहने वाले, उसके दायाद, कुटुम्बों तथा सम्बन्धी प्रथम कंटक होते हैं । उत्तराधिकार किंवा राजा के पश्चात् राज्य, पद, सम्पत्ति आदि पाने के इच्छुक राजा के सम्बन्धी अशुभ कामना करते हैं । कब राजा मरे और वे कब स्वयं राजा बन बैठें । यह मनोवृत्ति राजाओं के विरुद्ध षड्यन्त्र, विप्लव गृहयुद्ध तथा हत्याओ में परिणत होता रहती है । महत्त्वाकांक्षी सेनापति तथा अमात्य जो राज्य- लिप्सा से लिप्त होते हैं, अथवा स्वयं राज्य लेना चाहते हैं इसी श्रेणी में आते हैं । कौटिल्य ने इसीलिये राजा का एक महत्वपूर्ण कार्य कंटक- शोधन कहा है । (२) कण्टकोत्स : वोरू परगना में यह कन्कोर ग्राम है । हुरवलितर ग्राम से बहुत दूर नहीं है । (३) अभिमन्यु : आईने अकबरी में नाम अबेह्मुन दिया गया है । हसन अभिमन्यु के विषय में लिखा है । राजा अभिमन्यु ने १८३४ क० में लोगो की मरजी से ताज हुकूमत सर पर रखकर पहला काम यह किया कि, बुध मजहब को कत्तैयन जड से उखाड दिया । इन दिनों चन्दर आचारज नाम एक निहायत ही फाजिल बरहमन था । उसने हिन्दुस्तान में महावाश